PFI मामले में मोहम्मद इकबाल खान को बॉम्बे हाईकोर्ट से जमानत, पेट्रोल बम वीडियो को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी
Digital UP News Desk
मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से कथित संबंधों के मामले में गिरफ्तार मोहम्मद इकबाल इब्राहिम खान को जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि आरोपी के मोबाइल फोन में पेट्रोल बम बनाने से जुड़ा एक ट्यूटोरियल वीडियो मिलना, अपने आप में अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी ने कथित वीडियो किसी दूसरे व्यक्ति को भेजा नहीं था और न ही किसी को उसका इस्तेमाल करने के लिए उकसाया था।
जस्टिस सारंग कोतवाल की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जांच के दौरान दर्ज बयानों से अधिकतम यह संकेत मिलता है कि खान का कथित तौर पर PFI से संबंध या सदस्यता रही हो सकती है। हालांकि, केवल संगठन से कथित जुड़ाव के आधार पर उसके खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों को साबित नहीं किया जा सकता।
मोबाइल में वीडियो मिलने पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत के सामने अभियोजन पक्ष ने आरोपी के मोबाइल फोन में मिले पेट्रोल बम बनाने के ट्यूटोरियल वीडियो का उल्लेख किया। हालांकि, कोर्ट ने इस तथ्य को अकेले आरोपी की आपराधिक संलिप्तता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना।
बेंच ने गौर किया कि उपलब्ध सामग्री में ऐसा स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया कि खान ने यह वीडियो किसी अन्य व्यक्ति को भेजा हो या किसी व्यक्ति को इस तरह की गतिविधि करने के लिए प्रेरित किया हो। इसलिए, सिर्फ मोबाइल फोन में वीडियो मौजूद होने को लेकर अदालत ने जमानत के स्तर पर आरोपी को राहत देना उचित माना।
दरअसल, जमानत पर विचार करते समय अदालत यह देखती है कि अभियोजन पक्ष के पास आरोपी की कथित भूमिका को प्रथम दृष्टया स्थापित करने के लिए पर्याप्त सामग्री है या नहीं। इस मामले में हाईकोर्ट को ऐसा पर्याप्त आधार नहीं मिला, जिससे खान की कथित अपराधों में संलिप्तता स्पष्ट रूप से सामने आती हो।
सितंबर 2022 से न्यायिक हिरासत में था आरोपी
मोहम्मद इकबाल इब्राहिम खान को महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते यानी ATS ने सितंबर 2022 में गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद से वह न्यायिक हिरासत में था। मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया के बीच काफी समय बीत चुका है।
ऐसे में हाईकोर्ट ने आरोपी की लंबे समय से चली आ रही हिरासत को भी जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना। अदालत ने मुकदमे की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कहा कि सुनवाई पूरी होने में अभी पर्याप्त समय लग सकता है।
मार्च में तय हुए आरोप, अब तक एक भी गवाह की गवाही नहीं
इस मामले में इस साल मार्च में आरोप तय किए गए थे। हालांकि, आरोप तय होने के बाद भी अब तक किसी गवाह की गवाही नहीं हो सकी है। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि मुकदमे के दौरान कम से कम 90 गवाहों से पूछताछ की जानी है।
यही पहलू जमानत देने के फैसले में अहम रहा। अदालत ने माना कि जब मुकदमे में बड़ी संख्या में गवाहों की गवाही होनी है और अभी तक एक भी गवाह की परीक्षा नहीं हुई है, तो निकट भविष्य में सुनवाई पूरी होने की संभावना कम है।
इसके परिणामस्वरूप, लंबे समय से जेल में बंद आरोपी को अनिश्चित अवधि तक हिरासत में रखना उचित नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने खान को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।
PFI पर देशभर में प्रतिबंध
गौरतलब है कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी PFI पर केवल महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में प्रतिबंध लागू है। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत PFI और उससे जुड़े आठ संगठनों को गैरकानूनी घोषित किया था।
प्रतिबंध के बाद केंद्रीय और राज्य स्तर की जांच एजेंसियों ने संगठन से जुड़े मामलों में कार्रवाई तेज की। महाराष्ट्र में भी पुलिस, ATS और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की ओर से कई मामलों में जांच और कार्रवाई की गई।
मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई, औरंगाबाद, सोलापुर, परभणी और जालना समेत कई इलाकों में जांच एजेंसियों ने संगठन से कथित तौर पर जुड़े लोगों और नेटवर्क को लेकर कार्रवाई की थी।
कई राज्यों में सक्रियता का दावा
जांच से जुड़े सरकारी दस्तावेजों और रिपोर्टों में प्रतिबंध से पहले PFI की गतिविधियों का दायरा कई राज्यों तक फैला होने का उल्लेख किया गया था। इनमें उत्तर प्रदेश, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, असम, बिहार, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना समेत कई राज्य शामिल रहे हैं।
हालांकि, किसी संगठन पर प्रतिबंध और उसके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई के बावजूद प्रत्येक आरोपी की भूमिका का आकलन अलग-अलग उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है। यही वजह है कि अदालत ने खान के मामले में भी उसके खिलाफ उपलब्ध व्यक्तिगत साक्ष्यों और मुकदमे की प्रगति को ध्यान में रखा।
जमानत का मतलब आरोपों से पूरी तरह बरी होना नहीं
कानूनी तौर पर यह समझना जरूरी है कि हाईकोर्ट से जमानत मिलने का अर्थ आरोपी को मामले के सभी आरोपों से बरी किया जाना नहीं है। जमानत के दौरान अदालत मुख्य रूप से यह देखती है कि आरोपी को मुकदमे की अवधि में हिरासत में रखना आवश्यक है या नहीं और क्या उसके खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है।
मोहम्मद इकबाल इब्राहिम खान के मामले में अदालत ने उपलब्ध सामग्री, मोबाइल फोन में मिले वीडियो, कथित PFI संबंध, आरोपी की लंबी न्यायिक हिरासत और मुकदमे की धीमी प्रगति जैसे विभिन्न पहलुओं पर विचार किया।
मुकदमे में देरी बनी जमानत का अहम आधार
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक मुकदमे की धीमी गति रही। मार्च में आरोप तय होने के बावजूद अब तक गवाहों की गवाही शुरू नहीं हुई है। इसके अलावा अभियोजन पक्ष की ओर से करीब 90 गवाहों को पेश किए जाने की बात कही गई है।
ऐसी स्थिति में अदालत ने माना कि मुकदमे को पूरा होने में लंबा समय लग सकता है। इसलिए, मुकदमे के पूरा होने तक आरोपी को लगातार न्यायिक हिरासत में रखना उचित नहीं होगा।
इस प्रकार, बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला मुख्य रूप से उपलब्ध साक्ष्यों की स्थिति, आरोपी की हिरासत की अवधि और मुकदमे में हुई प्रगति पर आधारित रहा। अदालत ने जमानत देते हुए यह स्पष्ट किया कि केवल मोबाइल फोन में किसी ट्यूटोरियल वीडियो की मौजूदगी को अन्य ठोस साक्ष्यों के अभाव में अपराध का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
मामले की आगे की सुनवाई में अभियोजन पक्ष अपने गवाहों और अन्य साक्ष्यों के माध्यम से आरोपों को साबित करने की कोशिश करेगा। वहीं, आरोपी को अदालत द्वारा तय शर्तों के अनुसार जमानत पर रिहा किया जाएगा।

