विश्व स्तनपान सप्ताह: जन्म के पहले घंटे में स्तनपान जरूरी, मां और शिशु दोनों के लिए लाभकारी – डॉ जे.एस. नारंग
रिपोर्ट- हरिशंकर शर्मा
कानपुर। विश्व स्तनपान सप्ताह के अवसर पर भारतीय बाल रोग अकादमी (Indian Academy of Pediatrics) की ओर से मारियमपुर हॉस्पिटल, शास्त्री नगर में जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य नवजात शिशुओं के लिए स्तनपान के महत्व को समझाना, माताओं और नर्सिंग स्टाफ को वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना तथा समाज में स्तनपान के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना था।
कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. जे.एस. नारंग, डॉ. शैलेन्द्र गौतम, डॉ. सी.एस. गांधी और डॉ. अर्पित गोयल ने किया। इस अवसर पर लगभग 25 नर्सिंग स्टाफ, नई माताओं तथा स्वास्थ्य कर्मियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और विशेषज्ञों से स्तनपान से जुड़े विभिन्न विषयों पर जानकारी प्राप्त की।
जन्म के पहले घंटे में स्तनपान सबसे महत्वपूर्ण
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भारतीय बाल रोग अकादमी के सचिव डॉ. जे.एस. नारंग ने कहा कि नवजात शिशु के जन्म के पहले घंटे के भीतर ही स्तनपान शुरू कर देना चाहिए। उन्होंने बताया कि इसे चिकित्सा विज्ञान में “गोल्डन ऑवर” माना जाता है, क्योंकि इस समय शुरू किया गया स्तनपान शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि बच्चे का जन्म ऑपरेशन (सी-सेक्शन) से हुआ हो, तब भी चिकित्सकीय सलाह के अनुसार यथासंभव जल्दी स्तनपान शुरू कराया जाना चाहिए। इससे नवजात को मां का पहला गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम) प्राप्त होता है, जिसे शिशु का पहला प्राकृतिक टीका भी कहा जाता है।
मां का दूध सबसे सुरक्षित और संपूर्ण आहार
डॉ. नारंग ने कहा कि मां का दूध शिशु के लिए संपूर्ण पोषण का सबसे सुरक्षित और प्राकृतिक स्रोत है। इसमें आवश्यक पोषक तत्व, एंटीबॉडी, विटामिन, खनिज और रोगों से बचाने वाले तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं। यही कारण है कि जन्म से लेकर छह माह तक शिशु को केवल मां का दूध ही देने की सलाह दी जाती है।
उन्होंने बताया कि यदि किसी कारणवश दूध निकालकर सुरक्षित रखना पड़े, तो सामान्य परिस्थितियों में यह कुछ समय तक सुरक्षित रह सकता है। हालांकि, दूध को सुरक्षित रखने और उपयोग करने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों के निर्देशों का पालन करना आवश्यक है।
कार्यस्थलों पर भी मिले स्तनपान की सुविधा
डॉ. जे.एस. नारंग ने कहा कि आज बड़ी संख्या में महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं। ऐसे में आवश्यक है कि सरकारी और निजी संस्थानों में स्तनपान कराने तथा दूध निकालकर सुरक्षित रखने की उपयुक्त व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए।
उन्होंने कहा कि यदि कार्यस्थलों पर मातृत्व के अनुकूल वातावरण बनाया जाए तो महिलाएं अपने शिशुओं को पर्याप्त स्तनपान करा सकेंगी। इससे बच्चों के स्वास्थ्य के साथ-साथ माताओं का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।
मां के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि स्तनपान केवल शिशु के लिए ही नहीं बल्कि मां के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभदायक है। नियमित स्तनपान कराने से प्रसव के बाद शरीर को सामान्य अवस्था में लौटने में सहायता मिलती है। इसके अलावा स्तनपान कराने वाली महिलाओं में स्तन कैंसर और कुछ अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम कम होने की संभावना भी देखी गई है।
विशेषज्ञों ने कहा कि स्तनपान मां और शिशु के बीच भावनात्मक संबंध को भी मजबूत बनाता है, जिससे बच्चे का मानसिक और भावनात्मक विकास बेहतर होता है।
छह माह तक केवल मां का दूध सर्वोत्तम
बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. शैलेन्द्र गौतम ने बताया कि मां द्वारा अपने शिशु को प्राकृतिक रूप से दूध पिलाने की प्रक्रिया को स्तनपान कहा जाता है। यह सभी स्तनधारी जीवों में स्वाभाविक प्रक्रिया है और मानव शिशु के स्वस्थ विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ भी जन्म से छह माह तक केवल मां का दूध पिलाने की सलाह देते हैं। इस अवधि में शिशु को पानी, शहद, घुट्टी या अन्य किसी प्रकार का भोजन देने की आवश्यकता नहीं होती, जब तक चिकित्सक विशेष सलाह न दें।
पर्याप्त स्तनपान से कम हो सकता है बीमारियों का खतरा
कार्यक्रम में संबोधित करते हुए डॉ. सी.एस. गांधी ने कहा कि जिन बच्चों को बचपन में पर्याप्त मात्रा में मां का दूध नहीं मिल पाता, उनमें आगे चलकर कुछ स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। उन्होंने बताया कि कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह पाया गया है कि पर्याप्त स्तनपान बच्चों के संपूर्ण शारीरिक और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
उन्होंने यह भी कहा कि छह माह तक मां का दूध शिशु के लिए जीवन रक्षक की तरह कार्य करता है, क्योंकि इससे संक्रमण और कई सामान्य बीमारियों का खतरा कम करने में मदद मिलती है।
नर्सिंग स्टाफ को दिया गया विशेष प्रशिक्षण
कार्यक्रम के दौरान नर्सिंग स्टाफ को नवजात शिशु को सही तरीके से स्तनपान कराने, मां की सामान्य समस्याओं का समाधान करने तथा परिवार के सदस्यों को जागरूक करने के संबंध में भी प्रशिक्षण दिया गया।
विशेषज्ञों ने बताया कि यदि अस्पतालों में प्रसव के तुरंत बाद माताओं को सही मार्गदर्शन मिले, तो स्तनपान की सफलता दर में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। साथ ही परिवार के अन्य सदस्यों को भी माताओं का सहयोग करना चाहिए ताकि नवजात को समय पर पर्याप्त स्तनपान मिल सके।
जागरूकता ही स्वस्थ भविष्य की कुंजी
कार्यक्रम के अंत में विशेषज्ञों ने कहा कि स्तनपान को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ाना समय की आवश्यकता है। वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित जानकारी और परिवार का सहयोग मिलकर ही प्रत्येक नवजात को जीवन की बेहतर शुरुआत दे सकते हैं।
उन्होंने सभी माताओं से अपील की कि वे चिकित्सकों की सलाह के अनुसार जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू करें तथा कम से कम छह माह तक केवल मां का दूध पिलाने का प्रयास करें। इससे न केवल शिशु का स्वास्थ्य बेहतर होगा बल्कि मां का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहेगा।
विश्व स्तनपान सप्ताह के इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि स्वस्थ समाज की नींव स्वस्थ मां और स्वस्थ शिशु से ही रखी जा सकती है। इसलिए स्तनपान को केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित और जीवनरक्षक अभ्यास के रूप में अपनाना आवश्यक है।

