अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग हुई तेज, जानिए फलाहारी महाराज ने CM पत्र में क्या लिखा?

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मथुरा: श्रीकृष्ण जन्मभूमि प्रकरण के याचिकाकर्ता फलाहारी महाराज ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग की है। उन्होंने अपने पत्र में आग्रह किया है कि ट्रस्ट में उन प्रमुख संतों को भी शामिल किया जाए, जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन और कार सेवा में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसके साथ ही उन्होंने बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, जगद्गुरु रामभद्राचार्य तथा अन्य प्रमुख संतों को ट्रस्ट में प्रतिनिधित्व देने का सुझाव दिया है।

फलाहारी महाराज का कहना है कि मंदिरों के संचालन में संत समाज की भूमिका बढ़ाने से पारदर्शिता, सेवा और सनातन परंपराओं को और मजबूती मिल सकती है। वहीं उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मंदिर में आने वाले दान का उपयोग गौ सेवा, वैदिक शिक्षा और सामाजिक कल्याण से जुड़े बड़े प्रकल्पों में किया जाए।

मुख्यमंत्री को भेजा विस्तृत पत्र – जिसमें लिखी अपनी यह मांग

फलाहारी महाराज ने मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में कहा कि अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर देश और दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में मंदिर के संचालन और प्रशासनिक व्यवस्था में संत समाज की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने पर विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जिन संतों ने वर्षों तक राम मंदिर आंदोलन, जन जागरण और कारसेवा में योगदान दिया, उन्हें भी मंदिर ट्रस्ट में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उनके अनुसार इससे श्रद्धालुओं की भावनाओं का भी सम्मान होगा।

संतों को ट्रस्ट में शामिल करने की रखी मांग

अपने पत्र में फलाहारी महाराज ने विशेष रूप से धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और जगद्गुरु रामभद्राचार्य सहित उन संतों का उल्लेख किया है, जिन्हें वे राम मंदिर आंदोलन और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में सक्रिय मानते हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि ट्रस्ट में ऐसे संतों को स्थान मिलने से धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विषयों पर व्यापक अनुभव का लाभ मंदिर प्रशासन को मिल सकेगा। हालांकि यह उनका व्यक्तिगत सुझाव और मांग है, जिस पर निर्णय संबंधित प्राधिकरण द्वारा लिया जाना है।

रामराज्य की परंपरा का दिया संदर्भ

फलाहारी महाराज ने अपने पत्र में कहा कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम के शासनकाल में मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के संचालन में संत समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। उनका मत है कि वर्तमान समय में भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि समाज को संस्कार, सेवा और सांस्कृतिक दिशा देने वाले केंद्र भी होते हैं। इसलिए उनके संचालन में धार्मिक परंपराओं का अनुभव रखने वाले संतों की भागीदारी उपयोगी हो सकती है।

दान राशि के उपयोग को लेकर  दिया अपना यह सुझाव

फलाहारी महाराज ने अपने पत्र में मंदिर में आने वाले दान के उपयोग को लेकर भी सुझाव दिए हैं। उन्होंने कहा कि यदि उपलब्ध संसाधनों का एक हिस्सा सामाजिक और धार्मिक परियोजनाओं में लगाया जाए तो उसका व्यापक लाभ समाज को मिल सकता है।

उन्होंने विशेष रूप से देश की बड़ी गौशाला स्थापित करने तथा एक विशाल गुरुकुल के निर्माण का प्रस्ताव रखा। उनके अनुसार इससे गौसंरक्षण, वैदिक शिक्षा, भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के संरक्षण को नई दिशा मिल सकती है।

हालांकि दान राशि के उपयोग से जुड़े सभी निर्णय संबंधित ट्रस्ट और उसके नियमों के अनुसार ही लिए जाते हैं।

गौशालाओं की व्यवस्था पर जताई चिंता

पत्र में फलाहारी महाराज ने सरकारी तंत्र द्वारा संचालित कुछ गौशालाओं की व्यवस्था पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उनके अनुसार कई स्थानों पर गौशालाओं की स्थिति अपेक्षा के अनुरूप नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि संत समाज लंबे समय से निस्वार्थ भाव से गौसेवा करता आया है। इसलिए यदि धार्मिक संस्थानों और गौसेवा से जुड़े कार्यों में संतों की भागीदारी बढ़े, तो इससे सेवा कार्यों को और मजबूती मिल सकती है। यह उनके व्यक्तिगत विचार हैं।

सेवा और पारदर्शिता पर दिया जोर

फलाहारी महाराज ने अपने पत्र में कहा कि संत समाज का मूल उद्देश्य सेवा, त्याग और धर्म की रक्षा माना जाता है। उनके अनुसार मंदिरों के संसाधनों का उपयोग समाजहित और लोककल्याण के कार्यों में प्राथमिकता के साथ किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि मंदिर प्रशासन में व्यापक प्रतिनिधित्व और पारदर्शिता सुनिश्चित हो, तो श्रद्धालुओं का विश्वास और अधिक मजबूत होगा। हालांकि मंदिर ट्रस्ट की संरचना और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े निर्णय निर्धारित कानूनी और संस्थागत प्रक्रियाओं के अनुसार ही लिए जाते हैं।

मुख्यमंत्री से की गंभीर विचार की अपील

पत्र के अंत में फलाहारी महाराज ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट के पुनर्गठन के विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए। उन्होंने कहा कि संत समाज को नेतृत्व में अधिक प्रतिनिधित्व मिलने से मंदिर प्रबंधन सेवा, पारदर्शिता और सनातन परंपराओं के अनुरूप आगे बढ़ सकता है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार इस सुझाव पर विचार करेगी और यदि आवश्यक समझेगी तो संबंधित स्तर पर उचित निर्णय लिया जाएगा।

निर्णय संबंधित प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में

ध्यान देने योग्य बात यह है कि अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट की संरचना और उसके सदस्यों से जुड़े विषय निर्धारित कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत आते हैं। ऐसे में ट्रस्ट में किसी भी प्रकार का बदलाव संबंधित प्राधिकरण और लागू नियमों के अनुसार ही किया जा सकता है।

फिलहाल फलाहारी महाराज का यह पत्र एक सुझाव और मांग के रूप में सामने आया है। इस पर सरकार या संबंधित ट्रस्ट की ओर से किसी आधिकारिक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।

अब हो रही चर्चा

अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट के पुनर्गठन को लेकर फलाहारी महाराज द्वारा मुख्यमंत्री को भेजा गया पत्र चर्चा का विषय बना हुआ है। पत्र में उन्होंने संत समाज की भागीदारी बढ़ाने, प्रमुख संतों को ट्रस्ट में शामिल करने तथा मंदिर के संसाधनों का उपयोग गौ सेवा, गुरुकुल और सामाजिक कल्याण के कार्यों में करने जैसे सुझाव दिए हैं।

हालांकि इन सभी प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय संबंधित ट्रस्ट, सरकार और सक्षम प्राधिकरण द्वारा निर्धारित नियमों और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही लिया जाएगा। फिलहाल यह विषय सार्वजनिक चर्चा और सुझाव के रूप में सामने आया है।

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