हनुमानजी ने माता वैष्णो देवी की रक्षा के लिए भैरवनाथ से किया था युद्ध – विस्तार से पढ़िए पूरी फिर आगे हुआ था क्या?
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जम्मू-कश्मीर के कटरा के पास त्रिकुटा पर्वत पर स्थित माता वैष्णो देवी का धाम देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि इसी पवित्र पर्वत क्षेत्र में माता वैष्णवी ने भैरवनाथ को मोक्ष प्रदान किया था। इस धार्मिक कथा में भगवान हनुमान जी की भी महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। कहा जाता है कि जब भैरवनाथ माता का पीछा करते हुए उनके तपस्थल तक पहुंच गए थे, तब पवनपुत्र हनुमानजी ने माता की रक्षा के लिए उनका मार्ग रोककर युद्ध किया था।
माता वैष्णो देवी का पवित्र भवन त्रिकुटा पर्वत की पहाड़ियों में लगभग 5,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां प्राकृतिक गुफा में माता के तीन पवित्र पिंडी स्वरूप विराजमान हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन तीन पिंडियों को महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। इन तीनों शक्तियों के संयुक्त स्वरूप को माता वैष्णो देवी कहा जाता है।
त्रिकुटा पर्वत से जुड़ी है प्राचीन मान्यता
माता वैष्णो देवी धाम से जुड़ी कथा में त्रिकुटा पर्वत का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि माता वैष्णवी ने इसी क्षेत्र में तपस्या की और बाद में भैरवनाथ को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराया।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भैरवनाथ की नजर एक दिव्य कन्या पर पड़ी। वह कन्या वास्तव में माता वैष्णवी थीं। भैरवनाथ उनके पीछे चल पड़े। माता ने उनसे बचने के लिए त्रिकुटा पर्वत की ओर प्रस्थान किया। इसी दौरान पवनपुत्र हनुमानजी भी माता की सेवा और रक्षा के लिए उनके साथ हो गए।
कहा जाता है कि यात्रा के दौरान हनुमानजी को प्यास लगी। उनके आग्रह पर माता ने अपने धनुष से बाण चलाकर पर्वत से जलधारा प्रकट की। इसी पवित्र जलधारा में माता ने अपने केश धोए। आज यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा हुआ माना जाता है।
नौ महीने तक गुफा में की तपस्या
इसके बाद माता एक गुफा में प्रवेश कर गईं और वहां नौ महीने तक तपस्या की। यह स्थान वर्तमान में अर्द्धकुमारी, आदिकुमारी और गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में हनुमानजी ने गुफा के बाहर रहकर माता की रक्षा की।
इसी क्षेत्र में माता की चरण पादुका का भी धार्मिक महत्व बताया जाता है। मान्यता है कि जब माता भैरवनाथ से बचते हुए आगे बढ़ रही थीं, तब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा था। इसी कारण इस स्थान को चरण पादुका से जोड़ा जाता है।
इस बीच भैरवनाथ भी माता की तलाश करते हुए वहां पहुंच गए। एक साधु ने उन्हें समझाया कि जिसे वह साधारण कन्या समझ रहे हैं, वह स्वयं आदिशक्ति जगदंबा का स्वरूप हैं। इसलिए उन्हें माता का पीछा छोड़ देना चाहिए। हालांकि, भैरवनाथ ने इस सलाह को स्वीकार नहीं किया।
हनुमानजी और भैरवनाथ के बीच हुआ युद्ध
कथा के अनुसार, माता गुफा से दूसरे मार्ग से बाहर निकल गईं। बाद में उन्होंने भैरवनाथ को वापस लौटने के लिए कहा। इसके बावजूद जब भैरवनाथ माता की गुफा की ओर बढ़ने लगे तो वहां पहरा दे रहे हनुमानजी ने उन्हें रोक दिया।
इसके बाद हनुमानजी और भैरवनाथ के बीच युद्ध हुआ। धार्मिक मान्यता के अनुसार दोनों के बीच काफी समय तक संघर्ष चलता रहा, लेकिन उसका कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकला। अंततः माता वैष्णवी ने महाकाली का स्वरूप धारण किया और भैरवनाथ का वध किया।
यह प्रसंग माता वैष्णो देवी की कथा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। हालांकि, इस कथा का मूल संदेश केवल संघर्ष से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह शक्ति, भक्ति और आत्मबोध से भी संबंधित माना जाता है।
भैरवनाथ को मिला मोक्ष का वरदान
पौराणिक मान्यता के अनुसार, अपने अंत के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने माता से क्षमा मांगी। माता वैष्णो देवी ने भैरवनाथ की इस प्रार्थना को स्वीकार किया और उन्हें मोक्ष का वरदान दिया।
कहा जाता है कि माता जानती थीं कि भैरवनाथ के मन में उनके प्रति आकर्षण के साथ-साथ मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा भी थी। इसलिए माता ने उन्हें केवल क्षमा ही नहीं किया, बल्कि एक विशेष वरदान भी दिया।
मान्यता है कि माता वैष्णो देवी ने कहा कि उनके दर्शन तभी पूर्ण माने जाएंगे, जब श्रद्धालु उनके दर्शन करने के बाद भैरवनाथ के दर्शन भी करेगा। इसी धार्मिक विश्वास के कारण आज भी माता वैष्णो देवी के भवन के दर्शन के बाद श्रद्धालु भैरवनाथ मंदिर की ओर जाते हैं।
आस्था और परंपरा का प्रमुख केंद्र है वैष्णो देवी धाम
माता वैष्णो देवी की यात्रा में भवन और भैरवनाथ मंदिर दोनों का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु कठिन पहाड़ी मार्ग से यात्रा करते हुए माता के भवन पहुंचते हैं और दर्शन के बाद भैरवनाथ मंदिर जाते हैं।
इस पूरी कथा में हनुमानजी की भूमिका भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का विषय है। मान्यता के अनुसार पवनपुत्र ने माता की सेवा करते हुए उनकी रक्षा का दायित्व निभाया था। वहीं, भैरवनाथ को अंततः माता की कृपा से मोक्ष प्राप्त हुआ।
इस प्रकार माता वैष्णो देवी से जुड़ी यह पौराणिक कथा भक्ति, शक्ति, क्षमा और मोक्ष की भावना को सामने रखती है। त्रिकुटा पर्वत पर स्थित यह धाम आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा और विश्वास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

