कानपुर में मनाई गई पद्मश्री गिरिराज किशोर की 90वीं जयंती, साहित्यिक योगदान और गांधीवादी विचारों को किया याद
रिपोर्ट – विक्की रघुवंशी
कानपुर: हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित उपन्यासकार, चिंतक और पद्मश्री सम्मान से अलंकृत साहित्यकार गिरिराज किशोर की 90वीं जयंती बुधवार को कानपुर में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई।
पद्मश्री गिरिराज किशोर स्मृति संस्थान के तत्वावधान में हरिहरनाथ शास्त्री भवन, खलासी लाइन में आयोजित इस कार्यक्रम में शहर के वरिष्ठ साहित्यकारों, गांधीवादी चिंतकों, समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने गिरिराज किशोर के साहित्य, उनके व्यक्तित्व, गांधीवादी विचारधारा और हिंदी भाषा के प्रति उनके अमूल्य योगदान को विस्तार से याद किया।
इस अवसर पर उपस्थित सभी अतिथियों ने गिरिराज किशोर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की और उनके साहित्यिक जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किए।
वक्ताओं का कहना था कि गिरिराज किशोर केवल एक सफल उपन्यासकार ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज, इतिहास और मानवीय मूल्यों को साहित्य के माध्यम से प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करने वाले दुर्लभ रचनाकार थे।
सहज व्यक्तित्व और गहन साहित्यिक दृष्टि के लिए जाने जाते थे गिरिराज किशोर
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि गिरिराज किशोर के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहजता, सरलता और निरंतर सृजनशीलता थी।
उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन का सशक्त साधन समझा।
वक्ताओं ने बताया कि उनका जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक जमींदार परिवार में हुआ था।
प्रारंभिक शिक्षा वहीं प्राप्त करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया और वर्ष 1960 में आगरा विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ सोशल वर्क (MSW) की उपाधि प्राप्त की।
इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक उत्तर प्रदेश सरकार में सेवा दी। हालांकि साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें स्वतंत्र लेखन की ओर प्रेरित किया और उन्होंने पूर्णकालिक साहित्य साधना का मार्ग अपनाया।
कानपुर विश्वविद्यालय से आईआईटी कानपुर तक का सफर
वक्ताओं ने उनके प्रशासनिक और शैक्षणिक योगदान पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि गिरिराज किशोर ने कानपुर विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव तथा उप कुलसचिव के रूप में कार्य किया। बाद में वे आईआईटी कानपुर में कुलसचिव नियुक्त हुए।
आईआईटी कानपुर में रहते हुए उन्होंने सेंटर फॉर क्रिएटिव राइटिंग की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पहल ने साहित्य और रचनात्मक लेखन को नई दिशा देने का कार्य किया। वर्ष 1997 में वे यहीं से सेवानिवृत्त हुए, लेकिन साहित्यिक गतिविधियों से उनका जुड़ाव लगातार बना रहा।
‘पहला गिरमिटिया’ बनी हिंदी साहित्य की कालजयी कृति
कार्यक्रम में सबसे अधिक चर्चा गिरिराज किशोर के प्रसिद्ध उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ की रही। वक्ताओं ने बताया कि यह उपन्यास महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास और वहां हुए उनके संघर्ष पर आधारित है।
इस महत्वपूर्ण कृति को तैयार करने में गिरिराज किशोर ने लगभग आठ वर्ष का समय लगाया।
शोध कार्य के लिए उन्होंने भारत के अलावा मॉरीशस, लंदन, पीटरमैरिट्जबर्ग, टॉल्स्टॉय फार्म और फीनिक्स सेटलमेंट जैसे ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण किया।
गहन अध्ययन और शोध के बाद तैयार यह उपन्यास हिंदी साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृतियों में गिना जाता है।
वक्ताओं का कहना था कि “पहला गिरमिटिया” केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि महात्मा गांधी के व्यक्तित्व, विचारों और संघर्ष को समझने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।
आने वाली पीढ़ियों के लिए यह पुस्तक इतिहास और साहित्य का अमूल्य स्रोत बनी रहेगी।
पद्मश्री सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से हुए सम्मानित
