सावन कृष्ण पक्ष एकादशी 2026: लक्ष्मी-नारायण पूजा से मिलेगा पुण्य, जानें शुभ मुहूर्त, महत्व-पूजा विधि
Digital UP News Desk
अध्यात्म: सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। सावन माह स्वयं भगवान शिव को समर्पित होता है, वहीं इस महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना का विशेष विधान बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने तथा लक्ष्मी-नारायण की पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यही कारण है कि देशभर के श्रद्धालु इस तिथि का पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ इंतजार करते हैं।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, एकादशी का व्रत केवल आध्यात्मिक साधना का माध्यम ही नहीं है, बल्कि यह मन, वचन और कर्म की शुद्धि का भी पर्व माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ माता लक्ष्मी की आराधना करने से परिवार में सुख-शांति और आर्थिक समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होने की मान्यता है।
सावन माह में एकादशी का विशेष महत्व
सावन का महीना भगवान शिव की उपासना के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन शास्त्रों में भगवान विष्णु की एकादशी का भी समान रूप से महत्व बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जो श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर विधि-विधान से लक्ष्मी-नारायण का पूजन करते हैं, उनके जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
इसके अलावा, यह व्रत आत्मसंयम, अनुशासन और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना को मजबूत करने का अवसर भी प्रदान करता है। इसलिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस दिन मंदिरों में दर्शन करने के साथ-साथ अपने घरों में भी विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
लक्ष्मी-नारायण पूजा का विधान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद पूजा स्थल को साफ कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
पूजा के दौरान भगवान को पीले पुष्प, तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। माता लक्ष्मी को कमल का पुष्प अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसके पश्चात विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप किया जा सकता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, पूजा के अंत में आरती कर परिवार की सुख-समृद्धि और सभी के कल्याण की प्रार्थना करनी चाहिए।
व्रत रखने के नियम
एकादशी व्रत में सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है। कई श्रद्धालु निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार या केवल दूध एवं फल ग्रहण करते हैं। व्रत के दौरान संयमित आचरण, सकारात्मक विचार और भगवान के नाम का स्मरण करने की सलाह दी जाती है।
इसके साथ ही, इस दिन तामसिक भोजन, नकारात्मक व्यवहार और अनावश्यक विवादों से दूर रहने की भी धार्मिक मान्यता है। द्वादशी तिथि पर विधि-विधान से पारण कर व्रत का समापन किया जाता है।
एकादशी पर तुलसी का महत्व
भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष स्थान है। मान्यता है कि तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। इसलिए श्रद्धालु पूजा के समय तुलसी अर्पित करते हैं और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।
हालांकि, कई धार्मिक परंपराओं में एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ने से बचने की सलाह दी जाती है। ऐसे में श्रद्धालु एक दिन पहले ही तुलसी दल तैयार कर लेते हैं।
दान-पुण्य का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है और समाज में सेवा एवं सहयोग की भावना मजबूत होती है।
इसके अलावा, गौ सेवा, पक्षियों को अन्न देना और जरूरतमंदों की सहायता करना भी इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है एकादशी?
विशेषज्ञों के अनुसार, एकादशी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मअनुशासन का पर्व भी है। उपवास के माध्यम से व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने का अभ्यास करता है। साथ ही, ईश्वर का स्मरण मानसिक शांति और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देता है।
यही कारण है कि देशभर में लाखों श्रद्धालु प्रत्येक एकादशी पर व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की आराधना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं का सम्मान आवश्यक
धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी तिथियां, शुभ मुहूर्त और पूजा-विधि अलग-अलग पंचांगों या परंपराओं के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकती हैं। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग, विद्वान आचार्य या मंदिर द्वारा जारी जानकारी का भी पालन करना चाहिए।

