नेपाल में फिर उठी हिंदू राष्ट्र की मांग, सुनसरी विवाद के बाद सियासत में तेज हुई बहस
Digital UP News Desk
नेपाल में करीब दो दशक पहले खत्म हुई हिंदू राष्ट्र की संवैधानिक व्यवस्था को फिर बहाल करने की मांग एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आती दिखाई दे रही है। पूर्वी नेपाल के सुनसरी जिले के देवानगंज क्षेत्र में हालिया सामुदायिक तनाव के बाद धार्मिक पहचान, सामाजिक सद्भाव और देश की संवैधानिक व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज हुई है। हालांकि, हिंदू राष्ट्र की मांग नई नहीं है, लेकिन वर्ष 2026 में यह मुद्दा राजनीतिक दलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच फिर प्रमुखता से उठ रहा है।
नेपाल का मौजूदा संविधान देश को धर्मनिरपेक्ष, समावेशी, लोकतांत्रिक, संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में परिभाषित करता है। संविधान के अनुच्छेद 4 में धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के साथ प्राचीन काल से चली आ रही धर्म-संस्कृति के संरक्षण का भी उल्लेख है। ऐसे में नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए संवैधानिक बदलाव की आवश्यकता होगी।
सुनसरी की घटना के बाद फिर चर्चा में मुद्दा
सुनसरी जिले के देवानगंज ग्रामीण नगरपालिका-3 के कप्तानगंज क्षेत्र में 26 जुलाई की रात दो समूहों के बीच विवाद बढ़ गया था। स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, विवाद धार्मिक कार्यक्रमों में तेज संगीत और धार्मिक झंडों से जुड़े मुद्दों से शुरू हुआ और बाद में तनाव की स्थिति बनी। स्थिति को नियंत्रित करने के दौरान सुरक्षा बलों की गोलीबारी में 24 वर्षीय ओमप्रकाश मेहता की मौत हो गई और कई लोग घायल हुए।
घटना के बाद स्थानीय प्रशासन ने कुछ इलाकों में प्रतिबंधात्मक आदेश लागू किए और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई। इसके साथ ही सरकार ने मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की। समिति की अध्यक्षता गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव भूपेंद्र थापा कर रहे हैं। बाद में बैलिस्टिक और फोरेंसिक पहलुओं की जांच के लिए पुलिस निरीक्षक दीपेश अवस्थी और पुलिस उपनिरीक्षक मोहन सिंह धामी को भी समिति में शामिल किया गया।
जांच का उद्देश्य केवल घटना के कारणों को समझना नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई, प्रशासनिक समन्वय और विवाद के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया की भी समीक्षा करना है। इसलिए फिलहाल किसी एक पक्ष को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय जांच के निष्कर्ष का इंतजार किया जा रहा है।
हिंदू राष्ट्र की मांग का राजनीतिक आधार
नेपाल में हिंदू राष्ट्र और राजशाही की बहाली की मांग लंबे समय से राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी यानी RPP के प्रमुख मुद्दों में रही है। हाल ही में पार्टी की मुख्य सचेतक खुशबू ओली ने संसद में संविधान संशोधन प्रक्रिया के दौरान सनातन हिंदू राष्ट्र और संवैधानिक राजशाही जैसे मुद्दों को शामिल करने की मांग की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया में जनता से जुड़े इन मुद्दों पर विचार होना चाहिए।
इसके अलावा, वर्ष 2026 में नेपाल के दूसरे राजनीतिक समूहों में भी वैदिक सनातन राष्ट्र और संवैधानिक राजशाही से जुड़े प्रस्ताव सामने आए हैं। फरवरी में नेपाली कांग्रेस से जुड़े एक अभियान ने पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में वैदिक सनातन हिंदू राष्ट्र और संवैधानिक राजशाही के मुद्दे को शामिल करने का सुझाव दिया था।
इससे स्पष्ट है कि हिंदू राष्ट्र की मांग केवल एक संगठन या एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। अलग-अलग समूह इसे नेपाल की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत से जोड़कर सामने रखते रहे हैं।
2026 के चुनाव के बाद बदला राजनीतिक माहौल
नेपाल की राजनीति में वर्ष 2026 का आम चुनाव महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आया। 5 मार्च को हुए प्रतिनिधि सभा चुनाव में बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी यानी RSP ने 275 में से 182 सीटें जीतीं। इसके बाद शाह प्रधानमंत्री बने। ब्रिटेन की हाउस ऑफ कॉमन्स लाइब्रेरी के चुनाव विश्लेषण में भी RSP को 182 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बताया गया है।
हालांकि RSP का चुनावी एजेंडा हिंदू राष्ट्र की बहाली पर आधारित नहीं था। पार्टी की सफलता मुख्य रूप से राजनीतिक बदलाव, सुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना से जुड़ी रही। इसलिए हिंदू राष्ट्र के मुद्दे पर मौजूदा सरकार की स्थिति को RPP या अन्य राजशाही समर्थक समूहों के रुख से अलग समझना जरूरी है।
फिर भी संसद में हिंदू राष्ट्र और संवैधानिक राजशाही की मांग उठना इस बात का संकेत है कि नेपाल की राजनीतिक बहस में पहचान और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दे अब भी मौजूद हैं।