गिरिराज किशोर के साहित्यिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सम्मान मिला। वर्ष 2007 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया गया।
इसके अतिरिक्त उनके उपन्यास “ढाई घर” के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, “परिशिष्ट” के लिए मध्य प्रदेश साहित्य परिषद का अखिल भारतीय सम्मान तथा नाटक “चेहरे-चेहरे किसके चेहरे” के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का भारतेंदु पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
उन्हें साहित्य भूषण सम्मान, के.के. बिरला फाउंडेशन का व्यास सम्मान, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार तथा भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा भी सम्मानित किया गया।
वर्ष 2019 में उन्हें भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला की नेशनल फेलोशिप प्रदान की गई। इसके अलावा साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा उन्हें इटली भेजे गए भारतीय प्रतिनिधिमंडल का सदस्य भी बनाया गया।
गांधीवादी विचारों के प्रबल समर्थक थे गिरिराज किशोर
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि गिरिराज किशोर के साहित्य में गांधीवादी दर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनके लेखन में सत्य, अहिंसा, सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय संवेदनाओं को विशेष महत्व दिया गया है।
वक्ताओं ने यह भी उल्लेख किया कि गांधी जी का एक विचार—“मनुष्य का जन्म केवल परिवार के लिए नहीं, बल्कि देश को कुछ देने के लिए भी होता है”—ने गिरिराज किशोर के जीवन और लेखन को गहराई से प्रभावित किया। यही कारण था कि उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से समाज को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास किया।
आईआईटी कानपुर में ‘गिरिराज किशोर शोध पीठ’ स्थापित करने की मांग
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने मांग उठाई कि आईआईटी कानपुर में ‘गिरिराज किशोर शोध पीठ’ की स्थापना की जाए।
वक्ताओं का मानना था कि इससे उनके साहित्य, शोध कार्य और गांधीवादी चिंतन पर व्यवस्थित अध्ययन को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही नई पीढ़ी को उनके साहित्य और विचारों से परिचित कराने का एक स्थायी मंच भी उपलब्ध होगा।
नई पीढ़ी तक पहुंचे गिरिराज किशोर का साहित्य
कार्यक्रम में मौजूद सभी साहित्यकारों और समाजसेवियों ने यह संकल्प लिया कि गिरिराज किशोर की रचनाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जाएंगे।
उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यम, साहित्यिक संगोष्ठियां, पुस्तक प्रदर्शनियां और अध्ययन केंद्रों के माध्यम से युवा पीढ़ी को हिंदी साहित्य की इस अमूल्य धरोहर से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में रही गणमान्य लोगों की उपस्थिति
कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थान के अध्यक्ष दीपक मालवीय ने की, जबकि संचालन महामंत्री सुरेश गुप्ता ने किया।
इस अवसर पर आशीष त्रिपाठी, मदन मोहन शुक्ला, डॉ. खान फारुक, नौशाद आलम मंसूरी, डॉ. आरती वर्मा, डॉ. राधेश्याम मिश्रा, डॉ. मनोहर राजपूत, मुकेश श्रीवास्तव, जयनारायण गुप्त भारती, आर.पी. कनौजिया, मोहम्मद उस्मान, पीयूष यादव, प्रताप साहनी, राधेश्याम दीक्षित, देव कुमार, अजीत खोटे, ब्रजराज राजावत सहित अनेक साहित्यकार, समाजसेवी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
कानपुर में आयोजित पद्मश्री गिरिराज किशोर की 90वीं जयंती केवल एक स्मृति समारोह नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य, गांधीवादी विचारधारा और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को याद करने का महत्वपूर्ण अवसर भी रही।
वक्ताओं ने उनके साहित्य को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प लिया और आईआईटी कानपुर में “गिरिराज किशोर शोध पीठ” स्थापित करने की मांग दोहराई।
गिरिराज किशोर का साहित्य आज भी सामाजिक सरोकारों, मानवीय मूल्यों और ऐतिहासिक चेतना का सशक्त दस्तावेज माना जाता है।
यही कारण है कि हिंदी साहित्य में उनका योगदान आने वाले समय में भी नई पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

