यूपी में गन्ने से किसानों का मोहभंग, मक्का-धान की ओर बढ़ा रुझान, चीनी उत्पादन में 14% गिरावट
Digital UP News Desk
उत्तर प्रदेश में किसानों का रुझान धीरे-धीरे गन्ने की खेती से हटकर मक्का और धान जैसी फसलों की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। पिछले तीन वर्षों के आंकड़े इस बदलाव की तस्वीर साफ करते हैं। प्रदेश में गन्ने की खेती का रकबा करीब चार फीसदी घटा है। इसके साथ ही चीनी उत्पादन में लगभग 14 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। गन्ने के रकबे में अपेक्षाकृत कम कमी के बावजूद चीनी उत्पादन में इतनी बड़ी गिरावट ने चीनी उद्योग के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। माना जा रहा है कि उत्पादन में कमी का असर बाजार पर भी पड़ रहा है और इसी वजह से चीनी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
तीन साल में 1.05 लाख हेक्टेयर घटा गन्ने का रकबा
उप्र चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023-24 में प्रदेश में गन्ने की खेती का कुल रकबा 29.66 लाख हेक्टेयर था। हालांकि, वर्ष 2025-26 तक यह घटकर 28.61 लाख हेक्टेयर रह गया। इस तरह तीन वर्षों के दौरान गन्ने के रकबे में करीब 1.05 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई।
प्रतिशत के लिहाज से देखें तो यह गिरावट करीब चार फीसदी बैठती है। पहली नजर में यह कमी बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन इसका असर चीनी उत्पादन पर कहीं अधिक व्यापक पड़ा है। यही वजह है कि कृषि क्षेत्र और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ इस बदलाव को गंभीरता से देख रहे हैं।
किसानों के लिए किसी फसल का चयन केवल बाजार भाव पर निर्भर नहीं करता। उत्पादन लागत, मौसम, सिंचाई, फसल की अवधि, भुगतान की स्थिति और जोखिम जैसे कई कारक उनकी खेती की रणनीति को प्रभावित करते हैं। ऐसे में गन्ने के मुकाबले मक्का और धान की ओर बढ़ता रुझान कृषि क्षेत्र में बदलती प्राथमिकताओं का संकेत माना जा सकता है।
चीनी उत्पादन में 14 फीसदी की बड़ी गिरावट
गन्ने के रकबे में करीब चार फीसदी की कमी के मुकाबले चीनी उत्पादन में लगभग 14 फीसदी की गिरावट हुई है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार 2023-24 में उत्तर प्रदेश में चीनी का उत्पादन 104.13 लाख टन था। वहीं, 2025-26 में यह घटकर 89.52 लाख टन रह गया।
अर्थात तीन वर्षों में चीनी उत्पादन में 14.61 लाख टन की कमी आई है। यह गिरावट गन्ने के रकबे में आई कमी की तुलना में करीब साढ़े तीन गुना अधिक है। इसलिए केवल रकबा घटने को चीनी उत्पादन में कमी की एकमात्र वजह नहीं माना जा सकता।
दरअसल, फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता पर मौसम तथा रोग-कीटों का भी सीधा प्रभाव पड़ता है। यदि गन्ने की पैदावार प्रभावित होती है या गन्ने में चीनी की रिकवरी कम रहती है तो कुल चीनी उत्पादन पर उसका असर दिखाई देता है।
मौसम और रोग-कीटों से गन्ने को नुकसान
बीकेटी स्थित चंद्रभानु कृषि महाविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. सत्येंद्र कुमार सिंह के अनुसार गन्ने की फसल को मौसम के साथ-साथ अगोला बेधक कीट और रेड रॉट बीमारी से भी काफी नुकसान हुआ है।
गन्ना अपेक्षाकृत लंबी अवधि वाली फसल है। इसलिए मौसम में होने वाला बदलाव इसके उत्पादन पर लंबे समय तक असर डाल सकता है। दूसरी ओर, कीट और रोग फसल की गुणवत्ता तथा उत्पादकता दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। परिणामस्वरूप खेत में गन्ने का रकबा भले ही बहुत तेजी से न घटे, लेकिन प्रति हेक्टेयर उत्पादन और चीनी की रिकवरी में कमी आने पर कुल उत्पादन में बड़ी गिरावट हो सकती है।
यही कारण है कि गन्ने की खेती को बनाए रखने के लिए किसानों को बेहतर बीज, उन्नत कृषि तकनीक, समय पर रोग-कीट नियंत्रण और मौसम आधारित कृषि सलाह की जरूरत बढ़ गई है।
मक्का और धान क्यों बन रहे किसानों की पसंद?
