धर्मेंद्र प्रधान ने पहली बार बताया क्यों दिया इस्तीफा, बोले- ‘Gen Z हमारे बच्चे हैं, PM मोदी से बात के बाद छोड़ा पद’
Digital UP News Desk
पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से इस फैसले पर अपनी बात रखी है। भुवनेश्वर की जीएम यूनिवर्सिटी में छात्रों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए प्रधान ने कहा कि देश की युवा पीढ़ी यानी Gen Z को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि युवा देश की आकांक्षाओं और संकल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके सामने शिक्षा मंत्री का पद भी छोटी जिम्मेदारी है।
धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत करने के बाद ही पद छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि Gen Z हमारे ही बच्चे हैं और कुछ लोगों ने उन्हें भटकाने की कोशिश की। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नई पीढ़ी के सवालों और विरोध को समझना जरूरी है।
प्रधान का यह बयान ऐसे समय आया है, जब उनके इस्तीफे के बाद केंद्र सरकार में शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी प्रह्लाद जोशी को अतिरिक्त प्रभार के तौर पर दी गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 25 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री की सलाह पर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार किया था। इसके बाद प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया।
‘Gen Z हमारे ही बच्चे हैं’
जीएम यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में धर्मेंद्र प्रधान ने युवा पीढ़ी को लेकर अपने विचार खुलकर रखे। उन्होंने कहा कि Gen Z को केवल विरोध करने वाली पीढ़ी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, यह वही युवा वर्ग है जिसके पास देश को आगे ले जाने के सपने और आकांक्षाएं हैं।
प्रधान ने कहा कि नई पीढ़ी की जिद या उसके सवालों से परेशान होने के बजाय उसे समझने की जरूरत है। उन्होंने युवाओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी का जिक्र करते हुए कहा कि देश में हर साल बड़ी संख्या में बच्चे जन्म लेते हैं और आने वाले वर्षों में यही पीढ़ी भारत के भविष्य को आकार देगी।
उन्होंने कहा कि भारत की युवा आबादी के सपने बहुत बड़े हैं। युवा भारत को आगे ले जाने और उसे वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए उनकी आवाज और आकांक्षाओं को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।
‘शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी युवाओं के सामने छोटी’
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे के कारण को लेकर कहा कि देश के युवाओं के संकल्प और आकांक्षाओं के सामने शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारियां भी छोटी हैं। उन्होंने संकेत दिया कि उनके लिए मंत्री पद से ज्यादा महत्वपूर्ण युवाओं का विश्वास और देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर उनकी चिंताएं थीं।
प्रधान के मुताबिक, पद किसी व्यक्ति के लिए अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी परिस्थिति में पद छोड़ने से युवाओं के हित और व्यापक संवाद का रास्ता खुलता है, तो पद को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए।
इसी क्रम में उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात और बातचीत के बाद उन्होंने अपना इस्तीफा दिया। उनका कहना था कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों की मांगों को लेकर प्रधानमंत्री से चर्चा की और इसके बाद पद छोड़ने का फैसला किया।
भुवनेश्वर कार्यक्रम में BJD कार्यकर्ताओं ने की नारेबाजी
प्रधान के संबोधन के दौरान बीजू जनता दल (BJD) के कार्यकर्ताओं की ओर से नारेबाजी भी की गई। इसके बावजूद पूर्व शिक्षा मंत्री ने कहा कि वह इस तरह के विरोध से परेशान नहीं हैं।
उन्होंने ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री और BJD अध्यक्ष नवीन पटनायक पर भी राजनीतिक निशाना साधा। प्रधान ने कहा कि वह किसान के बेटे हैं और विरोध या नारेबाजी से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि यदि कोई उन्हें वापस जाने के लिए कहेगा, तब भी वह लौटकर आएंगे। अपने संबोधन में उन्होंने ओडिशा के लोगों के भरोसे और राज्य के सम्मान का भी उल्लेख किया।
प्रधान ने कहा कि उन्होंने ओडिशा के करोड़ों लोगों का सिर कभी शर्म से नहीं झुकने दिया। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक वह सार्वजनिक जीवन में हैं, तब तक लोगों के भरोसे को बनाए रखने की कोशिश करेंगे और ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे ओडिशा के गौरव और स्वाभिमान को ठेस पहुंचे।
इस्तीफे के पीछे क्या था पूरा घटनाक्रम?
धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई 2026 को शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। उनका इस्तीफा ऐसे समय आया था, जब NEET-UG से जुड़ी अनियमितताओं और कथित पेपर लीक को लेकर छात्र संगठनों का आंदोलन चल रहा था। दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी लंबे समय तक प्रदर्शन हुआ था और प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा शामिल था।
इस्तीफा दिए जाने के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रधानमंत्री की सलाह पर इसे तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।
अब भुवनेश्वर में दिए गए बयान के जरिए प्रधान ने अपने फैसले को युवाओं और उनके भविष्य से जोड़कर समझाने की कोशिश की है।
‘इतिहास में युवाओं ने ही बदलाव का नेतृत्व किया’
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने भाषण में इतिहास में युवाओं की भूमिका का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग दौर में युवाओं ने बदलाव की प्रक्रिया का नेतृत्व किया है। उनके अनुसार, आज की Gen Z भी अपने समय में बदलाव की वाहक बन सकती है।
उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को केवल उसके विरोध के आधार पर नहीं आंकना चाहिए। बल्कि उसकी चिंताओं, उम्मीदों और भविष्य को लेकर उसके सवालों को समझना जरूरी है।
प्रधान ने यह भी कहा कि आज के युवाओं के पास तकनीक, जानकारी और संवाद के पहले से कहीं अधिक साधन हैं। इसलिए उनके विचारों और अपेक्षाओं को लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा बनाना जरूरी है।
1997 में भी पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन से जुड़ा था प्रधान का नाम
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद उनके छात्र राजनीति के दौर की एक पुरानी घटना भी चर्चा में रही। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 1997 में ओडिशा में कथित प्रश्नपत्र लीक के विरोध में करीब 1,500 छात्रों ने राज्य सचिवालय के बाहर प्रदर्शन किया था। उस समय प्रधान छात्र नेता और ABVP से जुड़े पदाधिकारी थे। उनके पूर्व सहयोगी प्रशांत राउत ने बाद में इस प्रदर्शन को याद करते हुए कहा था कि प्रधान भी आंदोलन में शामिल थे और पुलिस कार्रवाई में उन्हें चोटें आई थीं।
हालांकि, इस पुराने घटनाक्रम की सभी विस्तृत बातों की स्वतंत्र पुष्टि समकालीन दस्तावेजों से नहीं हो सकी है। इसलिए इसे पूर्व सहयोगियों और बाद में प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर सामने आया विवरण माना जाना चाहिए।
इस घटना का उल्लेख इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि करीब तीन दशक बाद प्रधान खुद शिक्षा मंत्री रहते हुए परीक्षा संबंधी विवाद के केंद्र में आए और अंततः उन्होंने पद से इस्तीफा दिया।
मोदी सरकार में शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी बदली
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद केंद्र में शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी कई नेताओं के पास रही है। धर्मेंद्र प्रधान से पहले स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर और रमेश पोखरियाल निशंक इस मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रह्लाद जोशी को अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
प्रह्लाद जोशी ने जिम्मेदारी संभालने के बाद कहा था कि वह मंत्रालय के कामकाज की समीक्षा कर रहे हैं और शिक्षा क्षेत्र की जिम्मेदारी को पूरी गंभीरता से निभाएंगे।
युवाओं और शिक्षा व्यवस्था पर आगे क्या होगा?
धर्मेंद्र प्रधान के ताजा बयान ने एक बार फिर युवाओं, परीक्षा व्यवस्था और शिक्षा नीति को लेकर बहस को चर्चा में ला दिया है। Gen Z के सवालों और आकांक्षाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि नई पीढ़ी को समझना और उसके साथ संवाद करना जरूरी है।
वहीं, परीक्षा व्यवस्था को लेकर हालिया विवादों ने भी शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, विश्वसनीयता और जवाबदेही की जरूरत को सामने रखा है। ऐसे में आने वाले समय में केंद्र सरकार के सामने शिक्षा मंत्रालय की नई नेतृत्व व्यवस्था के तहत इन मुद्दों पर ठोस कदम उठाने की चुनौती होगी।
कुल मिलाकर, धर्मेंद्र प्रधान का ताजा बयान उनके इस्तीफे के बाद उनके राजनीतिक और व्यक्तिगत दृष्टिकोण को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर देता है। उन्होंने अपने फैसले को पद की राजनीति के बजाय युवाओं की आकांक्षाओं से जोड़ते हुए कहा कि Gen Z को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत के बाद इस्तीफा देने की बात भी स्पष्ट की है। अब शिक्षा मंत्रालय के नए नेतृत्व के सामने परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करने और युवाओं की चिंताओं का समाधान करने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।

