बांस से बदल रही जिंदगी: हरित तनों से हरित उद्यमों तक रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई कहानी
रिपोर्ट- अमित सिंह यादव
नई दिल्ली। बांस को लंबे समय तक भारत में पारंपरिक शिल्प और ग्रामीण जीवन से जुड़े संसाधन के रूप में देखा जाता रहा है। हालांकि, बदलते समय के साथ बांस अब केवल हस्तशिल्प तक सीमित नहीं रह गया है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण, स्वरोजगार, आधुनिक डिजाइन, निर्माण और टिकाऊ विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बनता जा रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान, स्वयं सहायता समूह (SHG), कारीगर और छोटे उद्यमी बांस को नए उत्पादों और आधुनिक तकनीक से जोड़कर अपनी आजीविका के नए रास्ते बना रहे हैं।
इस बदलाव की एक प्रेरक कहानी असम की विशाखा दीदी से जुड़ी है। वर्ष 2014 में उन्होंने बांस का थैला तैयार किया था। इसके बाद वह स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं और अपने ससुर के पारंपरिक बांस शिल्प व्यवसाय को नए डिजाइन और उत्पादों के साथ आगे बढ़ाया। सरकारी सहायता और विभिन्न प्रदर्शनियों के माध्यम से उनके उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंच मिली। वर्ष 2025 में उन्होंने भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में हिस्सा लिया और बांस उत्पादों की बिक्री से करीब 2 लाख रुपये की आय अर्जित की। इस तरह एक पारंपरिक शिल्प धीरे-धीरे आधुनिक उद्यम का रूप लेने लगा।
2017 का बदलाव बना बांस उद्योग के लिए महत्वपूर्ण मोड़
भारत में बांस की आर्थिक क्षमता लंबे समय से मौजूद थी, लेकिन पुराने नियमों के कारण इसका पूरा लाभ उठाना आसान नहीं था। ब्रिटिश काल के कानून के तहत बांस को पेड़ की श्रेणी में रखा गया था। इसके कारण निजी भूमि पर उगाए गए बांस की कटाई और परिवहन से जुड़े नियम कई लोगों के लिए बाधा बनते थे।
हालांकि, 2017 में बांस को पेड़ की परिभाषा से बाहर करने का फैसला इस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण बदलाव साबित हुआ। इसके बाद निजी भूमि पर उगाए जाने वाले बांस को कई प्रतिबंधात्मक वन नियमों से राहत मिली। परिणामस्वरूप किसानों, कारीगरों और उद्यमियों के लिए बांस की खेती, प्रसंस्करण और कारोबार के नए अवसर विकसित हुए।
विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत में इसका प्रभाव दिखाई दे रहा है। यहां बांस पहले से ही स्थानीय संस्कृति और आजीविका का हिस्सा रहा है। अब तकनीक और आधुनिक बाजार से जुड़ने के कारण पारंपरिक ज्ञान को नए व्यावसायिक अवसरों में बदला जा रहा है।
सिक्किम से त्रिपुरा तक आधुनिक उद्यमिता
सिक्किम में गंगटोक के पास फैशन डिजाइनर और सतत विकास की प्रणेता चिमी ओंगमु भूटिया का लगस्टल डिजाइन स्टूडियो इसका उदाहरण है। महिलाओं द्वारा संचालित यह विनिर्माण उद्यम बांस से हस्तशिल्प, अगरबत्ती, फर्नीचर और इंटीरियर डेकोरेशन से जुड़े उत्पाद तैयार करता है। इस पहल में बांस को पारंपरिक उपयोग से आगे ले जाकर आधुनिक डिजाइन और बाजार की जरूरतों के अनुरूप उत्पादों में बदला जा रहा है।
इसी तरह त्रिपुरा में बिजय सूत्रधार ने बांस उत्पादों के निर्माण की प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए तकनीक को अपनाया। वहीं नगालैंड के दीमापुर क्षेत्र में स्वयं सहायता समूह बांस आधारित खाद्य उत्पादों में मूल्यवर्धन कर रहे हैं। दूसरी ओर, खोरोलो क्रिएटिव क्राफ्ट्स जैसे स्थानीय उद्यम बांस से फर्नीचर और हस्तशिल्प तैयार कर रहे हैं।
मिजोरम के मामित जिले में भी बांस की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देने के प्रयास हो रहे हैं। बांस के ऊतक संवर्धन और पॉलीहाउस प्रबंधन जैसी तकनीकों के इस्तेमाल से इसकी खेती को अधिक व्यवस्थित और उत्पादक बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है।
राष्ट्रीय बांस मिशन से किसानों को मिल रहा सहारा
बांस क्षेत्र में बड़े बदलाव के लिए केवल कारीगरों की मेहनत पर्याप्त नहीं है। इसके साथ आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण, प्रसंस्करण सुविधाएं और बाजार तक पहुंच भी जरूरी है। ऐसे में सरकारी योजनाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
राष्ट्रीय बांस मिशन के माध्यम से बांस किसानों, उत्पादकों और कारोबारियों को खेती, प्रसंस्करण और बाजार से जुड़ने में सहायता देने पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री उपलब्ध कराने के लिए नर्सरियों को भी सहयोग दिया जाता है।
मध्य प्रदेश के किसान विजय पाटीदार का अनुभव इसकी उपयोगिता को दर्शाता है। पारंपरिक खेती में लगातार नुकसान के बाद उन्होंने वर्ष 2019 में बांस की खेती शुरू की। बांस मिशन के सहयोग से उन्होंने करीब 4,000 पौधे लगाए। लगभग दो वर्षों के भीतर उन्होंने बांस की बल्लियों की बिक्री से करीब 75,000 रुपये की आय अर्जित की।
