राम मंदिर ट्रस्ट पर निर्मोही अखाड़ा पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, जानिए क्यों – पब्लिक ट्रस्ट और फोरेंसिक ऑडिट की मांग
Digital UP News Desk
अयोध्या/नई दिल्ली। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। श्री पंच रामानंदी निर्मोही अखाड़े ने सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन दाखिल कर ट्रस्ट के पुनर्गठन, उसे ‘पब्लिक ट्रस्ट’ के रूप में स्थापित करने तथा उसके वित्तीय और प्रशासनिक कार्यों की स्वतंत्र निगरानी की मांग की है। साथ ही, ट्रस्ट के वित्तीय एवं संपत्ति संबंधी लेन-देन की फोरेंसिक ऑडिट कराने की भी मांग की गई है।
यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। ऐसे में याचिका में लगाए गए सभी दावों और आरोपों पर अंतिम निर्णय न्यायालय की सुनवाई और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही होगा।
2019 के फैसले की मूल भावना का हवाला
निर्मोही अखाड़े की ओर से दाखिल आवेदन में कहा गया है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट वर्तमान में एक “निजी ट्रस्ट” की तरह कार्य कर रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2019 के ऐतिहासिक फैसले की भावना व्यापक सार्वजनिक हित और पारदर्शी प्रबंधन की ओर संकेत करती है।
याचिका में दावा किया गया है कि ट्रस्ट की संरचना और कार्यप्रणाली में ऐसे बदलाव किए जाने की आवश्यकता है, जिससे धार्मिक, प्रशासनिक और वित्तीय मामलों में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।
हालांकि यह निर्मोही अखाड़े का पक्ष है। इस संबंध में ट्रस्ट या केंद्र सरकार का विस्तृत आधिकारिक पक्ष समाचार लिखे जाने तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं था।
ट्रस्ट को ‘पब्लिक ट्रस्ट’ बनाने की मांग
याचिका में प्रमुख मांग यह है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का पुनर्गठन कर उसे पब्लिक ट्रस्ट के रूप में विकसित किया जाए।
निर्मोही अखाड़े का कहना है कि सार्वजनिक महत्व वाले इस धार्मिक संस्थान के संचालन में स्वतंत्र निगरानी तंत्र होना चाहिए, ताकि प्रशासनिक निर्णयों और वित्तीय गतिविधियों में अधिक पारदर्शिता बनी रहे।
रामानंदी बैरागी संप्रदाय को प्रतिनिधित्व देने की मांग
याचिका में केंद्र सरकार से ट्रस्ट डीड में संशोधन करने का भी अनुरोध किया गया है।
अखाड़े का कहना है कि ट्रस्ट के बोर्ड में रामानंदी बैरागी संप्रदाय के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि इस संप्रदाय का श्रीराम जन्मभूमि से ऐतिहासिक और धार्मिक संबंध रहा है, इसलिए ट्रस्ट के संचालन में उनका प्रतिनिधित्व होना आवश्यक है।
पारंपरिक धार्मिक भूमिका बहाल करने की मांग
निर्मोही अखाड़े ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि मंदिर में पूजा, भोग, सेवा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में उसकी पारंपरिक भूमिका को पुनः स्थापित किया जाए।
अखाड़े का दावा है कि ऐतिहासिक रूप से वह इन धार्मिक व्यवस्थाओं का हिस्सा रहा है। इसलिए मंदिर की वर्तमान व्यवस्था में भी उसकी भूमिका सुनिश्चित की जानी चाहिए।
इस संबंध में अंतिम निर्णय न्यायालय के आदेश और संबंधित पक्षों की दलीलों पर निर्भर करेगा।
फॉरेंसिक ऑडिट की मांग
याचिका का एक महत्वपूर्ण बिंदु ट्रस्ट के वित्तीय लेन-देन और संपत्ति प्रबंधन की फॉरेंसिक ऑडिट कराना भी है।
निर्मोही अखाड़े ने आवेदन में हाल के समय में सार्वजनिक चर्चा में आए कुछ वित्तीय अनियमितताओं और चढ़ावे से जुड़े विवादों का उल्लेख करते हुए स्वतंत्र जांच की आवश्यकता जताई है।
हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि याचिका में किए गए ये दावे अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता की पुष्टि न्यायालय या सक्षम जांच एजेंसी की रिपोर्ट के बाद ही मानी जाएगी।
स्वतंत्र समिति गठित करने की भी मांग
याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित की जाए।
निर्मोही अखाड़े का कहना है कि समिति यह मूल्यांकन करे कि न्यायालय के निर्देशों का पालन किस प्रकार किया गया और क्या सभी संबंधित पक्षों को उचित अवसर एवं प्रतिनिधित्व मिला।
मूल रामलला प्रतिमाओं की बहाली का अनुरोध
आवेदन में 5 जनवरी 1950 तथा फरवरी में कुर्क की गई मूल रामलला विराजमान प्रतिमाओं की बहाली की मांग भी शामिल है।
निर्मोही अखाड़े का कहना है कि इस विषय पर भी न्यायालय उचित दिशा-निर्देश जारी करे। हालांकि इस संबंध में भी अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।
किसके माध्यम से दाखिल हुई याचिका
जानकारी के अनुसार, यह आवेदन महंत राजा रामचंद्राचार्य अतीत गुरु रघुनाथ दास के माध्यम से दाखिल किया गया है। याचिका में कहा गया है कि उन्हें 5 जुलाई 2026 को पारित प्रस्ताव के तहत सरपंच, महंत एवं सर्वाकार के रूप में नियुक्त किया गया है।
याचिका में इन तथ्यों का उल्लेख करते हुए स्वयं को अखाड़े की ओर से अधिकृत प्रतिनिधि बताया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित है मामला
फिलहाल यह पूरा मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है। न्यायालय सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही इस पर कोई निर्णय देगा।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि संवैधानिक और धार्मिक महत्व से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय सभी तथ्यों, दस्तावेजों और संबंधित पक्षों की दलीलों का विस्तृत परीक्षण करता है। इसलिए अंतिम निर्णय आने तक किसी भी पक्ष के दावे को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
कानूनी और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मामला
राम मंदिर देश की आस्था से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। ऐसे में ट्रस्ट की संरचना, प्रशासनिक व्यवस्था और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़े किसी भी विवाद का कानूनी समाधान न्यायालय के माध्यम से ही संभव है।
श्री पंच रामानंदी निर्मोही अखाड़े द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर यह याचिका राम मंदिर ट्रस्ट की संरचना और प्रशासन को लेकर एक नया कानूनी अध्याय खोलती है। याचिका में ट्रस्ट को पब्लिक ट्रस्ट बनाने, स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था स्थापित करने, फोरेंसिक ऑडिट कराने तथा पारंपरिक धार्मिक अधिकार बहाल करने सहित कई मांगें की गई हैं। फिलहाल मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। ऐसे में सभी पक्षों की दलीलों और न्यायालय के अंतिम निर्णय के बाद ही इस पूरे विवाद की दिशा और स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

