SC/ST Act पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला, कानून के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

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Digital UP News Desk

प्रयागराज: अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) से जुड़े मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के SC या ST समुदाय से संबंधित होने मात्र से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 यानी SC/ST Act की धाराएं स्वतः लागू नहीं हो जातीं। इसके लिए यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी ने पीड़ित को उसकी जाति के कारण जानबूझकर अपमानित या प्रताड़ित किया था और कानून में निर्धारित परिस्थितियां पूरी होती हैं।

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी गाजियाबाद के लोनी थाना क्षेत्र में जमीन के लेनदेन से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने आरोपी राजू कुरैशी उर्फ उमरदराज के खिलाफ SC/ST Act के तहत चल रही कार्यवाही को निरस्त कर दिया। हालांकि, अदालत ने जमीन के सौदे से जुड़े धोखाधड़ी और अन्य आरोपों की कार्यवाही को समाप्त नहीं किया है। यानी आरोपी को केवल SC/ST Act से जुड़े आरोपों में राहत मिली है, जबकि बाकी मामले की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।

जमीन के सौदे से जुड़ा है पूरा मामला

मामला गाजियाबाद के लोनी थाना क्षेत्र के ग्राम बंथला से संबंधित है। वर्ष 2025 में लोनी थाने में दर्ज एफआईआर में राजू कुरैशी के खिलाफ कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। इनमें SC/ST Act के अलावा जालसाजी और धोखाधड़ी से जुड़े आरोप भी शामिल थे।

शिकायत के मुताबिक, भूमि के एक सौदे के लिए 2.41 लाख रुपये एडवांस के तौर पर लिए गए थे। आरोप था कि रकम लेने के बाद जमीन का बैनामा नहीं किया गया और इस तरह शिकायतकर्ता के साथ धोखाधड़ी हुई। इसी विवाद के बीच शिकायत में SC/ST Act के प्रावधान भी जोड़े गए।

मामले की सुनवाई गाजियाबाद की विशेष SC/ST अदालत में भी हुई थी। वहां आरोपी के खिलाफ समन जारी किया गया। इसके बाद राजू कुरैशी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया और निचली अदालत की कार्यवाही को चुनौती दी।

आरोपी की ओर से क्या दलील दी गई?

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि विवाद की मूल प्रकृति जमीन के लेनदेन से संबंधित है। वकील ने इसे मुख्य रूप से एक दीवानी प्रकृति का विवाद बताया। उनका तर्क था कि संपत्ति के सौदे से जुड़ी शिकायत को बाद में SC/ST Act का मामला बना दिया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि कथित जातिसूचक टिप्पणी को लेकर ऐसा कोई स्पष्ट आरोप नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित किया। इसके अलावा, कथित घटना के सार्वजनिक रूप से घटित होने को लेकर भी पर्याप्त आधार नहीं होने की बात अदालत के समक्ष रखी गई।

हालांकि, किसी आपराधिक मामले में आरोपों की अंतिम सत्यता का निर्धारण साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही होता है। हाईकोर्ट ने अपने सामने उपलब्ध रिकॉर्ड और केस डायरी के आधार पर SC/ST Act से जुड़ी कार्यवाही की वैधानिक स्थिति पर विचार किया।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में क्या पाया?

जस्टिस संतोष राय की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए रिकॉर्ड और केस डायरी का अवलोकन किया। अदालत के अनुसार, उपलब्ध सामग्री में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह प्रदर्शित हो कि आरोपी ने पीड़ित के खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया था या उसे सार्वजनिक स्थान पर उसकी जाति के कारण अपमानित किया था।

अदालत ने इसी आधार पर SC/ST Act के तहत चल रही कार्यवाही को चुनौती के दायरे में माना। कोर्ट ने कहा कि कानून के संबंधित प्रावधानों को लागू करने के लिए केवल पीड़ित का SC/ST समुदाय से होना पर्याप्त नहीं है। आरोप की प्रकृति और घटना की परिस्थितियां भी कानून में निर्धारित तत्वों के अनुरूप होनी चाहिए।

इस तरह हाईकोर्ट ने मामले के उस हिस्से को अलग किया, जो कथित जमीन विवाद और आर्थिक लेनदेन से संबंधित था, और उस हिस्से पर अलग दृष्टिकोण अपनाया जो SC/ST Act के आरोपों से जुड़ा था।

जाति के कारण अपमान का इरादा जरूरी

हाईकोर्ट की टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि SC/ST Act के तहत अपराध के लिए जातिगत अपमान और उसके पीछे आरोपी की मंशा जैसे कानूनी तत्वों की मौजूदगी महत्वपूर्ण है।

