मानव-वन्यजीव संघर्ष पर केंद्र का फोकस: राष्ट्रीय पोर्टल, उत्कृष्टता केंद्र और तकनीकी समाधान पर जोर
Digital UP News Desk
नई दिल्ली: देश में बढ़ती मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) की घटनाओं के प्रभावी समाधान के लिए केंद्र सरकार ने वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और सामुदायिक सहभागिता पर आधारित व्यापक रणनीति को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है।
इसी उद्देश्य से पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संसदीय परामर्श समिति की बैठक नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में आयोजित हुई।
बैठक में केंद्रीय राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह, संसदीय समिति के सदस्य, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न राज्यों के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक सहित कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
बैठक में मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव की रोकथाम, शमन तथा दीर्घकालिक सह-अस्तित्व को मजबूत करने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई।
मानव-वन्यजीव संघर्ष के बदलते स्वरूप पर चर्चा
मंत्रालय ने बैठक में बताया कि देश के विभिन्न राज्यों में मानव-वन्यजीव संघर्ष का स्वरूप अलग-अलग है।
कुछ राज्यों में हाथियों से जुड़े संघर्ष अधिक हैं, जबकि कई क्षेत्रों में बाघ, तेंदुए, भालू, गैंडे, जंगली सूअर, जंगली भैंसे और बंदरों से संबंधित घटनाएं सामने आती हैं।
इसी कारण प्रत्येक क्षेत्र की भौगोलिक और पारिस्थितिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग प्रबंधन रणनीति अपनाने की आवश्यकता बताई गई।
राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र की जानकारी साझा
बैठक के दौरान समिति को प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की सातवीं बैठक में घोषित मानव-वन्यजीव संघर्ष उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence for Human-Wildlife Conflict) की स्थापना की जानकारी दी गई।
मंत्रालय के अनुसार यह केंद्र—
- वैज्ञानिक अनुसंधान
- तकनीकी नवाचार
- नीति निर्माण
- क्षमता विकास
- समुदाय आधारित संरक्षण
जैसे क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करेगा।
राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष पोर्टल हुआ शुरू
मंत्रालय ने बताया कि 10 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष पोर्टल शुरू किया गया।
यह डिजिटल मंच—
- संघर्ष की घटनाओं का रिकॉर्ड
- डेटा प्रबंधन
- ज्ञान साझा करने
- निर्णय लेने में सहायता
जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराता है।
इसका उद्देश्य राज्यों के बीच बेहतर समन्वय और त्वरित निर्णय प्रक्रिया को मजबूत करना है।
दक्षिण भारत के लिए हाथी संरक्षण योजना को मंजूरी
बैठक में यह भी बताया गया कि दक्षिण भारत के लिए हाथी संरक्षण क्षेत्रीय कार्य योजना (Regional Action Plan) को मंजूरी दी जा चुकी है।
इस योजना का उद्देश्य हाथियों के आवास, वन्यजीव गलियारों और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए समन्वित प्रयास करना है।
राज्यों ने साझा किए अपने अनुभव
बैठक में असम, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश ने अपने-अपने राज्यों में लागू मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन मॉडल प्रस्तुत किए।
सभी राज्यों ने तकनीक, सामुदायिक भागीदारी, त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली और वैज्ञानिक निगरानी के अनुभव साझा किए।
असम का भू-आधारित मॉडल
असम सरकार ने हाथी, बाघ, तेंदुए, गैंडे, जंगली भैंस और जंगली सूअर से जुड़े संघर्षों को कम करने के लिए भू-भाग आधारित रणनीति प्रस्तुत की।
राज्य ने क्षेत्रीय जोखिम न्यूनीकरण समितियों, आवास सुधार, वन्यजीव गलियारों के संरक्षण और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली पर आधारित मॉडल की जानकारी दी।
कर्नाटक का AI आधारित मॉडल
कर्नाटक ने छह स्तंभों पर आधारित अपनी रणनीति प्रस्तुत की, जिसमें—
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)
- कमांड सेंटर
- त्वरित प्रतिक्रिया दल
- सामुदायिक स्वयंसेवक
- डिजिटल मुआवजा प्रणाली
जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
समिति ने तकनीक आधारित इस मॉडल की सराहना की।
केरल ने समुदाय आधारित पहल बताई
केरल सरकार ने बताया कि राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष को राज्य-विशिष्ट आपदा के रूप में देखा जाता है।
राज्य में त्वरित प्रतिक्रिया दल, पंचायत स्तर की समितियां, स्वयंसेवी कार्यक्रम और जिम्मेदार पर्यटन जैसे उपाय लागू किए गए हैं।
मध्य प्रदेश का ‘रोकथाम प्रथम’ मॉडल
मध्य प्रदेश ने AI आधारित निगरानी, GPS ट्रैकिंग, ड्रोन, त्वरित प्रतिक्रिया दल, समयबद्ध मुआवजा और समुदाय आधारित कार्यक्रमों पर आधारित “Prevention First” मॉडल प्रस्तुत किया।
समिति ने इस मॉडल में तकनीक और स्थानीय समुदाय के समन्वय की सराहना की।
उत्तराखंड की रणनीति
उत्तराखंड ने 24×7 हेल्पलाइन, GPS ट्रैकिंग, जैव बाड़बंदी, ई-निगरानी और ग्राम आधारित स्वयंसेवी नेटवर्क की जानकारी साझा की।
राज्य ने “तेंदुओं और बाघों के साथ सह-अस्तित्व” कार्यक्रम के अनुभव भी प्रस्तुत किए।
उत्तर प्रदेश का फोकस तेंदुआ प्रभावित क्षेत्रों पर
उत्तर प्रदेश ने बताया कि राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष के अधिकांश मामले तेंदुओं से जुड़े हैं और तराई क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित है।
राज्य ने—
- त्वरित प्रतिक्रिया दल
- चार बचाव केंद्र
- सौर बाड़
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली
- वैज्ञानिक निगरानी
- सामुदायिक स्वयंसेवी कार्यक्रम
जैसे उपायों की जानकारी समिति के समक्ष रखी।
तकनीक के उपयोग पर विशेष बल
बैठक में सदस्यों ने आधुनिक तकनीकों के व्यापक उपयोग पर जोर दिया।
इनमें शामिल हैं—
- GIS आधारित मैपिंग
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
- ड्रोन सर्विलांस
- रेडियो टेलीमेट्री
- प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स
इन तकनीकों की मदद से वन्यजीवों की गतिविधियों की बेहतर निगरानी और संभावित संघर्ष की पहले से पहचान संभव हो सकेगी।
सामुदायिक भागीदारी को बताया अहम
बैठक में यह भी माना गया कि केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं होंगे।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी, जन-जागरूकता, समयबद्ध मुआवजा और वन विभाग की अग्रिम पंक्ति की क्षमता को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है।
नई दिल्ली में आयोजित पर्यावरण मंत्रालय की संसदीय परामर्श समिति की बैठक में मानव-वन्यजीव संघर्ष के समाधान के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, राष्ट्रीय डिजिटल पोर्टल, उत्कृष्टता केंद्र और सामुदायिक सहभागिता को भविष्य की रणनीति का प्रमुख आधार बताया गया।
विभिन्न राज्यों द्वारा साझा किए गए सफल मॉडलों से यह स्पष्ट हुआ कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजनाएं, तकनीक का प्रभावी उपयोग और समुदाय की सक्रिय भागीदारी मिलकर मानव और वन्यजीवों के बीच संतुलित सह-अस्तित्व स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

