बांदा में दरोगा पर रिश्वत मांगने और अधिवक्ता से अभद्रता का आरोप, एसपी से निष्पक्ष जांच की मांग

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रिपोर्ट – शैलेन्द्र शानू वर्मा 

बांदा: उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पुलिस कार्यप्रणाली को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। जिले की कृषि विश्वविद्यालय पुलिस चौकी में तैनात एक उपनिरीक्षक पर जमानतदार के सत्यापन के नाम पर कथित रूप से रिश्वत मांगने, अधिवक्ता और जमानतदार के साथ अभद्र व्यवहार करने तथा अन्य गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इस मामले में पीड़ित अधिवक्ता ने पुलिस अधीक्षक (एसपी) को शिकायती पत्र देकर निष्पक्ष जांच कराने और संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि फिलहाल ये आरोप शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए हैं। समाचार लिखे जाने तक पुलिस की ओर से इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि या विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

जमानतदार के सत्यापन के लिए पहुंचे थे अधिवक्ता

शिकायत के अनुसार, 15 जुलाई 2026 को अधिवक्ता संदीप कुमार एक अभियुक्त के जमानतदार का सत्यापन कराने कृषि विश्वविद्यालय पुलिस चौकी पहुंचे थे। अधिवक्ता का कहना है कि न्यायालय की प्रक्रिया पूरी करने के लिए पुलिस सत्यापन आवश्यक था और इसी उद्देश्य से वह चौकी पहुंचे थे।

शिकायती पत्र में आरोप लगाया गया है कि सत्यापन की प्रक्रिया शुरू करने से पहले चौकी में तैनात उपनिरीक्षक दीपक कुमार सैनी ने कथित रूप से ₹5,000 की रिश्वत की मांग की। शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने रिश्वत देने से इनकार करते हुए नियमानुसार मौके पर जाकर सत्यापन करने का अनुरोध किया।

विरोध करने पर अभद्रता और मारपीट का आरोप

अधिवक्ता का आरोप है कि रिश्वत देने से इनकार करने के बाद पुलिसकर्मी नाराज हो गए। शिकायत के अनुसार, पहले जमानतदार के साथ कथित रूप से गाली-गलौज की गई और उसके बाद मारपीट की गई।

इसके अलावा शिकायत में यह भी कहा गया है कि जमानतदार को चौकी के एक कमरे में बैठा लिया गया। वहीं अधिवक्ता के साथ भी कथित रूप से अभद्र व्यवहार किया गया। उनका आरोप है कि इस दौरान उनके साथ अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया और उनका मोबाइल फोन भी छीन लिया गया।

घंटों तक चौकी में बैठाकर रखने का दावा

शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्हें सुबह लगभग 10 बजे से दोपहर करीब 3 बजे तक पुलिस चौकी में बैठाकर रखा गया। इस दौरान उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई।

अधिवक्ता का आरोप है कि इस पूरी घटना के दौरान उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उन्होंने अपने शिकायती पत्र में लिखा है कि उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया जिससे उन्हें पेशेवर और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर अपमान का सामना करना पड़ा।

जातिसूचक टिप्पणी और धमकी देने का भी आरोप

शिकायत में एक अन्य गंभीर आरोप यह भी लगाया गया है कि चौकी में मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों ने कथित रूप से जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया।

इसके साथ ही अधिवक्ता का कहना है कि उन पर दबाव बनाकर एक वीडियो भी बनवाया गया। शिकायत के अनुसार, उन्हें कथित रूप से यह चेतावनी दी गई कि यदि उन्होंने पुलिस की बात नहीं मानी तो उन्हें झूठे मुकदमे में फंसा दिया जाएगा।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है।

एसपी से की निष्पक्ष जांच की मांग

पूरे घटनाक्रम के बाद पीड़ित अधिवक्ता ने पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत सौंपते हुए मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उन्होंने अनुरोध किया है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित उपनिरीक्षक और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ विधि सम्मत कार्रवाई की जाए।

इसके साथ ही उन्होंने पूरे मामले की जांच किसी निष्पक्ष अधिकारी से कराने की भी मांग की है ताकि तथ्यों की पारदर्शी तरीके से जांच हो सके।

कानूनी दृष्टि से गंभीर हैं आरोप

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी सरकारी कर्मचारी पर रिश्वत मांगने, अभद्र व्यवहार, अवैध रूप से रोककर रखने या जातिसूचक टिप्पणी जैसे आरोप सिद्ध होते हैं, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

हालांकि किसी भी मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने और सक्षम प्राधिकारी की रिपोर्ट के बाद ही सामने आता है। इसलिए केवल शिकायत के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता।

पुलिस पक्ष का इंतजार

समाचार लिखे जाने तक इस मामले में पुलिस विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया था। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच के बाद पुलिस प्रशासन क्या निष्कर्ष निकालता है और क्या कार्रवाई की जाती है।

यदि पुलिस विभाग इस मामले में अपना पक्ष जारी करता है या जांच से संबंधित कोई नई जानकारी सामने आती है, तो उसे भी समाचार में प्रमुखता से शामिल किया जाएगा।

बांदा में सामने आया यह मामला पुलिस व्यवस्था और शिकायत निवारण प्रणाली पर कई सवाल खड़े करता है। हालांकि फिलहाल यह पूरा मामला शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों पर आधारित है और इसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।

ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच न केवल शिकायतकर्ता को न्याय दिलाने में सहायक होती है, बल्कि पुलिस व्यवस्था में आम लोगों के विश्वास को भी मजबूत करती है। जांच रिपोर्ट और पुलिस के आधिकारिक पक्ष के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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