भाद्रपद मास शुरू, कजरी तीज से जन्माष्टमी तक पड़ेंगे ये प्रमुख व्रत-त्योहार, जानें धार्मिक महत्व

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Digital UP News Desk

हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास का आरंभ हो चुका है। धार्मिक दृष्टि से यह महीना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सावन के बाद आने वाला भाद्रपद मास भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति, व्रत, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष माना जाता है। इस महीने में कई प्रमुख व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें कजरी तीज, हलषष्ठी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी प्रमुख हैं।

भाद्रपद मास को आम बोलचाल में भादों भी कहा जाता है। सनातन परंपरा में इस महीने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि भाद्रपद में श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना और व्रत करने से भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है। हालांकि, अलग-अलग पंचांग और क्षेत्रीय परंपराओं के कारण व्रत-त्योहारों की तिथियों में थोड़ा अंतर हो सकता है।

इसलिए किसी भी व्रत या पूजा के लिए स्थानीय पंचांग की तिथि को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।

भाद्रपद मास क्यों है खास?

भाद्रपद मास हिंदू कैलेंडर के महत्वपूर्ण महीनों में से एक है। सावन के बाद शुरू होने वाले इस महीने में धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है और श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत रखते हैं।

इसके अलावा, भाद्रपद मास का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की जन्मलीला से भी है। इसी महीने में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इसलिए कृष्ण भक्तों के लिए यह महीना विशेष महत्व रखता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और अन्य देवी-देवताओं की पूजा करने से आध्यात्मिक लाभ मिलता है। वहीं, कई लोग इस महीने में दान-पुण्य, जप और धार्मिक कार्यों को भी विशेष महत्व देते हैं।

कजरी तीज का विशेष महत्व

भाद्रपद मास में मनाया जाने वाला कजरी तीज प्रमुख व्रतों में शामिल है। विशेष रूप से महिलाएं इस व्रत को श्रद्धा के साथ रखती हैं। कई स्थानों पर कजरी तीज को कजली तीज के नाम से भी जाना जाता है।

मान्यता के अनुसार महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत करती हैं। वहीं, अविवाहित युवतियां भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से इस व्रत को रखती हैं।

कजरी तीज के अवसर पर महिलाएं पूजा करती हैं, पारंपरिक गीत गाती हैं और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं। हालांकि, व्रत रखने की विधि और पूजा की परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती है।

हलषष्ठी व्रत भी रहेगा महत्वपूर्ण

भाद्रपद मास में हलषष्ठी का पर्व भी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसे कई क्षेत्रों में ललही छठ या हरछठ के नाम से भी जाना जाता है।

इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। धार्मिक परंपराओं में इस व्रत को संतान की मंगलकामना से जोड़कर देखा जाता है।

हलषष्ठी के दिन पूजा के दौरान स्थानीय परंपरा के अनुसार विशेष सामग्री का उपयोग किया जाता है। ग्रामीण और पारंपरिक क्षेत्रों में इस पर्व की विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक छटा देखने को मिलती है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर होगा विशेष उत्साह

भाद्रपद मास के सबसे बड़े पर्वों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने वाला यह पर्व देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों को सजाया जाता है। श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं और कई लोग व्रत भी रखते हैं। रात में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

मथुरा और वृंदावन सहित देश के कई धार्मिक स्थलों पर जन्माष्टमी का विशेष आयोजन होता है। मंदिरों में भजन-कीर्तन, झांकियों और धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को प्रस्तुत किया जाता है।

इसके साथ ही घरों में भी लड्डू गोपाल की विशेष पूजा की जाती है। कई परिवार भगवान श्रीकृष्ण के लिए पालना सजाते हैं और जन्मोत्सव के बाद आरती करते हैं।

भाद्रपद मास में पूजा-पाठ का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास में पूजा-पाठ, जप, ध्यान और दान-पुण्य का विशेष महत्व है। श्रद्धालु अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार धार्मिक कार्य करते हैं।

इस दौरान सुबह स्नान के बाद भगवान का ध्यान और पूजा करना शुभ माना जाता है। इसके बाद दीप प्रज्वलित कर आरती और मंत्र जाप किया जाता है। हालांकि, पूजा की विधि व्यक्ति की पारिवारिक परंपरा और धार्मिक मान्यता के अनुसार अलग हो सकती है।

इसी तरह दान-पुण्य को भी इस महीने में महत्वपूर्ण माना जाता है। जरूरतमंद लोगों की सहायता करना और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करना धार्मिक दृष्टि से पुण्यकारी माना गया है।

व्रत-त्योहारों के कारण बढ़ेगी धार्मिक गतिविधियां

भाद्रपद मास के दौरान देशभर में धार्मिक गतिविधियों में तेजी देखने को मिलती है। मंदिरों में विशेष आयोजन किए जाते हैं और श्रद्धालु बड़ी संख्या में पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

विशेषकर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के आसपास धार्मिक स्थलों पर उत्सव का माहौल रहता है। वहीं, कजरी तीज और हलषष्ठी जैसे व्रत पारिवारिक और सामाजिक परंपराओं से भी जुड़े हुए हैं।

इस प्रकार भाद्रपद मास केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। अलग-अलग राज्यों में इस महीने को मनाने की अपनी विशिष्ट परंपराएं हैं।

पंचांग के अनुसार तिथि देखना जरूरी

भाद्रपद मास से जुड़े व्रत और त्योहार मनाते समय तिथि का विशेष ध्यान रखना चाहिए। हिंदू पंचांग में तिथि, नक्षत्र और स्थानीय सूर्योदय के आधार पर पर्व की गणना की जाती है। इसलिए अलग-अलग शहरों या पंचांगों में तिथियों को लेकर अंतर दिखाई दे सकता है।

ऐसे में किसी विशेष व्रत या पूजा के लिए स्थानीय पंचांग, मंदिर या विद्वान की सलाह के अनुसार तिथि और पूजा का समय निर्धारित करना बेहतर रहता है।

धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक महत्व भी

भाद्रपद मास भारतीय समाज में पारिवारिक और सामाजिक जुड़ाव को भी मजबूत करता है। त्योहारों के दौरान परिवार के सदस्य एक साथ पूजा करते हैं और पारंपरिक रीति-रिवाजों में हिस्सा लेते हैं।

वहीं, बच्चों को भी भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से परिचित कराने का अवसर मिलता है। जन्माष्टमी की झांकियां, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते हैं।

कुल मिलाकर, भाद्रपद मास श्रद्धा, भक्ति और धार्मिक उत्सवों का महीना है। कजरी तीज, हलषष्ठी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जैसे प्रमुख पर्व इस महीने को विशेष बनाते हैं। इसलिए श्रद्धालुओं के लिए यह समय पूजा-पाठ, व्रत और धार्मिक कार्यों के साथ-साथ परिवार और समाज के साथ जुड़ने का भी अवसर प्रदान करता है।

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