नेपाल में एवलांच के बाद फ्लैश फ्लड से भारी तबाही, ISRO की सैटेलाइट तस्वीरों में दिखा नुकसान

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नेपाल में एवलांच और फ्लैश फ्लड: नेपाल में हाल ही में आए आइस-रॉक एवलांच के बाद फ्लैश फ्लड ने कई इलाकों में भारी नुकसान पहुंचाया। इस प्राकृतिक आपदा के प्रभाव का आकलन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC) की सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए किया गया है। प्री और पोस्ट-इवेंट सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से प्रभावित क्षेत्रों में नदी के बहाव, मलबे के फैलाव और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान की स्थिति सामने आती है।

ISRO और NRSC आपदा प्रबंधन के लिए रिमोट सेंसिंग तकनीक और उपग्रह आधारित आंकड़ों का इस्तेमाल करते रहे हैं। उपग्रह तस्वीरों के माध्यम से किसी आपदा से पहले और बाद की स्थिति की तुलना करके प्रभावित क्षेत्र और नुकसान का आकलन किया जा सकता है।

एवलांच के बाद तेजी से बदली स्थिति

बताया गया है कि नेपाल के पहाड़ी क्षेत्र में एवलांच की घटना के बाद अचानक पानी और मलबे का बहाव बढ़ गया। इसके परिणामस्वरूप नदी और जलधाराओं के आसपास के क्षेत्रों में फ्लैश फ्लड की स्थिति बनी। तेज बहाव अपने साथ बड़ी मात्रा में मलबा लेकर आगे बढ़ा, जिससे रास्ते में आने वाले ढांचों को नुकसान पहुंचा।

हिमालयी क्षेत्रों में इस तरह की घटनाओं के दौरान नदियों का स्वरूप और बहाव कुछ समय में तेजी से बदल सकता है। ऐसे में उपग्रह तस्वीरें प्रभावित क्षेत्र की स्थिति समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ISRO के अनुसार NRSC रिमोट सेंसिंग डेटा के अधिग्रहण, प्रसंस्करण और आपदा प्रबंधन के लिए निर्णय-सहायता से जुड़े कार्य करता है।

रसुवा से नुआकोट तक दिखा मलबे का प्रभाव

उपलब्ध जानकारी के अनुसार नेपाल के रसुवा और नुआकोट सहित प्रभावित क्षेत्रों में फ्लैश फ्लड के बाद मलबे का व्यापक फैलाव देखा गया। नदी के किनारे और आसपास के क्षेत्रों में जमा मलबे ने सड़क, पुल और अन्य बुनियादी ढांचे को प्रभावित किया।

सैटेलाइट तस्वीरों की खासियत यह है कि इनके माध्यम से बड़े भौगोलिक क्षेत्र का एक साथ अध्ययन किया जा सकता है। यही वजह है कि बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के बाद नुकसान का आकलन करने में रिमोट सेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।

NRSC के आधिकारिक विवरण के अनुसार, उपग्रह आधारित डेटा का इस्तेमाल बाढ़, भूस्खलन और अन्य आपदाओं की निगरानी तथा प्रभावित क्षेत्रों के आकलन में किया जाता है।

19 हेक्टेयर की कृत्रिम झील का भी उल्लेख

स्क्रिप्ट में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, प्रभावित क्षेत्र में लगभग 19 हेक्टेयर क्षेत्र में कृत्रिम झील बनने की बात सामने आई है। एवलांच और उसके बाद मलबे तथा पानी के बहाव से भू-आकृति में बदलाव होने की स्थिति भी सामने आई है।

इस तरह की स्थिति में किसी स्थान पर पानी के अस्थायी रूप से रुकने या नदी के प्रवाह में बदलाव की संभावना रहती है। इसलिए सैटेलाइट आधारित निगरानी के जरिए जल क्षेत्र और नदी के स्वरूप में हुए परिवर्तन को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।

