कजरी तीज आज: अखंड सौभाग्य के लिए महिलाओं ने रखा निर्जला व्रत, जानिए पूजा विधि और पौराणिक कथा
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कजरी तीज 2026: हिंदू धर्म में तीज पर्व का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। इन्हीं प्रमुख तीज पर्वों में कजरी तीज का भी विशेष स्थान है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं मनोवांछित और सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए कजरी तीज का व्रत करती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी कारण यह व्रत महिलाओं के लिए आस्था और संकल्प का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।
कजरी तीज का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कजरी तीज का संबंध माता पार्वती और भगवान शिव से है। कहा जाता है कि माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपना पति मान चुकी थीं। हालांकि, उनके पिता राजा हिमाचल को भगवान शिव की वेशभूषा और रहन-सहन पसंद नहीं था। उन्होंने इस विषय में नारद मुनि से चर्चा की। इसके बाद नारदजी ने भगवान विष्णु से माता पार्वती का विवाह करने का सुझाव दिया।
माता पार्वती भगवान शिव को अपना पति मान चुकी थीं, इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु से विवाह करने से इनकार कर दिया। इसके बाद उनकी सखियों ने उन्हें ऐसी जगह ले जाने की योजना बनाई, जहां उनका विवाह भगवान विष्णु से न हो सके। सखियां माता पार्वती को वन में लेकर चली गईं। धार्मिक कथा के अनुसार, सखियों द्वारा माता पार्वती को हर ले जाने के कारण इस व्रत का नाम कजरी तीज पड़ा।
वन में माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसलिए कजरी तीज को दांपत्य सुख, प्रेम, समर्पण और दृढ़ संकल्प से जुड़ा पर्व माना जाता है।
निर्जला व्रत रखती हैं महिलाएं
कजरी तीज के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त होती हैं। इसके बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। इस दिन कई महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं और शाम के समय भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा करती हैं।
इसके साथ ही महिलाएं कजरी तीज पर मेहंदी लगाती हैं और हरे रंग की चूड़ियां पहनती हैं। हरे रंग को हरियाली, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस पर्व पर हरे रंग के परिधान और श्रृंगार का विशेष महत्व देखने को मिलता है।
कजरी तीज की पूजा विधि
कजरी तीज के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व जागकर स्नान करने के बाद पूजा की तैयारी करनी चाहिए। पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। परंपरा के अनुसार मिट्टी से शिव-पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा बनाकर पूजा करने का भी विधान बताया गया है।
संभव हो तो शिव-पार्वती के विग्रह को पवित्र मिट्टी से बनाकर केले के खंभों से मंडप तैयार किया जाता है। इसके बाद सुगंधित पुष्पों से पूजा स्थल को सजाया जाता है। पूजा के समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके दाहिने हाथ में जल, अक्षत, सुपारी, दक्षिणा और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लिया जाता है।
इसके बाद सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। उन्हें तिलक लगाकर दूर्वा अर्पित की जाती है। इसके पश्चात माता पार्वती को श्रृंगार की सामग्री और चुनरी अर्पित की जाती है। फिर भगवान शिव का पूजन किया जाता है।
भगवान शिव को बेलपत्र, शमी पत्र, पुष्प, धूप, दीप, चंदन, अक्षत, शहद, धतूरा और आक के फूल या फल आदि अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से पूजा संपन्न की जाती है।
शिव-पार्वती की पूजा में इन मंत्रों का करें जाप
माता गौरी की पूजा के दौरान श्रद्धालु श्रद्धा के साथ मंत्रों का जाप कर सकते हैं—
“ॐ उमायै नमः, पार्वत्यै नमः, जगद्धात्रयै नमः, जगत्प्रतिष्ठायै नमः, शान्तिस्वरूपिण्यै नमः, शिवायै नमः, ब्रह्मरूपिण्यै नमः।”
वहीं भगवान शिव की पूजा के दौरान “ॐ नमः शिवाय” पंचाक्षरी मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा भगवान शिव के विभिन्न नामों का स्मरण भी किया जाता है।
पूजा के अंत में माता पार्वती और भगवान शिव से सुखी दांपत्य जीवन, परिवार की समृद्धि और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना की जाती है। इसके बाद भगवान गणेश, शिव और माता पार्वती की आरती की जाती है।
कुंवारी कन्याओं के लिए भी विशेष है कजरी तीज
कजरी तीज केवल विवाहित महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि कुंवारी कन्याओं के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या की थी। इसलिए अविवाहित कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी और मनोवांछित वर की कामना से यह व्रत रखती हैं।
मान्यता के अनुसार इस अवसर पर सौन्दर्यलहरी या पार्वती मंगल स्तोत्र का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। हालांकि, पूजा-पाठ और व्रत की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं के अनुसार अलग हो सकती है।
आध्यात्मिक रूप से भी महत्वपूर्ण है यह पर्व
कजरी तीज को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि यह आत्मसंयम, संकल्प और आध्यात्मिक साधना का पर्व भी है। व्रत के माध्यम से श्रद्धालु अपनी आस्था को मजबूत करते हैं। साथ ही पूजा, भजन-कीर्तन और कथा श्रवण से मन को शांति मिलने की भावना जुड़ी हुई है।
इस प्रकार कजरी तीज भारतीय संस्कृति में नारी आस्था, दांपत्य जीवन की मंगलकामना और भगवान शिव-पार्वती के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। पूरे दिन व्रत रखने के बाद महिलाएं पूजा, कथा और आरती के माध्यम से पर्व को पूर्ण करती हैं। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार व्रत खोलने और पूजा के समय में अंतर हो सकता है, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा का पालन करना उचित माना जाता है।