संवैधानिक बदलाव के लिए आसान नहीं होगी राह
नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने का सवाल केवल राजनीतिक मांग तक सीमित नहीं है। इसके लिए संविधान में बदलाव करना होगा। मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था नेपाल को धर्मनिरपेक्ष और संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है। इसलिए किसी भी बदलाव के लिए संवैधानिक प्रक्रिया और पर्याप्त राजनीतिक समर्थन आवश्यक होगा।
इसके अलावा, नेपाल बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज है। ऐसे में हिंदू राष्ट्र की मांग के साथ धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकार और सामाजिक सद्भाव जैसे मुद्दे भी स्वाभाविक रूप से जुड़ते हैं। इसलिए इस विषय पर व्यापक राजनीतिक और सामाजिक सहमति महत्वपूर्ण होगी।
यही वजह है कि मौजूदा समय में इसे तत्काल संवैधानिक बदलाव के बजाय राजनीतिक विमर्श और सार्वजनिक बहस के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
सुनसरी जांच में फायरिंग की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में
सुनसरी की घटना के बाद जांच समिति के सामने सबसे अहम सवालों में से एक सुरक्षा बलों की कार्रवाई से जुड़ा है। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने घायलों से मुलाकात की और घटनास्थल से जुड़े तथ्यों को समझने की प्रक्रिया शुरू की। बाद में फोरेंसिक और बैलिस्टिक पहलुओं की जांच के लिए विशेषज्ञ अधिकारियों को भी समिति में जोड़ा गया।
सुरक्षा बलों के मुताबिक, स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पहले अन्य उपायों का इस्तेमाल किया गया और हालात बिगड़ने के बाद गोलीबारी की गई। दूसरी ओर, घटना को लेकर सुरक्षा व्यवस्था और बल प्रयोग की प्रक्रिया पर सवाल भी उठे हैं। इसलिए जांच रिपोर्ट से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि उस समय परिस्थितियां क्या थीं और कार्रवाई निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप थी या नहीं।
प्रशासनिक स्तर पर भी हुए बदलाव
घटना के बाद नेपाल सरकार ने स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव किए। काठमांडू पोस्ट के अनुसार, सुनसरी के प्रमुख जिला अधिकारी और पुलिस नेतृत्व समेत कुछ अधिकारियों को बदला गया। इसके साथ ही क्षेत्र में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई और स्थानीय स्तर पर विभिन्न पक्षों के बीच बातचीत पर जोर दिया गया।
सरकार ने संवेदनशील जिलों में भी समन्वय बढ़ाने की बात कही है, ताकि सुनसरी जैसी घटनाओं का असर दूसरे इलाकों में न फैले। रेडियो नेपाल की रिपोर्ट के अनुसार, गृह मंत्रालय ने बैंक, कपिलवस्तु, धनुषा, सिरहा और सप्तरी समेत अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा और प्रशासनिक समन्वय मजबूत करने की तैयारी की है।
सिरहा में भी तनाव ने बढ़ाई चिंता
सुनसरी की घटना के बाद सिरहा के गोलबजार में भी तनाव की स्थिति बनी। 30 जुलाई को वहां दो युवकों को गोली लगने की घटना सामने आई। काठमांडू पोस्ट के अनुसार, घायलों में 20 वर्षीय गणेश यादव और 19 वर्षीय सुबास ठाकुर शामिल थे। उस समय पुलिस ने यह स्पष्ट नहीं किया था कि गोली किसकी ओर से चली।
इन घटनाओं ने प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की रखी है। इसलिए सरकार की ओर से सुरक्षा के साथ संवाद और स्थानीय स्तर पर शांति व्यवस्था बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है।
आगे क्या होगा?
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग आने वाले दिनों में किस दिशा में जाएगी, यह राजनीतिक दलों के रुख और जनता के बीच इस मुद्दे को मिलने वाले समर्थन पर निर्भर करेगा। RPP पहले से इस एजेंडे को प्रमुखता देती रही है, जबकि अन्य राजनीतिक समूहों में भी समय-समय पर इस मांग को लेकर आवाजें उठती रही हैं।
हालांकि, सुनसरी की घटना को सीधे हिंदू राष्ट्र की मांग का कारण मानना जल्दबाजी होगी। दोनों मुद्दों के बीच राजनीतिक विमर्श का संबंध जरूर दिखाई देता है, लेकिन घटना की वास्तविक वजह और जिम्मेदारी की जांच अलग प्रक्रिया के तहत हो रही है।
कुल मिलाकर, नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग एक बार फिर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बनी है। एक तरफ समर्थक इसे देश की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मौजूदा संविधान नेपाल को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में स्थापित करता है। ऐसे में आने वाले समय में इस मुद्दे पर बहस केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव जैसे व्यापक सवालों को भी प्रभावित करेगी।
फिलहाल सुनसरी की जांच और राजनीतिक दलों के अगले कदम पर नजर रहेगी। जांच समिति की रिपोर्ट से घटना के कारणों और सुरक्षा कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट हो सकती है, जबकि संसद और राजनीतिक मंचों पर हिंदू राष्ट्र को लेकर जारी बहस यह तय करेगी कि यह मुद्दा नेपाल की राजनीति में कितनी दूर तक जाता है।

