मानव-वन्यजीव संघर्ष पर लखीमपुर खीरी में मिशन मोड रणनीति, गांव-गांव बढ़ेगी निगरानी
रिपोर्ट- शरद अवस्थी
लखीमपुर खीरी। जिले में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष की घटनाओं को रोकने के लिए जिला प्रशासन ने अब व्यापक और समन्वित रणनीति तैयार की है। बुधवार शाम आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम, संवेदनशील गांवों की निगरानी, ग्रामीणों की जागरूकता और विभागों के बीच बेहतर समन्वय को लेकर विस्तार से मंथन किया गया। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि अब केवल घटना होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय संभावित खतरे की पहले पहचान कर उसकी रोकथाम पर जोर दिया जाएगा।
बैठक की अध्यक्षता जिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह ने की। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को रोकने के लिए सभी संबंधित विभाग मिशन मोड में काम करें। खास तौर पर जंगल से सटे गांवों और उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाए, जहां पहले वन्यजीवों की गतिविधियां या संघर्ष की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
ग्रामीणों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता
डीएम ने कहा कि ग्रामीणों की सुरक्षा जिला प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसलिए वन विभाग और अन्य संबंधित विभाग मिलकर ऐसी कार्ययोजना तैयार करें, जिसका प्रभाव सीधे गांवों, खेतों और पशुशालाओं तक दिखाई दे। इसके साथ ही किसी क्षेत्र में वन्यजीव की मौजूदगी की सूचना मिलने पर तत्काल प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।
उन्होंने कहा कि ग्रामीणों को केवल घटना के बाद जानकारी देने के बजाय पहले से संभावित खतरे के प्रति जागरूक करना आवश्यक है। इसके लिए ग्राम चौपालों, जनजागरूकता अभियानों और स्थानीय स्तर पर सूचना तंत्र को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया।
डीएफओ ने आंकड़ों के साथ रखी स्थिति
बैठक में डीएफओ तापस मिहिर और कीर्ति चौधरी ने जिले में मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति का विस्तृत प्रस्तुतीकरण किया। उन्होंने वर्षवार आंकड़ों के साथ वन विभाग की ओर से किए जा रहे रोकथाम के प्रयासों की जानकारी अधिकारियों के सामने रखी।
प्रस्तुतीकरण के दौरान संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी, गश्त, ग्रामीण जागरूकता और वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किए जा रहे कार्यों पर चर्चा हुई। अधिकारियों ने बताया कि जिन क्षेत्रों में पूर्व में घटनाएं हुई हैं, वहां अतिरिक्त सतर्कता बरतना जरूरी है। ऐसे स्थानों पर वन विभाग की निगरानी के साथ-साथ ग्रामीणों को भी सुरक्षा उपायों की लगातार जानकारी दी जाएगी।
जंगल की सीमा से गांव तक बनेगी सुरक्षा की चेन
बैठक में वन क्षेत्र से सटे गांवों को विशेष रूप से ध्यान में रखते हुए सुरक्षा की एक मजबूत चेन तैयार करने पर जोर दिया गया। इसके तहत जंगल की सीमा से लेकर गांव और खेतों तक संभावित जोखिम वाले स्थानों को चिन्हित किया जाएगा।
खेतों में इंटरक्रॉपिंग फसलों को बढ़ावा देने के सुझाव पर भी चर्चा हुई। साथ ही ग्रामीणों को खेती के दौरान सामूहिक रूप से काम करने के लिए प्रोत्साहित करने की बात कही गई। प्रशासन का मानना है कि जंगल से लगे क्षेत्रों में अकेले काम करने के बजाय समूह में कृषि गतिविधियां करने से संभावित जोखिम को कम किया जा सकता है।
इसके अलावा ग्राम चौपालों को जनजागरूकता का प्रभावी माध्यम बनाने के निर्देश दिए गए हैं। चौपालों में वन विभाग के अधिकारियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी, ताकि ग्रामीणों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार वन्यजीवों से सुरक्षित रहने के व्यावहारिक उपाय बताए जा सकें।
खेतों में अकेले जाने से बचने की सलाह
जंगल से सटे खेतों में काम करने वाले ग्रामीणों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाएगी। उन्हें समूह में खेतों की ओर जाने और आसपास की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जागरूक किया जाएगा।
