अमेरिका से रूस तक पहुंचा ब्रज का श्रृंगार, मुस्लिम कारीगरों के हुनर से 1400 करोड़ का कारोबार

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रिपोर्ट- योगेश भारद्वाज 

मथुरा-वृंदावन: भगवान श्रीकृष्ण की नगरी ब्रज की पहचान अब केवल मंदिरों, धार्मिक स्थलों और भक्ति परंपराओं तक सीमित नहीं है। यहां तैयार होने वाली ठाकुरजी की आकर्षक पोशाकें, मुकुट, बंसी और श्रृंगार की अन्य सामग्री देश की सीमाओं को पार कर अमेरिका से लेकर रूस तक अपनी पहचान बना रही हैं। खास बात यह है कि इस पारंपरिक कला को संवारने में बड़ी संख्या में मुस्लिम कारीगर भी वर्षों से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

मथुरा और वृंदावन की गलियों तथा मंदिरों के आसपास चलने वाले इन कारोबारों में तैयार होने वाली पोशाकों में ब्रज की पारंपरिक शैली और स्थानीय कारीगरी की झलक दिखाई देती है। कपड़े पर बारीक कढ़ाई, जरी-जरदोजी, मोती, नग और अन्य सजावटी सामग्री का इस्तेमाल करके ठाकुरजी और राधारानी के लिए विशेष पोशाकें तैयार की जाती हैं। वहीं, मुकुट और अन्य श्रृंगार सामग्री को भी आकर्षक ढंग से सजाया जाता है।

15 घंटे तक मेहनत करते हैं कारीगर

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, राधाष्टमी, होली और अन्य धार्मिक पर्वों के दौरान ठाकुरजी की पोशाक और श्रृंगार सामग्री की मांग अचानक बढ़ जाती है। ऐसे समय में कारीगरों को समय पर ऑर्डर पूरा करने के लिए रोजाना करीब 15 घंटे तक काम करना पड़ता है।

दरअसल, एक पोशाक तैयार करने की प्रक्रिया काफी मेहनत वाली होती है। सबसे पहले डिजाइन तय किया जाता है। इसके बाद कपड़े की कटिंग, सिलाई, कढ़ाई और सजावट का काम होता है। पोशाक के डिजाइन के अनुसार उस पर जरी, मोती, नग और दूसरी सजावटी सामग्री लगाई जाती है। इसके बाद फिनिशिंग और पैकिंग की जाती है।

इस पूरी प्रक्रिया में कई घंटे लग जाते हैं। विशेष डिजाइन या बड़े मंदिरों के लिए तैयार की जाने वाली पोशाकों में इससे भी अधिक समय लग सकता है। इसलिए पर्वों के पहले कारीगरों पर काम का दबाव काफी बढ़ जाता है।

द्वारिकाधीश मंदिर से बिहारीजी तक फैला कारोबार

मथुरा-वृंदावन में भगवान की पोशाक और श्रृंगार सामग्री का कारोबार मंदिरों के आसपास के प्रमुख बाजारों में लंबे समय से चल रहा है। द्वारिकाधीश मंदिर के आसपास से लेकर वृंदावन के बिहारीजी मंदिर क्षेत्र तक कई दुकानें और छोटे-बड़े कारखाने इस कारोबार से जुड़े हैं।

द्वारिकाधीश मंदिर के निकट कंठी-माला का कारोबार करने वाले मोहन अग्रवाल के अनुसार, ब्रज में आने वाले श्रद्धालुओं के बीच ठाकुरजी के श्रृंगार से जुड़ी वस्तुओं की मांग लगातार बनी रहती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले श्रद्धालु यहां से भगवान के लिए पोशाक, कंठी-माला, मुकुट और अन्य सामग्री खरीदकर अपने साथ ले जाते हैं।

वहीं, राधा वाली क्षेत्र में पोशाक का कारखाना चलाने वाले राजेश शर्मा के यहां भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के लिए अलग-अलग डिजाइन की पोशाकें तैयार की जाती हैं। यहां कारीगर कपड़े पर बारीकी से कढ़ाई और सजावट का काम करते हैं। पर्वों के दौरान ऑर्डर बढ़ने पर उत्पादन भी बढ़ाना पड़ता है।

विदेशों में बढ़ रही ब्रज की पोशाकों की मांग

पहले ब्रज में तैयार होने वाली पोशाकों की सबसे बड़ी मांग देश के मंदिरों और श्रद्धालुओं के बीच थी। हालांकि, अब ऑनलाइन कारोबार और सोशल मीडिया के विस्तार के कारण इन उत्पादों को विदेशों में भी ग्राहक मिल रहे हैं।

अमेरिका, रूस समेत कई देशों में रहने वाले भारतीय समुदाय के लोग ब्रज की पारंपरिक पोशाकों को पसंद कर रहे हैं। इसके अलावा विदेशों में स्थापित कृष्ण मंदिरों के लिए भी मथुरा-वृंदावन से पोशाक और श्रृंगार सामग्री भेजी जा रही है।