ISRO पहले भी हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़ और झील से जुड़ी घटनाओं का उपग्रह आधारित अध्ययन कर चुका है। उदाहरण के तौर पर सिक्किम की साउथ ल्होनाक झील में 2023 की घटना के बाद NRSC/ISRO ने प्री और पोस्ट-इवेंट उपग्रह तस्वीरों का विश्लेषण किया था। उस अध्ययन में झील के जल क्षेत्र में बड़े बदलाव और डाउनस्ट्रीम फ्लैश फ्लड की संभावना का आकलन किया गया था।

पुल और जलविद्युत परियोजनाओं पर असर

नेपाल में आई फ्लैश फ्लड से कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों के प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है। इनमें पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने का भी उल्लेख किया गया है। स्क्रिप्ट के अनुसार त्रिशूली हाइड्रो पावर परियोजना से जुड़े ढांचे और नया पुल भी प्रभावित हुआ।

इसके अलावा त्रिशूली नदी में तेज बहाव के कारण ‘भैंसे आमा ब्रिज’ के बह जाने की जानकारी भी दी गई है। हालांकि, इन विशिष्ट संरचनाओं को हुए नुकसान की अंतिम स्थिति संबंधित नेपाली प्रशासन या परियोजना एजेंसियों की विस्तृत पुष्टि के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।

फ्लैश फ्लड के दौरान पुल और सड़क जैसे संपर्क मार्ग विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। इससे प्रभावित इलाकों तक राहत और बचाव सामग्री पहुंचाने में भी चुनौतियां पैदा होती हैं।

कार्टोसैट और रिसोर्ससैट से मदद

सैटेलाइट आधारित आपदा आकलन में अलग-अलग उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों का महत्व काफी अधिक है। स्क्रिप्ट में कार्टोसैट और रिसोर्ससैट से प्राप्त डेटा के जरिए प्रभावित क्षेत्र का विश्लेषण किए जाने का उल्लेख है।

ISRO के अनुसार कार्टोसैट डेटा का उपयोग भूस्खलन और उससे जुड़े जल निकायों की निगरानी सहित आपदा प्रबंधन में किया जाता है। वहीं, रिसोर्ससैट जैसे पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों से प्राप्त उच्च गुणवत्ता वाले डेटा का इस्तेमाल विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों के अध्ययन में किया जाता है।

राहत और आपदा प्रबंधन में उपयोगी सैटेलाइट तस्वीरें

आपदा के बाद सैटेलाइट तस्वीरें केवल नुकसान दिखाने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि राहत और पुनर्वास की योजना बनाने में भी उपयोगी होती हैं। किसी क्षेत्र में सड़क संपर्क टूटा है या नदी का रास्ता बदला है, इसकी जानकारी मिलने पर प्रशासन राहत कार्यों की प्राथमिकता तय कर सकता है।

NRSC की ओर से विकसित राष्ट्रीय डेटाबेस फॉर इमरजेंसी मैनेजमेंट (NDEM) भी आपदा प्रबंधन के लिए भू-स्थानिक डेटा और निर्णय-सहायता उपकरण उपलब्ध कराता है। इसका उद्देश्य आपदा की तैयारी, जोखिम आकलन, नुकसान का मूल्यांकन और आपात प्रतिक्रिया में सहायता करना है।

नेपाल की घटना से हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता सामने आई

नेपाल में एवलांच के बाद आई फ्लैश फ्लड ने हिमालयी क्षेत्रों की भौगोलिक संवेदनशीलता को एक बार फिर सामने रखा है। पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक होने वाली प्राकृतिक घटनाओं का प्रभाव नदी घाटियों और निचले इलाकों तक तेजी से पहुंच सकता है।

ऐसे में आधुनिक सैटेलाइट तकनीक प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है। प्री और पोस्ट-इवेंट तस्वीरों की तुलना से प्रभावित क्षेत्र, जल प्रवाह में बदलाव और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान का आकलन किया जा सकता है।

कुल मिलाकर, नेपाल में एवलांच के बाद फ्लैश फ्लड से हुए नुकसान की सैटेलाइट आधारित तस्वीरें आपदा के प्रभाव को वैज्ञानिक तरीके से समझने में मदद कर रही हैं। वहीं, ISRO और NRSC की रिमोट सेंसिंग तकनीक इस तरह की आपदाओं के आकलन और आपदा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

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