BHU में दिव्यांग विद्यार्थियों का छात्रावास आवंटन को लेकर विरोध, 2014 की नियमावली लागू करने की मांग

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रिपोर्ट- धर्मेंन्द्र पाण्डेय 

वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) में दिव्यांग विद्यार्थियों के छात्रावास आवंटन का मुद्दा लगातार गंभीर होता जा रहा है। विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर वर्ष 2014 में पारित छात्रावास संबंधी नियमावली का पिछले चार-पांच वर्षों से प्रभावी ढंग से पालन नहीं करने का आरोप लगाया है। विद्यार्थियों का कहना है कि नियमावली में पात्र दिव्यांग विद्यार्थियों को छात्रावास उपलब्ध कराने का स्पष्ट प्रावधान है, इसके बावजूद प्रवेश मिलने के बाद भी उन्हें आवास के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है।

इस मामले को लेकर दिव्यांग विद्यार्थियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। विद्यार्थियों का आरोप है कि विश्वविद्यालय के विभिन्न छात्रावासों में कमरे उपलब्ध होने के बावजूद पात्र विद्यार्थियों को उनका आवंटन नहीं किया जा रहा है। वहीं, दूसरी ओर खाली कमरों को अतिथि शुल्क के आधार पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है। ऐसे में विद्यार्थियों ने प्रशासन की छात्रावास आवंटन प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

2014 की नियमावली लागू करने की मांग

दिव्यांग विद्यार्थियों के मुताबिक वर्ष 2014 में पारित नियमावली में अलग-अलग श्रेणी के दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए छात्रावास आवंटन का प्रावधान किया गया था। विद्यार्थियों का दावा है कि नियमावली के अनुसार 40 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक दृष्टिबाधित विद्यार्थियों तथा 70 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता वाले अन्य विद्यार्थियों को छात्रावास आवंटित किया जाना चाहिए।

विद्यार्थियों का कहना है कि नियमावली में पात्रता का प्रावधान होने के बावजूद पिछले कई वर्षों से इसका अपेक्षित रूप से अनुपालन नहीं हो रहा है। परिणामस्वरूप जिन विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलने के बाद छात्रावास की सुविधा मिलनी चाहिए, उन्हें रहने की व्यवस्था के लिए अलग-अलग स्तर पर प्रयास करना पड़ रहा है।

विद्यार्थियों के अनुसार यह समस्या केवल आवास तक सीमित नहीं है। विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक आवास उनकी शिक्षा को सुचारु रूप से जारी रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए छात्रावास आवंटन को उनके लिए सामान्य सुविधा के बजाय आवश्यक शैक्षणिक सहयोग के रूप में देखा जाना चाहिए।

खाली कमरों के बावजूद आवंटन नहीं होने का आरोप

दिव्यांग विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि कई छात्रावासों में कमरे खाली हैं। विद्यार्थियों का आरोप है कि इन कमरों को अतिथि शुल्क पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन दूसरी ओर छात्रावास के लिए पात्र दिव्यांग विद्यार्थियों को उन्हीं उपलब्ध कमरों का नियमित आवंटन नहीं किया जा रहा है।

विद्यार्थियों का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय परिसर में आवासीय क्षमता उपलब्ध है तो नियमावली के दायरे में आने वाले विद्यार्थियों को इसका लाभ मिलना चाहिए। उनका सवाल है कि खाली कमरों का उपयोग पात्र विद्यार्थियों के लिए क्यों नहीं किया जा रहा है।

इसके अलावा विद्यार्थियों का कहना है कि बाहर रहकर पढ़ाई करने में उन्हें कई अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। परिवहन, आवागमन, आर्थिक खर्च और पढ़ाई के लिए उपयुक्त वातावरण जैसी चुनौतियां उनकी शैक्षणिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय परिसर में छात्रावास उपलब्ध होना उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

चार-पांच वर्षों से लगातार पत्राचार

विद्यार्थियों के अनुसार छात्रावास आवंटन की समस्या नई नहीं है। पिछले चार-पांच वर्षों से वे लगातार विश्वविद्यालय प्रशासन के विभिन्न अधिकारियों के समक्ष अपनी मांग रखते आ रहे हैं। विद्यार्थियों ने अधिष्ठाता छात्र कल्याण समेत विश्वविद्यालय के अन्य संबंधित अधिकारियों और कुलपति तक अपनी समस्या पहुंचाने का दावा किया है।