बैठक में ग्रामीणों को गले में गमछा बांधकर रखने तथा मोबाइल फोन पर तेज आवाज में गाना बजाने जैसी सावधानियों की जानकारी देने पर भी चर्चा हुई। इसका उद्देश्य आसपास मौजूद वन्यजीवों को मानव गतिविधि का संकेत देना और अचानक आमना-सामना होने की संभावना को कम करना है।
हालांकि, ग्रामीणों को किसी भी वन्यजीव के सामने आने पर उसे परेशान या उकसाने के बजाय सुरक्षित दूरी बनाए रखने और संबंधित विभाग को सूचना देने के लिए भी जागरूक किया जाएगा।
रात में विशेष सतर्कता, खुले में न सोने की अपील
मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम के लिए रात्रिकालीन सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया गया। ग्रामीणों को रात के समय अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से बचने तथा घर के बाहर खुले में न सोने के लिए जागरूक किया जाएगा।
पशुओं की सुरक्षा को लेकर भी प्रशासन ने दिशा-निर्देश दिए हैं। पशुपालन विभाग को ग्रामीणों को पशुओं को सुरक्षित स्थान पर रखने और पशुशालाओं की व्यवस्था बेहतर करने के संबंध में आवश्यक जानकारी देने को कहा गया है। इस तरह प्रशासन का प्रयास केवल ग्रामीणों की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पशुधन की सुरक्षा को भी योजना का हिस्सा बनाया जाएगा।
संवेदनशील गांवों में बढ़ेगी निगरानी
प्रशासन की नई रणनीति में संवेदनशील इलाकों की पहचान और वहां निगरानी बढ़ाना प्रमुख बिंदु है। जिन गांवों में पहले वन्यजीवों की गतिविधियां अधिक रही हैं, वहां वन विभाग की गश्त और निगरानी को मजबूत किया जाएगा।
इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर सूचना मिलने की प्रक्रिया को भी तेज किया जाएगा। किसी ग्रामीण को वन्यजीव की गतिविधि दिखाई देने पर संबंधित विभाग तक सूचना जल्द पहुंचे, इसके लिए विभागीय समन्वय को प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया।
अंधेरे वाले स्थानों पर लगेंगी सोलर लाइट
रात के समय ग्रामीणों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए वन क्षेत्र से लगे गांवों में प्रकाश व्यवस्था मजबूत करने की योजना पर भी चर्चा हुई। संवेदनशील स्थानों पर सोलर लाइट लगाने के लिए स्थानों को चिह्नित किया जाएगा।
मुख्य विकास अधिकारी अभिषेक कुमार ने ऐसे स्थानों की पहचान कर प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करने की आवश्यकता बताई। इससे रात में ग्रामीणों की आवाजाही के दौरान दृश्यता बेहतर होगी और अंधेरे वाले स्थानों में सुरक्षा संबंधी जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी।
स्वास्थ्य और सुरक्षा व्यवस्था पर भी चर्चा
बैठक में मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़ी किसी संभावित घटना के बाद स्वास्थ्य सेवाओं और त्वरित सहायता की व्यवस्था पर भी विचार किया गया। संबंधित विभागों के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखने की आवश्यकता पर अधिकारियों ने जोर दिया।
सीएमओ डॉ. संतोष गुप्ता, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के प्रतिनिधियों, जिला गन्ना अधिकारी और जिला पंचायत राज अधिकारी सहित अन्य संबंधित अधिकारियों ने भी अपने सुझाव रखे। सभी ने संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने, ग्रामीणों को जागरूक करने और विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर सहमति जताई।
घटना के बाद नहीं, पहले होगी रोकथाम
बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि प्रशासन ने मानव-वन्यजीव संघर्ष को केवल कानून-व्यवस्था या वन विभाग से जुड़ा विषय मानने के बजाय इसे सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में लेने पर जोर दिया। इसके तहत वन विभाग, स्वास्थ्य विभाग, पशुपालन विभाग, पंचायत राज विभाग और स्थानीय प्रशासन मिलकर काम करेंगे।
प्रशासन की योजना है कि संभावित खतरे वाले इलाकों की पहचान पहले की जाए, ग्रामीणों को समय रहते सूचना दी जाए और जरूरत के अनुसार निगरानी तथा प्रकाश व्यवस्था बढ़ाई जाए। वहीं, ग्राम स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम लगातार चलाए जाएंगे।