इसके साथ ही बांस के बीच अंतरफसल के रूप में उन्होंने मिर्च, शिमला मिर्च, अदरक और लहसुन जैसी फसलें भी उगाईं। इससे बांस की खेती उनके लिए केवल एक फसल नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आजीविका का माध्यम बन गई।
तकनीक से बढ़ रहा बांस का मूल्य
बांस की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में नॉर्थ ईस्ट सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन एंड रीच (NECTAR) जैसी संस्थाओं का भी योगदान महत्वपूर्ण है। खाद्य एवं कृषि प्रसंस्करण, निर्माण सामग्री, विनिर्माण मशीनरी, नवीकरणीय ऊर्जा और औद्योगिक उत्पादों जैसे क्षेत्रों में बांस आधारित तकनीकों और व्यावसायिक अनुप्रयोगों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इन प्रयासों से बांस उत्पादों में मूल्यवर्धन की संभावनाएं बढ़ी हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कई पहलों ने बांस उत्पादों के मूल्यवर्धन को करीब 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 70 प्रतिशत तक पहुंचाने में मदद की है। इसके अलावा, इन गतिविधियों से हर साल लगभग 3 करोड़ मानव-दिवस रोजगार सृजित होने का उल्लेख किया गया है।
इंजीनियर्ड बांस इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसमें बांस के रेशों, पट्टियों या कणों को विशेष प्रक्रिया के माध्यम से जोड़कर और दबाकर मजबूत मिश्रित सामग्री तैयार की जाती है। इसके इस्तेमाल से फर्नीचर, निर्माण और इंटीरियर डिजाइन के क्षेत्र में नए विकल्प विकसित हुए हैं।
आपदा राहत और पुनर्वास के क्षेत्र में भी इंजीनियर्ड बांस का इस्तेमाल बढ़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इससे 42 लाख वर्ग फुट से अधिक संरचनाएं तैयार की जा चुकी हैं। छत्तीसगढ़ में करीब 20,000 बच्चों के लिए 576 स्कूल कक्ष भी इंजीनियर्ड बांस से बनाए गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि बांस अब केवल ग्रामीण हस्तशिल्प तक सीमित संसाधन नहीं है।
बांस उद्योग में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
बांस आधारित मूल्य शृंखला में महिलाओं की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में गढ़चिरोली अगरबत्ती परियोजना (GAP) इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। वर्ष 2012 में शुरू हुई इस पहल के तहत जिले में बांस आधारित अगरबत्ती उत्पादन केंद्र स्थापित किए गए।
वर्ष 2020 तक ऐसे 32 केंद्र संचालित हो रहे थे, जिनमें करीब 1,100 लोग काम कर रहे थे। इनमें लगभग 90 प्रतिशत श्रमिक महिलाएं थीं। प्रत्येक महिला की मासिक आय करीब 5,000 रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई। साथ ही, रोजगार के दिनों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई और काम का अवसर सालाना 45-60 दिनों से बढ़कर 225 दिनों से अधिक हो गया।
महिलाओं के लिए इस पहल का महत्व केवल आय तक सीमित नहीं रहा। उन्हें नए कौशल सीखने, आत्मविश्वास विकसित करने और नेतृत्व की भूमिका निभाने के अवसर भी मिले। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने से वनों पर आजीविका के लिए निर्भरता कम करने में भी मदद मिली।
प्रशिक्षण से बन रहा नया हरित कौशल
बांस आधारित उद्यमों को मजबूत करने के लिए प्रशिक्षण और क्षमता विकास भी जरूरी है। इसी दिशा में सीएसआईआर-राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (CSIR-NEERI), नागपुर ने जून 2026 में महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए बांस हस्तशिल्प पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया।
कार्यक्रम का विषय फ्लाई ऐश डंप पर उगाए गए बांस से हस्तशिल्प के जरिए महिला स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाना था। प्रशिक्षण में बांस की कटाई, उपचार, प्रसंस्करण, हस्तशिल्प निर्माण, मूल्यवर्धित उत्पाद, उद्यमिता, ब्रांडिंग, मार्केटिंग और उत्पाद डिजाइन जैसे विषयों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।
इस पहल का एक और महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण से जुड़ा है। पुनः प्राप्त फ्लाई ऐश डंप स्थलों को उत्पादक क्षेत्रों में बदलकर स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार और पर्यावरणीय लाभ पैदा करने की संभावना दिखाई गई है।
बांस से बन रहा आत्मनिर्भरता का नया मॉडल
आज भारत में बांस की कहानी तेजी से बदल रही है। किसान इसे खेती और अतिरिक्त आय के साधन के रूप में अपना रहे हैं। महिलाएं बांस आधारित उत्पादों के जरिए आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। वहीं युवा और उद्यमी आधुनिक डिजाइन, तकनीक और बाजार की मदद से नए उत्पाद विकसित कर रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बांस अब केवल कच्चा संसाधन नहीं रह गया है। खेती से लेकर प्रसंस्करण, डिजाइन, निर्माण, विपणन और निर्यात तक इसकी पूरी मूल्य शृंखला विकसित हो रही है। इसलिए बांस भारत में हरित उद्यमिता और टिकाऊ आजीविका का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