हालांकि, विद्यार्थियों का कहना है कि लगातार पत्राचार और शिकायतों के बावजूद अभी तक स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। उनका आरोप है कि हर बार समस्या के समाधान को लेकर उम्मीद बनती है, लेकिन ठोस स्तर पर प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाती।

इसी क्रम में विद्यार्थियों ने 8 सितंबर को संयुक्त कुलसचिव एवं दिव्यांगता प्रकोष्ठ प्रमुख को प्रार्थना-पत्र सौंपा। इसमें उन्होंने छात्रावास आवंटन से संबंधित अपनी मांगों को रखा और प्रशासन से लिखित आश्वासन देने की मांग की।

प्रशासन को 24 घंटे का समय

विद्यार्थियों ने अपनी मांगों पर कार्रवाई के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को 24 घंटे का समय दिया है। उनका कहना है कि यदि प्रशासन लिखित रूप से यह स्पष्ट करता है कि नियमावली का पालन किस तिथि से और किस प्रक्रिया के तहत किया जाएगा, तो वे अपने आंदोलन को लेकर आगे का निर्णय उसी आधार पर करेंगे।

विद्यार्थियों ने प्रशासन से केवल मौखिक आश्वासन के बजाय लिखित कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि लंबे समय से समस्या लंबित होने के कारण अब स्पष्ट समयसीमा जरूरी है, ताकि छात्रावास आवंटन को लेकर स्थिति साफ हो सके।

तीन प्रमुख मांगों पर अड़े विद्यार्थी

दिव्यांग विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने मुख्य रूप से तीन मांगें रखी हैं। पहली मांग वर्ष 2014 की नियमावली के अनुपालन को लेकर है। विद्यार्थियों का कहना है कि प्रशासन लिखित रूप से स्पष्ट तिथि निर्धारित करे, जिसके बाद नियमावली के तहत पात्र विद्यार्थियों को छात्रावास आवंटन सुनिश्चित किया जाए।

दूसरी प्रमुख मांग उन दिव्यांग विद्यार्थियों को उपलब्ध खाली कमरों में रहने की अनुमति देने की है, जिन्हें अभी तक छात्रावास नहीं मिल सका है। विद्यार्थियों का तर्क है कि जब कमरे उपलब्ध हैं तो पात्र विद्यार्थियों को तत्काल राहत दी जानी चाहिए।

तीसरी मांग नए विद्यार्थियों से लिए जा रहे अतिथि शुल्क की वापसी से संबंधित है। विद्यार्थियों का कहना है कि छात्रावास आवंटन की स्थिति स्पष्ट नहीं होने के कारण उनसे लिए गए शुल्क के संबंध में भी प्रशासन को उचित निर्णय लेना चाहिए।

10 सितंबर को सेंट्रल ऑफिस पर धरना

मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में दिव्यांग विद्यार्थियों ने 10 सितंबर को दोपहर 12 बजे से BHU के सेंट्रल ऑफिस पर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन करने का ऐलान किया है।

विद्यार्थियों का कहना है कि उनका उद्देश्य विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ किसी प्रकार का विवाद खड़ा करना नहीं, बल्कि लंबे समय से लंबित समस्या का समाधान कराना है। वे चाहते हैं कि प्रशासन नियमावली और पात्रता के आधार पर छात्रावास आवंटन की प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से स्पष्ट करे।

विद्यार्थियों ने यह भी कहा है कि यदि प्रशासन उनकी मांगों पर लिखित आश्वासन देता है और कार्रवाई के लिए निश्चित समयसीमा तय करता है, तो वे प्रशासन द्वारा दिए गए समय तक अपना धरना स्थगित करने पर विचार कर सकते हैं।

स्थायी समाधान की मांग

दिव्यांग विद्यार्थियों का कहना है कि विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ने वाले विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के लिए छात्रावास की सुविधा शिक्षा की निरंतरता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। इसलिए इस समस्या का समाधान केवल तत्काल राहत तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिससे भविष्य में भी पात्र विद्यार्थियों को छात्रावास आवंटन के लिए बार-बार आवेदन और पत्राचार न करना पड़े।

विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि वर्ष 2014 की नियमावली के प्रावधानों की समीक्षा करते हुए उनके प्रभावी अनुपालन की स्थिति स्पष्ट की जाए। साथ ही, वर्तमान में छात्रावास के लिए पात्र विद्यार्थियों को प्राथमिकता के आधार पर राहत देने की प्रक्रिया शुरू की जाए।

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