गन्ने की खेती से मक्का और धान की ओर किसानों के बढ़ते रुझान के पीछे कई स्थानीय और आर्थिक कारण हो सकते हैं। गन्ने की तुलना में किसानों के लिए फसल चक्र, बाजार की मांग और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार मक्का तथा धान कई क्षेत्रों में अधिक व्यावहारिक विकल्प साबित हो सकते हैं।
इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों में मक्का और चावल का इस्तेमाल केवल खाद्य जरूरतों तक सीमित नहीं रहा है। इन दोनों फसलों की मांग पशु आहार, पोल्ट्री उद्योग और एथेनॉल सहित कई क्षेत्रों में बढ़ी है। परिणामस्वरूप किसानों को इन फसलों के लिए नए बाजार भी दिखाई दे रहे हैं।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रदेश में गन्ने की खेती खत्म होने की दिशा में है। उत्तर प्रदेश देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में शामिल है और बड़ी संख्या में किसान अभी भी इस फसल पर निर्भर हैं। लेकिन रकबे में लगातार कमी का रुझान उद्योग के लिए निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
डिस्टिलरी में भी बढ़ा मक्का और चावल का इस्तेमाल
यूपी डिस्टिलर्स एसोसिएशन के महासचिव रजनीश अग्रवाल के अनुसार वर्ष 2018 के बाद से प्रदेश में कई नई डिस्टिलरियां मक्का, चावल और अन्य अनाज आधारित उत्पादन की ओर बढ़ी हैं।
इस बदलाव ने गन्ने और उससे जुड़े उद्योग के समीकरण को भी प्रभावित किया है। पहले जहां गन्ने से बनने वाले उत्पादों और सह-उत्पादों पर निर्भरता अधिक थी, वहीं अब अनाज आधारित डिस्टिलरी मॉडल को भी विस्तार मिल रहा है।
इसका असर खांडसारी उद्योग पर भी पड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार चीनी उत्पादन में खांडसारी का योगदान पहले करीब 1.5 फीसदी था, जो अब घटकर लगभग आधा रह गया है। इससे चीनी उद्योग के पारंपरिक उत्पादन ढांचे में बदलाव का संकेत मिलता है।
चीनी की कीमतों पर पड़ सकता है असर
चीनी उत्पादन में 14 फीसदी की गिरावट ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब बाजार में मांग और आपूर्ति का संतुलन कीमतों को प्रभावित करता है। उत्पादन कम होने की स्थिति में यदि मांग बनी रहती है तो कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, चीनी की खुदरा कीमतें केवल उत्तर प्रदेश के उत्पादन पर निर्भर नहीं करतीं। राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादन, स्टॉक, निर्यात नीति, एथेनॉल नीति, मिलों की रिकवरी, मौसम और बाजार की मांग जैसे कई कारक कीमतों को प्रभावित करते हैं। फिर भी, देश के प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश में उत्पादन घटने का असर व्यापक बाजार पर पड़ना स्वाभाविक है।
किसानों और उद्योग के सामने दोहरी चुनौती
वर्तमान स्थिति में किसानों और चीनी उद्योग दोनों के सामने चुनौती है। किसानों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसी कौन-सी फसल अपनाई जाए, जिसमें लागत, जोखिम और बाजार के लिहाज से बेहतर संतुलन मिले। वहीं, चीनी मिलों के लिए पर्याप्त मात्रा में गन्ने की उपलब्धता बनाए रखना जरूरी है।
इसलिए आने वाले समय में गन्ने की खेती को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए उत्पादकता बढ़ाने पर जोर देना होगा। बेहतर किस्मों का इस्तेमाल, रोग प्रतिरोधी पौध सामग्री, वैज्ञानिक सिंचाई, संतुलित उर्वरक प्रयोग और समय पर कीट नियंत्रण जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
साथ ही, किसानों को मक्का और धान जैसी वैकल्पिक फसलों के बाजार, लागत और संभावित आय के बारे में भी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी है। इससे किसान परिस्थितियों के अनुसार बेहतर फसल चयन कर सकेंगे।
आगे क्या होगा?
उत्तर प्रदेश में गन्ने के रकबे में आई कमी को केवल एक कृषि आंकड़ा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके साथ चीनी उत्पादन में हुई बड़ी गिरावट यह बताती है कि खेती और चीनी उद्योग दोनों में संरचनात्मक बदलाव हो रहे हैं।
एक तरफ किसान मौसम, रोग-कीट और लागत जैसी चुनौतियों को देखते हुए फसल विविधीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर, डिस्टिलरी उद्योग में मक्का और चावल जैसे अनाजों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था में गन्ने, मक्का और धान के बीच संतुलन और महत्वपूर्ण हो सकता है।
इस बदलाव के बीच सरकार, कृषि वैज्ञानिकों और चीनी उद्योग के लिए जरूरी होगा कि किसानों को गन्ने की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ बाजार आधारित और वैज्ञानिक कृषि विकल्प उपलब्ध कराए जाएं। यदि गन्ने की खेती से किसानों को बेहतर उत्पादकता और लाभ मिलता है, तो घटते रकबे की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है। वहीं, मक्का और धान की बढ़ती मांग किसानों के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकती है।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में गन्ने के रकबे में चार फीसदी की कमी और चीनी उत्पादन में 14 फीसदी की गिरावट कृषि क्षेत्र में बदलते समीकरणों की ओर संकेत करती है। आने वाले समय में किसानों की पसंद, मौसम की स्थिति, फसल उत्पादकता और बाजार की मांग यह तय करेगी कि प्रदेश में गन्ने की खेती किस दिशा में आगे बढ़ती है।

