कानपुर में IIT के रिटायर्ड अफसर को डिजिटल अरेस्ट कर 16.55 लाख की ठगी, ED अधिकारी बनकर धमकाया
Digital UP News Desk
कानपुर: साइबर अपराधियों ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लोगों को ठगने का एक और मामला सामने आया है। कानपुर के सीसामऊ इलाके में साइबर ठगों ने आईआईटी कानपुर के 71 वर्षीय रिटायर्ड ऑफिस सुपरिटेंडेंट को कथित मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसाने का डर दिखाकर 16.55 लाख रुपये की ठगी कर ली। आरोपियों ने खुद को प्रवर्तन निदेशालय यानी ED का अधिकारी बताया और बुजुर्ग को करीब पांच दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखा।
इस दौरान साइबर ठग वीडियो कॉल के जरिए लगातार उन पर नजर रखते रहे। पीड़ित को घर से बाहर नहीं निकलने और किसी से बातचीत नहीं करने की हिदायत दी गई। इतना ही नहीं, आरोपियों ने कथित तौर पर बुजुर्ग और उनकी बेटी को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी। लगातार दबाव और डर के माहौल में पीड़ित ने आरोपियों के बताए बैंक खातों में लाखों रुपये ट्रांसफर कर दिए।
मामले का अहसास होने के बाद पीड़ित ने साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामले की जांच शुरू कर दी है।
मनी लॉन्ड्रिंग केस का डर दिखाकर शुरू हुई ठगी
गांधी नगर निवासी अजय कुमार आईआईटी कानपुर में ऑफिस सुपरिटेंडेंट के पद से कार्यरत रहे हैं। सेवानिवृत्ति के बाद वह अपने घर में रहते हैं। वर्ष 2021 में उनकी पत्नी का निधन हो गया था। उनकी इकलौती बेटी अवंतिका कुमार श्रीवास्तव बेंगलुरु की एक आईटी कंपनी में नौकरी करती हैं।
पीड़ित के मुताबिक, 30 जुलाई को उनके मोबाइल फोन पर एक कॉल आई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को प्रवर्तन निदेशालय का अधिकारी बताया। इसके बाद उसने अजय कुमार से कहा कि उनका नाम मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एक मामले में सामने आया है।
अचानक इस तरह का आरोप लगाए जाने से बुजुर्ग घबरा गए। उन्होंने जब कथित अधिकारी के सामने आरोपों से इनकार किया, तो उन्हें डराया गया कि उनके खिलाफ पुलिस की कार्रवाई हो सकती है और टीम उनके घर भेजी जाएगी।
इसके बाद ठगों ने बातचीत को आगे बढ़ाते हुए बुजुर्ग को अपने नियंत्रण में लेना शुरू कर दिया। आरोपियों ने उन्हें अलग-अलग निर्देश दिए और कथित जांच के नाम पर उनसे लगातार संपर्क बनाए रखा।
पांच दिनों तक वीडियो कॉल पर निगरानी
पीड़ित के अनुसार, साइबर ठगों ने उन्हें करीब पांच दिनों तक डिजिटल अरेस्ट की स्थिति में रखा। इस दौरान उन्हें घर से बाहर नहीं निकलने की हिदायत दी गई। साथ ही, किसी रिश्तेदार, परिचित या अन्य व्यक्ति से मामले के बारे में बातचीत करने से भी मना किया गया।
आरोपी वीडियो कॉल के जरिए लगातार उन पर नजर रख रहे थे। उन्हें ऐसा माहौल दिया गया, जिससे उन्हें लगा कि वास्तव में कोई सरकारी जांच चल रही है और थोड़ी भी गलती होने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
ठगों ने कथित तौर पर अजय कुमार और उनकी बेटी को जान से मारने की धमकी भी दी। इस धमकी के कारण बुजुर्ग और अधिक दबाव में आ गए। साइबर अपराधियों ने इसी डर का फायदा उठाकर उनसे पैसे की मांग शुरू कर दी।
डिजिटल अरेस्ट के ऐसे मामलों में ठग अक्सर पीड़ित को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि वह किसी गंभीर कानूनी मामले में फंस गया है। इसके बाद जांच, गिरफ्तारी या अदालत की कार्रवाई का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए दबाव बनाया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का भी दिया झांसा
अजय कुमार के मुताबिक, आरोपियों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि पैसे देने के बाद कथित मामला खत्म कराया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े अलग-अलग दावे भी किए।
ठगों ने कथित तौर पर पीड़ित को यह विश्वास दिलाया कि अगर वह उनके बताए निर्देशों का पालन करते हैं और मांगी गई रकम ट्रांसफर कर देते हैं तो समस्या का समाधान हो जाएगा।
डर और मानसिक दबाव के बीच अजय कुमार ने आरोपियों के बताए खातों में रकम भेज दी। पीड़ित के अनुसार, उन्होंने पीरोड स्थित यूनियन बैंक की शाखा से 7.80 लाख रुपये और स्टेट बैंक की शाखा से 8.75 लाख रुपये निकालकर आरोपियों के बताए खातों में ट्रांसफर किए।
इस तरह कुल 16.55 लाख रुपये की रकम साइबर ठगों के हाथ चली गई।
ठगी का अहसास होने के बाद दर्ज कराई शिकायत
