कानपुर नगर निगम में 594 करोड़ के बजट पर सवाल, टेंडर घोटाले में कार्रवाई तेज; कई अधिकारी जांच के घेरे में

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रिपोर्ट – नीरज तिवारी 

कानपुर: कानपुर नगर निगम में शहर के विकास कार्यों के लिए जारी किए गए 15वें वित्त आयोग के बजट को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। आरोप है कि विकास कार्यों के नाम पर आवंटित करीब 594 करोड़ रुपये के बजट में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं और बंदरबांट की गई। मामला सामने आने के बाद निगम की कार्यप्रणाली और बजट आवंटन को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वहीं, मुख्यमंत्री की सख्ती के बाद नगर निगम से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की जांच भी तेज होती दिखाई दे रही है।

हालांकि, इस पूरे प्रकरण में अभी जांच जारी है और आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच रिपोर्ट तथा संबंधित एजेंसियों की कार्रवाई के बाद ही हो सकेगी। इसके बावजूद जिस तरह से बजट आवंटन, टेंडर प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उससे नगर निगम की कार्यप्रणाली पर चर्चा तेज हो गई है।

15वें वित्त आयोग के बजट को लेकर उठे सवाल

जानकारी के मुताबिक, कानपुर नगर निगम के सभी छह जोन में विकास कार्यों के लिए 15वें वित्त आयोग के तहत बड़ी धनराशि प्रस्तावित की गई थी। आरोप है कि करीब 594 करोड़ रुपये के बजट आवंटन में समानता और प्राथमिकता के तय मानकों का पालन नहीं किया गया।

सबसे ज्यादा चर्चा जोन-2 को लेकर हो रही है। बताया जा रहा है कि इस जोन में वार्ड-62 के पार्षद भवानी शंकर राय के क्षेत्र के लिए करीब 14.41 करोड़ रुपये प्रस्तावित किए गए। दूसरी ओर, निगम के चार वार्ड—वार्ड 94, वार्ड 38, वार्ड 4 और वार्ड 10—ऐसे बताए जा रहे हैं, जिन्हें अब तक इस बजट से एक रुपये का भी आवंटन नहीं मिला।

यही अंतर अब जांच के प्रमुख बिंदुओं में शामिल हो सकता है। सवाल यह है कि विकास कार्यों के लिए धनराशि निर्धारित करने का आधार क्या था और अलग-अलग वार्डों में बजट वितरण के लिए कौन-से मानक अपनाए गए।

टेंडर प्रक्रिया भी जांच के दायरे में

बजट आवंटन के साथ ही नगर निगम के टेंडर प्रकरण ने भी मामले को गंभीर बना दिया है। आरोप है कि विकास कार्यों से संबंधित टेंडर प्रक्रिया में भी अनियमितताएं हुईं। इसी मामले में गोविंद शर्मा को मुख्य आरोपियों में बताया जा रहा है।

मामले की जांच के बीच केडीए ने फजलगंज स्थित गोविंद शर्मा के मकान को सील कर दिया है। बताया जा रहा है कि केडीए में नौकरी के दौरान उन्हें यह मकान आवंटित हुआ था। हालांकि, मकान को सील किए जाने की कार्रवाई से जुड़े सभी तथ्यों की आधिकारिक स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

इस कार्रवाई के बाद टेंडर प्रकरण में शामिल लोगों और प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों की जांच को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि टेंडर प्रक्रिया में नियमों का पालन हुआ था या नहीं और यदि अनियमितता हुई तो उसमें किन लोगों की भूमिका थी।

हेड क्लर्क निलंबित, दो अभियंता जांच के लिए ले जाए गए

मामले में नगर आयुक्त की ओर से भी कार्रवाई की गई है। नगर निगम के इंजीनियरिंग विभाग के हेड क्लर्क भूपेंद्र सिंह सचदेव को निलंबित कर दिया गया है। यह कार्रवाई टेंडर प्रकरण से जुड़ी जांच के बीच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

इसके अलावा जांच में दो अभियंताओं के नाम भी सामने आए हैं। बताया गया है कि आरके सिंह और अवर अभियंता कमलेश पटेल को एसआईटी अपने साथ जांच के लिए मुख्यालय ले गई। दोनों अभियंताओं से टेंडर प्रक्रिया और उससे जुड़े दस्तावेजों के संबंध में पूछताछ किए जाने की बात सामने आई है।

इस कार्रवाई से साफ है कि जांच अब केवल दस्तावेजों की समीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि नगर निगम के इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका भी जांची जा रही है।

बड़े सवालों के जवाब जांच के बाद मिलेंगे

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि विकास बजट में वास्तव में अनियमितता हुई है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन लोग हैं। साथ ही यह भी जांच का विषय है कि अलग-अलग वार्डों में बजट आवंटन के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई और क्या सभी प्रस्ताव नियमानुसार स्वीकृत किए गए थे।

वहीं, आरोपों के बीच राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा। इसलिए मेयर, नगर आयुक्त, पार्षदों या अन्य लोगों की भूमिका को लेकर सामने आए आरोपों की पुष्टि संबंधित जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर ही की जानी चाहिए।

दूसरी ओर, जांच में जिन अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम सामने आ रहे हैं, उनके दस्तावेजों और फैसलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। विशेष रूप से टेंडर जारी करने से लेकर कार्यों की स्वीकृति, भुगतान और बजट आवंटन तक की पूरी प्रक्रिया की जांच से ही वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

विकास कार्यों की गुणवत्ता पर भी नजर जरूरी

कानपुर जैसे बड़े शहर में विकास कार्यों के लिए मिलने वाला बजट सीधे जनता की सुविधाओं से जुड़ा होता है। सड़क, नाली, जल निकासी, प्रकाश व्यवस्था और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर खर्च होने वाली धनराशि का सही इस्तेमाल होना जरूरी है।

ऐसे में यदि बजट आवंटन या टेंडर प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता साबित होती है, तो उसका असर केवल सरकारी व्यवस्था पर नहीं बल्कि शहर के विकास पर भी पड़ता है। इसलिए जांच के साथ-साथ स्वीकृत विकास कार्यों की गुणवत्ता और वास्तविक स्थिति का भी परीक्षण महत्वपूर्ण होगा।

फिलहाल, 594 करोड़ रुपये के कथित बजट बंदरबांट और टेंडर प्रकरण को लेकर जांच आगे बढ़ रही है। हेड क्लर्क के निलंबन और दो अभियंताओं को एसआईटी द्वारा जांच के लिए ले जाए जाने के बाद उम्मीद है कि आने वाले समय में मामले से जुड़े और तथ्य सामने आएंगे। अब निगाहें जांच रिपोर्ट और आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं।

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