मथुरा के ग्रामीण श्मशान घाटों की बदहाली पर सवाल, आखिर कब सुधरेंगी अंतिम यात्रा की राहें?
रिपोर्ट- योगेश भारद्वाज
मथुरा। जनपद मथुरा के ग्रामीण क्षेत्रों में श्मशान घाटों और वहां तक पहुंचने वाले रास्तों की बदहाल स्थिति एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। बारिश के मौसम में कई गांवों में अंतिम संस्कार के लिए जाने वाले रास्तों पर जलभराव और कीचड़ की समस्या सामने आ रही है। वहीं, कुछ स्थानों पर श्मशान घाटों में बारिश से बचाव के लिए पर्याप्त शेड तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में ग्रामीणों के सामने अपने प्रियजनों को अंतिम विदाई देने के दौरान भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव की समस्या खड़ी हो रही है।
फरह ब्लॉक क्षेत्र के आंवला सुल्तानपुर यौरा में बारिश के बाद श्मशान घाट तक पहुंचने वाले रास्ते की स्थिति खराब होने की जानकारी सामने आई है। रास्ते में जलभराव और कीचड़ के कारण ग्रामीणों को शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। स्थानीय लोगों के अनुसार, बरसात के दिनों में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। रास्ते की स्थिति ऐसी हो जाती है कि पैदल आवागमन तक मुश्किल हो जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि सामान्य दिनों में किसी तरह आवागमन हो जाता है, लेकिन बारिश के दौरान श्मशान घाट तक पहुंचना चुनौती बन जाता है। अंतिम यात्रा जैसे संवेदनशील समय में लोगों को रास्ते की खराब स्थिति से जूझना पड़ता है। यही वजह है कि ग्रामीण अब स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।
अड़ींग में बारिश के बीच अंतिम संस्कार ने उठाए सवाल
इसी तरह गोवर्धन क्षेत्र के अड़ींग गांव से भी श्मशान घाट की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठे हैं। बारिश के दौरान एक बुजुर्ग के अंतिम संस्कार के समय परिजनों और ग्रामीणों को तिरपाल के सहारे व्यवस्था करनी पड़ी। श्मशान घाट पर बारिश से बचने के लिए पर्याप्त टीन शेड या अन्य स्थायी व्यवस्था नहीं होने के कारण लोगों को परेशानी उठानी पड़ी।
यह स्थिति केवल एक सुविधा की कमी का मामला नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे की स्थिति पर भी सवाल खड़े करती है। किसी परिवार के लिए अंतिम संस्कार का समय बेहद भावनात्मक होता है। ऐसे में यदि बारिश के बीच उन्हें उचित शेड, साफ रास्ता और जल निकासी जैसी सामान्य सुविधाएं भी उपलब्ध न हों, तो निश्चित रूप से व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत महसूस होती है।
विकास के दावों के बीच ग्रामीण सुविधाओं का सवाल
मथुरा जनपद में ग्रामीण विकास को लेकर समय-समय पर विभिन्न योजनाओं और विकास कार्यों की जानकारी सामने आती रहती है। सड़क, नाली, जल निकासी और अन्य आधारभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने के प्रयास किए जाते हैं। इसके बावजूद यदि किसी गांव में श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए पक्का रास्ता नहीं है या बारिश में वहां जलभराव हो जाता है, तो स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
दरअसल, ग्रामीण विकास का मतलब केवल मुख्य सड़कों, बाजारों और सार्वजनिक भवनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। गांव के प्रत्येक हिस्से में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। श्मशान घाट भले ही रोजमर्रा के उपयोग की जगह न हों, लेकिन यह गांव की आवश्यक सार्वजनिक सुविधाओं में शामिल हैं।
इसके अलावा, अंतिम संस्कार के लिए सुरक्षित और व्यवस्थित स्थान उपलब्ध कराना स्थानीय प्रशासन और पंचायत स्तर की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में माना जाता है। इसलिए श्मशान घाट तक पहुंचने वाला रास्ता, जल निकासी, प्रकाश व्यवस्था, शेड और साफ-सफाई जैसी सुविधाओं पर नियमित ध्यान दिया जाना जरूरी है।
बरसात में बढ़ जाती है परेशानी
