कानपुर में छात्र आंदोलन के समर्थन में विरोध, सपा-कांग्रेस नेताओं की नजरबंदी पर उठे सवाल

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रिपोर्ट – सर्वेश सोनू शर्मा 

कानपुर: दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच देशभर में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर अलर्ट जारी किए जाने के बाद उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में प्रदेश के कई स्थानों पर विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को नजरबंद किए जाने का मामला सामने आया है। कानपुर में भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से जुड़े नेताओं की कथित नजरबंदी को लेकर विरोध शुरू हो गया है।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि छात्र आंदोलन के समर्थन में संभावित प्रदर्शन और राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए पुलिस ने कई नेताओं को उनके घरों से बाहर निकलने से रोक दिया। वहीं, पुलिस-प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए कदमों को लेकर राजनीतिक दलों और प्रशासन के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं।

सपा नेता अर्पित त्रिवेदी ने घर पर शुरू की भूख हड़ताल

कानपुर में समाजवादी युवजन सभा के अध्यक्ष अर्पित त्रिवेदी ने नजरबंदी के विरोध में अपने घर के बाहर 24 घंटे की प्रस्तावित भूख हड़ताल शुरू कर दी। अर्पित त्रिवेदी पेशे से अधिवक्ता भी हैं। उनका कहना है कि उन्हें अपने वादी की तारीख पर अदालत में पेश होना था, लेकिन घर पर पुलिस की मौजूदगी और नजरबंदी के कारण उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई।

अर्पित त्रिवेदी के अनुसार, उन्होंने पुलिस और प्रशासन से अदालत जाने की अनुमति मांगी। काफी प्रयास के बाद उन्हें दो पुलिसकर्मियों के साथ कोर्ट जाने की अनुमति दी गई। अदालत की कार्यवाही पूरी होने के बाद उन्हें दोबारा बसंत विहार, नौबस्ता स्थित उनके आवास पर नजरबंद कर दिया गया।

इसके बाद अर्पित त्रिवेदी ने अपने घर के दरवाजे पर ही 24 घंटे की प्रस्तावित भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार सभी नागरिकों को है। इसलिए नेताओं को उनके घरों में रोकना उचित नहीं है।

समर्थकों ने पहुंचकर जताया समर्थन

अर्पित त्रिवेदी की भूख हड़ताल के समर्थन में समाजवादी पार्टी से जुड़े कई नेता और कार्यकर्ता उनके आवास पर पहुंचे। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने नजरबंदी के विरोध में अपनी आवाज उठाई और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताया।

इस मौके पर रामा यादव, अभिजीत गुप्ता, केके मिश्रा, विनोद यादव, भानु प्रताप सिंह, केशव यादव, शनि सागर, शिवम खन्ना, अजय प्रजापति, दक्ष यादव, दिव्यांश शर्मा, अभिषेक रावत, सूरज चौहान, मनीष सोनी, विवेक शुक्ला, द्वारिका सिंह सविता और रोहित निगम सहित कई कार्यकर्ता मौजूद रहे।

कार्यकर्ताओं का कहना है कि छात्र आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर सरकार को संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। साथ ही, राजनीतिक नेताओं को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने से रोकने के बजाय उनकी बात सुनी जानी चाहिए।

अर्पित यादव के घर भी पुलिस की मौजूदगी का आरोप

इसी तरह समाजवादी पार्टी से जुड़े नेता अर्पित यादव के आवास पर भी पुलिस की मौजूदगी का मामला सामने आया है। सपा नेताओं का आरोप है कि पुलिस उनके घर पर मौजूद है और उन्हें अपने आवश्यक कार्यों के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है।

नेताओं का कहना है कि लगातार पुलिस की मौजूदगी के कारण उनकी राजनीतिक और व्यक्तिगत गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं। हालांकि, पुलिस प्रशासन की ओर से इन सभी मामलों में उठाए गए कदमों को कानून-व्यवस्था और संभावित विरोध-प्रदर्शन की स्थिति को ध्यान में रखते हुए की गई कार्रवाई बताया जा सकता है।

कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी नजरबंद किए जाने का दावा

कानपुर में कांग्रेस से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी नजरबंद किए जाने का दावा किया गया है। कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेता और स्टार प्रचारक सचिव विकास अवस्थी तथा कांग्रेस के स्टार प्रचारक जेपी पाल को उनके समर्थकों के साथ घर पर रोके जाने की बात सामने आई है।

कांग्रेस नेताओं के अनुसार, विकास अवस्थी और जेपी पाल के साथ सोनू मरवाहा, पिंटू पाल, अमित जायसवाल साम्भा सहित दर्जनों कार्यकर्ताओं को भी पुलिस ने नजरबंद किया है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों के नेताओं को आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन से पहले ही घरों में रोकना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए उचित नहीं है।

वहीं, प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियाती कदम उठाए जाने की बात कही जा सकती है। ऐसे मामलों में पुलिस आमतौर पर संभावित भीड़, प्रदर्शन और सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाती है।

दिल्ली के छात्र आंदोलन के बाद बढ़ी राजनीतिक गतिविधियां

दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के बाद देश के कई हिस्सों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हुई हैं। छात्र संगठनों और विपक्षी दलों की ओर से आंदोलन से जुड़े मुद्दों को लेकर समर्थन व्यक्त किया जा रहा है। इसी के चलते विभिन्न राज्यों में पुलिस और प्रशासन ने भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्कता बढ़ाई है।

कानपुर में भी राजनीतिक दलों के नेताओं की कथित नजरबंदी को इसी व्यापक घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि छात्रों की मांगों और समस्याओं पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

इसके अलावा, विपक्षी दलों का आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और लोकतांत्रिक विरोध को रोकने के लिए नेताओं को घरों में नजरबंद किया जा रहा है। दूसरी ओर, प्रशासन की प्राथमिकता कानून-व्यवस्था बनाए रखना होती है। इसलिए ऐसे मामलों में कार्रवाई की वास्तविक वजह और पुलिस की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

शांतिपूर्ण विरोध और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन जरूरी

कानपुर में सामने आए इस घटनाक्रम ने शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर बहस को फिर से तेज कर दिया है। लोकतंत्र में नागरिकों और राजनीतिक दलों को अपनी बात रखने का अधिकार है। साथ ही, प्रशासन की जिम्मेदारी भीड़ नियंत्रण और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की होती है।

ऐसे में दोनों पक्षों के बीच संवाद बेहद जरूरी हो जाता है। यदि किसी नेता को कानूनी या प्रशासनिक कारणों से घर से बाहर जाने से रोका गया है, तो इसकी स्पष्ट जानकारी संबंधित व्यक्ति और जनता के सामने रखी जानी चाहिए। इससे भ्रम की स्थिति कम हो सकती है।

अर्पित त्रिवेदी द्वारा घर के बाहर शुरू की गई 24 घंटे की भूख हड़ताल के बाद सपा कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ गई है। वहीं, कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की कथित नजरबंदी को लेकर भी पार्टी की ओर से विरोध जताया जा रहा है।

फिलहाल, कानपुर में छात्र आंदोलन के समर्थन और विपक्षी नेताओं की कथित नजरबंदी को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म बना हुआ है। आने वाले समय में इस मामले पर समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और प्रशासन की ओर से और बयान सामने आने की संभावना है। हालांकि, पूरे मामले में वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए पुलिस और प्रशासन की आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

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