अदालत ने कहा कि यदि किसी विवाद में पीड़ित की जाति के कारण उसे जानबूझकर अपमानित करने का इरादा सामने नहीं आता और कानून में निर्धारित सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने जैसी आवश्यक परिस्थितियां भी स्थापित नहीं होतीं, तो केवल जाति की पहचान के आधार पर SC/ST Act की धाराएं नहीं लगाई जा सकतीं।

यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई बार संपत्ति, पैसे या अन्य व्यक्तिगत विवादों में अलग-अलग आपराधिक धाराएं लगाए जाने का सवाल अदालतों के सामने आता है। ऐसे मामलों में अदालत आरोपों की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच करती है।

केवल सिविल विवाद को जातिगत मामला बनाने पर कोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी विशुद्ध रूप से सिविल या संपत्ति विवाद को आपराधिक अथवा जातिगत रंग देना कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग का कारण बन सकता है। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड में SC/ST Act के तहत आवश्यक आधार नहीं पाए जाने पर इस कानून से संबंधित कार्यवाही को आगे बढ़ाना उचित नहीं माना।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि जमीन के सौदे से जुड़े आरोपों को भी अदालत ने समाप्त कर दिया है। यही इस आदेश का अहम पहलू है। हाईकोर्ट ने राजू कुरैशी के खिलाफ SC/ST Act के तहत जारी समन आदेश को निरस्त किया, लेकिन धोखाधड़ी और अमानत में खयानत से जुड़े आरोपों की कानूनी प्रक्रिया जारी रहने दी।

आरोपी को मिली सीमित राहत

इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश को आरोपी की पूरी तरह से आरोपमुक्ति के रूप में देखना सही नहीं होगा। अदालत ने केवल उन आरोपों से संबंधित कार्यवाही को रद्द किया है, जिनके लिए SC/ST Act के तहत आवश्यक कानूनी आधार रिकॉर्ड पर पर्याप्त रूप से सामने नहीं आया।

दूसरी ओर, जमीन के सौदे में रकम लेने और बैनामा न करने से जुड़े आरोपों पर कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। इन आरोपों की वास्तविकता का फैसला संबंधित न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।

SC/ST Act के मामलों में अदालत की भूमिका

SC/ST Act का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को जाति आधारित अत्याचार और भेदभाव से कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। इसलिए इस कानून के प्रावधानों की गंभीरता को देखते हुए अदालतें आरोपों में कानून के आवश्यक तत्वों की मौजूदगी पर विचार करती हैं।

वहीं, दूसरी तरफ अदालतों के सामने यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी रहती है कि किसी कानून का इस्तेमाल ऐसे विवाद में न हो, जहां उसके आवश्यक कानूनी तत्व मौजूद ही न हों। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश इसी संतुलन को रेखांकित करता है।

क्या है इस फैसले का मुख्य संदेश?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस टिप्पणी का सीधा संदेश यह है कि SC/ST Act की धाराएं लगाने के लिए केवल पीड़ित की जाति पर्याप्त आधार नहीं है। मामले में लगाए गए आरोपों से यह भी सामने आना चाहिए कि कानून में बताए गए आवश्यक तत्व मौजूद हैं और आरोपी की कार्रवाई जाति के कारण किए गए अपमान या अत्याचार से जुड़ी है।

इस मामले में अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड में जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल और सार्वजनिक रूप से जाति के आधार पर अपमान किए जाने का पर्याप्त प्रमाण नहीं पाया। इसलिए SC/ST Act के तहत जारी समन को रद्द कर दिया गया।

हालांकि, जमीन के लेनदेन और कथित धोखाधड़ी से जुड़े आरोप अभी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बने रहेंगे। ऐसे में इस आदेश का दायरा केवल SC/ST Act से संबंधित कार्यवाही तक सीमित है।

SC/ST Act से संबंधित आरोपों पर राहत मिली

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला SC/ST Act के प्रावधानों को लागू करने के लिए आवश्यक कानूनी शर्तों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में सामने आया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के SC/ST समुदाय से होने मात्र से कानून की धाराएं स्वतः लागू नहीं होतीं। आरोपों में कानून के आवश्यक तत्वों का होना और उपलब्ध साक्ष्यों से उनका समर्थन होना जरूरी है। साथ ही, अदालत ने जमीन के लेनदेन से जुड़े अन्य आरोपों को बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया कि आरोपी को इस मामले में केवल SC/ST Act से संबंधित आरोपों पर राहत मिली है।

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