बारिश के मौसम में ग्रामीण क्षेत्रों में जलभराव की समस्या अक्सर बढ़ जाती है। यदि श्मशान घाट तक जाने वाला रास्ता कच्चा हो या वहां जल निकासी की उचित व्यवस्था न हो, तो थोड़ी बारिश के बाद ही रास्ता कीचड़ में बदल सकता है। ऐसी स्थिति में अंतिम यात्रा को व्यवस्थित तरीके से पूरा करना कठिन हो जाता है।
इसके अलावा, लगातार बारिश के दौरान खुले स्थान पर अंतिम संस्कार की व्यवस्था करना भी परिजनों के लिए परेशानी का कारण बनता है। इसलिए श्मशान घाटों पर स्थायी शेड का निर्माण जरूरी है। इससे बारिश और तेज धूप दोनों परिस्थितियों में लोगों को राहत मिल सकती है।
इसी क्रम में यह भी जरूरी है कि श्मशान घाट के आसपास जल निकासी की समुचित व्यवस्था हो। यदि पानी जमा नहीं होगा तो रास्ते की स्थिति भी बेहतर रहेगी और परिसर में आने-जाने वाले लोगों को परेशानी कम होगी।
ग्रामीणों की मांग, घोषणाओं के बजाय स्थायी समाधान
ग्रामीणों का कहना है कि समस्या सामने आने के बाद अस्थायी स्तर पर रास्ते की मरम्मत या जल निकासी की व्यवस्था कर देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसे स्थायी समाधान की है, जिससे हर वर्ष बारिश के मौसम में यही समस्या दोबारा सामने न आए।
इसके लिए श्मशान घाट तक पक्का और सुगम रास्ता बनाया जाना चाहिए। जहां जलभराव की समस्या है, वहां नालियों और उचित ड्रेनेज की व्यवस्था की जानी चाहिए। साथ ही श्मशान घाट पर स्थायी शेड, प्रकाश व्यवस्था और साफ-सफाई की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
यदि किसी गांव में श्मशान घाट के लिए पर्याप्त भूमि या उपयुक्त स्थान उपलब्ध नहीं है, तो प्रशासन और संबंधित पंचायत को मिलकर वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार करना चाहिए। इससे ग्रामीणों को अंतिम संस्कार के लिए दूसरे स्थानों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से उम्मीद
मथुरा जनपद में सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधि लगातार क्षेत्र के विकास से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं। वहीं जिला प्रशासन की ओर से भी ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी की व्यवस्था की जाती है। ऐसे में ग्रामीणों की उम्मीद है कि श्मशान घाटों से जुड़ी समस्याओं को भी विकास की प्राथमिकताओं में शामिल किया जाएगा।
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के लिए जरूरी है कि वे केवल बड़ी विकास परियोजनाओं पर ही नहीं, बल्कि गांवों की छोटी लेकिन बेहद जरूरी सुविधाओं पर भी ध्यान दें। क्योंकि किसी गांव की वास्तविक प्रगति का आकलन इस बात से भी किया जा सकता है कि वहां लोगों को बुनियादी सुविधाएं कितनी आसानी से उपलब्ध हो रही हैं।
श्मशान घाट तक जाने वाला रास्ता किसी परिवार के लिए सामान्य सड़क नहीं होता। यह उनके किसी अपने की अंतिम यात्रा का मार्ग होता है। इसलिए इस रास्ते की स्थिति बेहतर होना सम्मानजनक अंतिम विदाई के लिए जरूरी है।
अब स्थायी समाधान की जरूरत
मथुरा के आंवला सुल्तानपुर यौरा और अड़ींग से सामने आई परिस्थितियां ग्रामीण क्षेत्रों में श्मशान घाटों की व्यवस्थाओं की समीक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। हालांकि इन समस्याओं का समाधान किसी एक विभाग की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं होना चाहिए। ग्राम पंचायत, विकास विभाग और जिला प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय से स्थायी व्यवस्था तैयार की जा सकती है।
सबसे पहले ऐसे गांवों की पहचान की जानी चाहिए जहां श्मशान घाट तक पहुंचने वाले रास्ते खराब हैं या बारिश के दौरान जलभराव होता है। इसके बाद प्राथमिकता के आधार पर पक्की सड़क, नाली और जल निकासी की व्यवस्था की जा सकती है। इसी तरह जिन श्मशान घाटों पर शेड नहीं हैं, वहां चरणबद्ध तरीके से स्थायी शेड बनाए जा सकते हैं।
अंततः ग्रामीणों की मांग किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि सम्मानजनक अंतिम यात्रा की है। यह एक ऐसी बुनियादी जरूरत है, जिसे मौसम या परिस्थितियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