बिहारीजी मंदिर के निकट पोशाक का कारोबार करने वाले व्यापारी देवेंद्र अग्रवाल के अनुसार, ब्रज में तैयार होने वाली पोशाकों की खास डिजाइन और पारंपरिक शैली के कारण विदेशों में भी इनकी मांग बनी हुई है। देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी इनके लिए ऑर्डर आते हैं।

इस तरह, तकनीक और डिजिटल माध्यमों ने स्थानीय कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पहले जहां ग्राहक को ब्रज आकर सामान खरीदना पड़ता था, वहीं अब ऑनलाइन माध्यम से भी पोशाकों और श्रृंगार सामग्री के ऑर्डर लिए जा रहे हैं।

करीब 1400 करोड़ रुपये के कारोबार से जुड़ा बाजार

कारोबार से जुड़े लोगों के अनुसार, मथुरा-वृंदावन में भगवान की पोशाक, मुकुट और श्रृंगार सामग्री से जुड़ा बाजार करीब 1400 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। हालांकि, यह आंकड़ा कारोबार से जुड़े स्थानीय लोगों के अनुमान पर आधारित बताया जाता है।

इस पूरे कारोबार से केवल दुकानदार और बड़े व्यापारी ही नहीं जुड़े हैं। बल्कि कपड़ा विक्रेता, सिलाई करने वाले, कढ़ाई करने वाले, जरी-जरदोजी कारीगर, मुकुट तैयार करने वाले, सजावटी सामग्री बेचने वाले, पैकिंग कर्मचारी और परिवहन से जुड़े लोगों को भी इससे रोजगार मिलता है।

इस लिहाज से देखा जाए तो ठाकुरजी की पोशाक और श्रृंगार का कारोबार ब्रज की स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।

मुस्लिम कारीगर निभा रहे अहम भूमिका

ब्रज की इस परंपरा की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी की पोशाक तैयार करने के काम में बड़ी संख्या में मुस्लिम कारीगर भी जुड़े हुए हैं। कई कारीगर परिवार लंबे समय से इस काम को करते आ रहे हैं और अपनी पारंपरिक कढ़ाई तथा सजावट की कला को अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।

इन कारीगरों के हाथों से तैयार की गई महीन कढ़ाई पोशाकों को खास रूप देती है। किसी पोशाक पर फूलों की डिजाइन होती है तो किसी पर मोती और नगों से सजावट की जाती है। वहीं, कई विशेष पोशाकों में पारंपरिक ब्रज शैली को ध्यान में रखकर काम किया जाता है।

जन्माष्टमी और अन्य बड़े पर्वों से पहले इन कारीगरों के पास ऑर्डर बढ़ जाते हैं। परिणामस्वरूप, कारखानों में सुबह से लेकर देर रात तक काम चलता है। समय पर ऑर्डर पूरा करने के लिए कारीगर लगातार मेहनत करते हैं।

पीढ़ियों से आगे बढ़ रहा हुनर

ब्रज की पोशाक तैयार करने वाले कई कारीगर परिवारों के लिए यह केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला है। परिवार के बड़े सदस्य नई पीढ़ी को कपड़े पर कढ़ाई, डिजाइन बनाने और सजावट की बारीकियां सिखाते हैं।

समय के साथ इस कला में भी बदलाव आया है। पारंपरिक डिजाइन के साथ अब ग्राहकों की पसंद के अनुसार नए पैटर्न तैयार किए जा रहे हैं। इसके बावजूद पोशाकों में ब्रज की पारंपरिक पहचान को बनाए रखने पर जोर दिया जाता है।

यही कारण है कि मथुरा-वृंदावन में तैयार होने वाली पोशाकों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है।

ब्रज की संस्कृति का अंतरराष्ट्रीय विस्तार

ब्रज की पोशाकों का अमेरिका, रूस और दूसरे देशों तक पहुंचना केवल व्यापार की कहानी नहीं है। इसके माध्यम से ब्रज की संस्कृति, कला और पारंपरिक कारीगरी भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच रही है।

एक ओर मथुरा-वृंदावन के मंदिरों में ठाकुरजी और राधारानी इन पारंपरिक पोशाकों में भक्तों को दर्शन देते हैं। दूसरी ओर, यही पोशाकें विदेशों में स्थापित कृष्ण मंदिरों और भारतीय समुदायों के बीच ब्रज की पहचान को मजबूत कर रही हैं।

इस कारोबार में अलग-अलग समुदायों के कारीगरों और व्यापारियों की भागीदारी ब्रज की साझा सांस्कृतिक परंपरा को भी सामने लाती है। कारीगर अपनी कला के जरिए धार्मिक आस्था से जुड़े उत्पाद तैयार करते हैं और यही हुनर अब वैश्विक बाजार तक पहुंच रहा है।

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