कई दिन तक आरोपियों के निर्देशों का पालन करने के बाद जब अजय कुमार को पूरे मामले पर संदेह हुआ तो उन्हें अपने साथ हुई ठगी का अहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने मामले की जानकारी साइबर सेल को दी।
शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। पुलिस अब उन मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और डिजिटल माध्यमों की जानकारी जुटा रही है, जिनका इस्तेमाल कथित ठगी में किया गया।
सीसामऊ थाना प्रभारी अभय सिंह के अनुसार, मामले की जांच की जा रही है। साइबर ठगों की पहचान करने के प्रयास किए जा रहे हैं और जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बढ़ रहे साइबर अपराध
डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का ऐसा तरीका है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, ED, CBI, अदालत या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर व्यक्ति को डराते हैं। इसके बाद वीडियो कॉल या फोन के माध्यम से उसे लगातार संपर्क में रखते हैं।
कई मामलों में ठग पीड़ित को यह विश्वास दिलाते हैं कि उसके नाम पर कोई आपराधिक मामला दर्ज है या उसके बैंक खाते का इस्तेमाल किसी गैरकानूनी गतिविधि में हुआ है। इसके बाद गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे की मांग की जाती है।
इस तरह के मामलों में अपराधी तकनीक के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दबाव का भी इस्तेमाल करते हैं। वे पीड़ित को सोचने या परिवार के अन्य सदस्यों से सलाह लेने का मौका नहीं देते। परिणामस्वरूप, कई लोग घबराहट में अपनी जमा पूंजी तक आरोपियों के खातों में भेज देते हैं।
कानपुर का यह मामला भी इसी तरह की साइबर ठगी की ओर इशारा करता है, जिसमें एक बुजुर्ग को सरकारी अधिकारी होने का दावा कर डराया गया और फिर बड़ी रकम ट्रांसफर कराई गई।
सरकारी एजेंसियों के नाम का दुरुपयोग
साइबर ठगों की एक आम रणनीति सरकारी एजेंसियों के नाम का इस्तेमाल करना है। ED, CBI और पुलिस जैसी संस्थाओं का नाम लेकर ठग पीड़ित पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश करते हैं।
हालांकि, किसी भी वास्तविक जांच में केवल फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से किसी व्यक्ति को पैसे ट्रांसफर करने का निर्देश देना अपने आप में गंभीर संदेह का विषय होना चाहिए। इसी तरह, किसी सरकारी अधिकारी के नाम पर निजी बैंक खाते में रकम जमा कराने की मांग भी चेतावनी का संकेत है।
कानपुर के इस मामले में भी आरोपियों ने खुद को ED अधिकारी बताकर पहले कथित कानूनी कार्रवाई का डर पैदा किया और फिर पैसे ट्रांसफर कराने का दबाव बनाया।
बुजुर्गों को बनाया जा रहा निशाना
साइबर अपराधी अक्सर ऐसे लोगों को निशाना बनाते हैं, जो तकनीकी प्रक्रियाओं या ऑनलाइन धोखाधड़ी के नए तरीकों से पूरी तरह परिचित नहीं होते। बुजुर्गों को पुलिस, अदालत या सरकारी एजेंसी का नाम लेकर डराना ठगों के लिए आसान हो सकता है।
इसलिए परिवार के सदस्यों के लिए जरूरी है कि वे अपने बुजुर्ग परिजनों को ऐसे साइबर अपराधों के बारे में जानकारी देते रहें। खासकर किसी अनजान व्यक्ति के फोन पर कानूनी कार्रवाई, गिरफ्तारी या बैंक खाते से जुड़ी बात होने पर तुरंत भरोसा नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति वीडियो कॉल पर लगातार निगरानी रखने, फोन काटने से रोकने या किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क नहीं करने का निर्देश देता है, तो यह भी गंभीर चेतावनी हो सकती है।
पुलिस जांच से सामने आएगी पूरी तस्वीर
फिलहाल पुलिस की जांच जारी है। जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि ठगों ने पीड़ित से संपर्क करने के लिए किन नंबरों और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल किया। इसके साथ ही रकम जिन बैंक खातों में भेजी गई, उनकी भी जांच की जा सकती है।
पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास करेगी कि इस घटना में कितने लोग शामिल थे और क्या ये आरोपी किसी बड़े साइबर ठगी नेटवर्क से जुड़े हैं।
बहरहाल, कानपुर के सीसामऊ में सामने आया यह मामला एक बार फिर बताता है कि साइबर ठगी के तरीके लगातार बदल रहे हैं। सरकारी अधिकारी बनकर डराना और डिजिटल अरेस्ट के नाम पर पैसे ऐंठना गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।
अजय कुमार से 16.55 लाख रुपये की ठगी के मामले में अब पुलिस जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इस साइबर नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल थे। फिलहाल पुलिस ने पीड़ित की शिकायत के आधार पर जांच शुरू कर दी है और आरोपियों की पहचान के प्रयास किए जा रहे हैं।

