सांझी महोत्सव 2026: श्रीकृष्ण की लीलाओं से सजी ब्रज की लोककला, 40 छात्राओं ने सीखी सांझी बनाने की विधा
रिपोर्ट – योगेश भारद्वाज
मथुरा। ब्रज की प्राचीन लोककला सांझी एक बार फिर अपनी कलात्मक विविधता और सांस्कृतिक विरासत के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद और जीएलए विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में महावन स्थित रसखान-ताज बीबी समाधि परिसर में आयोजित सांझी महोत्सव-2026 में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को अलग-अलग कलात्मक माध्यमों से प्रस्तुत किया जा रहा है। पांच दिवसीय महोत्सव के चौथे दिन शुक्रवार को बड़ी संख्या में वैष्णव तीर्थयात्रियों और कला प्रेमियों ने पहुंचकर सांझी कला के विविध रूपों का अवलोकन किया। वहीं, कौशल विकास कार्यशाला के माध्यम से करीब 40 छात्राओं को इस पारंपरिक कला का प्रशिक्षण दिया गया।
महोत्सव में पोर्ट्रेट पर उकेरी गईं श्रीकृष्ण की लीलाएं, पानी पर तैरती सांझी और गोबर से तैयार पारंपरिक सांझी विशेष आकर्षण बनी हुई हैं। इसके साथ ही रंगोली और कागज पर तैयार की गई कलात्मक आकृतियों ने भी परिसर की सुंदरता बढ़ाई। इस आयोजन का उद्देश्य ब्रज की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को इस प्राचीन लोककला से जोड़ना भी है।
पानी पर तैरती सांझी ने खींचा दर्शकों का ध्यान
सांझी महोत्सव में वृंदावन के प्रसिद्ध चित्रकार रसिक बल्लभ गोस्वामी की पानी पर तैरती सांझी दर्शकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही। इस अनूठी कलात्मक विधा ने लोगों को सांझी कला की विविधता से परिचित कराया। वहीं, चित्रकार विश्वजीत और उनके साथी कलाकारों ने भी अपनी रचनात्मकता के माध्यम से सांझी कला के विभिन्न स्वरूपों को प्रस्तुत किया।
इसके अलावा धौलीप्याऊ निवासी सेवानिवृत्त प्राचार्य उमा जी ने पोर्ट्रेट पर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को उकेरकर अपनी कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। मिर्जापुर की चित्रकार खुशबू और बलदेव पब्लिक स्कूल की छात्राओं द्वारा तैयार की गईं सांझी की रचनाएं भी दर्शकों को पसंद आईं।
इसी क्रम में दक्ष एजुकेशन इंस्टीट्यूट की छात्राओं की सांझी कलाकृतियों और कार्ष्णि इंटर कॉलेज के विद्यार्थियों की रंगोली ने परिसर को आकर्षक रूप दिया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से विद्यार्थियों ने यह दिखाया कि पारंपरिक लोककला को नई सोच और रचनात्मक प्रयोगों के साथ भी आगे बढ़ाया जा सकता है।
गोबर से तैयार सांझी में दिखी पारंपरिक कला की झलक
महोत्सव में पारंपरिक विधियों से तैयार की गई सांझी भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रही। आगरा की सुनीता और अनुष्का तथा गोकुल की लक्ष्मी ने गोबर से सांझी तैयार कर इस लोककला के पारंपरिक स्वरूप को प्रदर्शित किया। इन कलाकृतियों के माध्यम से ब्रज की लोकपरंपराओं और धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताओं की झलक देखने को मिली।
दरअसल, सांझी कला का संबंध ब्रज की धार्मिक परंपराओं और भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ा हुआ है। समय के साथ इस कला में विभिन्न माध्यमों और तकनीकों का समावेश हुआ है। यही वजह है कि महोत्सव में पारंपरिक सामग्री से लेकर पोर्ट्रेट और पानी पर तैयार की गई सांझी तक के अलग-अलग रूप देखने को मिल रहे हैं।
40 छात्राओं ने सीखी पेपर कटिंग से सांझी बनाने की कला
सांझी महोत्सव के चौथे दिन शुक्रवार को कौशल विकास कार्यशाला का भी आयोजन किया गया। इसमें करीब 40 छात्राओं ने पेपर कटिंग के माध्यम से सांझी बनाने की विधि सीखी। वृंदावन के सांझी कला विशेषज्ञ अमरेश चंद्र भट्ट ने छात्राओं को स्टेंसिल तैयार करने और उसके माध्यम से आकर्षक आकृतियां बनाने का प्रशिक्षण दिया।
प्रशिक्षण के दौरान छात्राओं ने कागज पर विभिन्न डिजाइन तैयार किए। इसके बाद उन्होंने कागज को निर्धारित आकृतियों में काटकर स्टेंसिल बनाए और रंगों का प्रयोग करते हुए सांझी कला का अभ्यास किया। इस प्रक्रिया के माध्यम से छात्राओं को पारंपरिक कला की तकनीक समझने और अपनी रचनात्मक क्षमता विकसित करने का अवसर मिला।
अमरेश चंद्र भट्ट ने सांझी कला की परंपरा के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के गाय चराकर लौटने पर उनके स्वागत में सांझी बनाई जाती थी। कालांतर में यह परंपरा मंदिरों में विकसित हुई और विभिन्न स्वरूपों में आगे बढ़ती रही। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में इस कला के संरक्षण के साथ नई पीढ़ी को इससे जोड़ना आवश्यक है।
कौशल विकास से रोजगार की संभावनाओं पर जोर
कार्यशाला में खाजानी वूमंस इंस्टीट्यूट की निदेशक शिप्रा राठी ने कहा कि सांझी कला को कौशल विकास से जोड़ने की पहल इसके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। साथ ही, इसके माध्यम से छात्राओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार की संभावनाएं भी विकसित की जा सकती हैं।
महोत्सव में समन्वय कर रहे चंद्र प्रताप सिंह सिकरवार ने बताया कि कार्यशाला में दक्ष एजुकेशन इंस्टीट्यूट और खाजानी वूमंस इंस्टीट्यूट, मथुरा की छात्राओं ने प्रतिभाग किया। कार्यशाला का अगला सत्र 10 अक्टूबर को आयोजित किया जाएगा। इस प्रकार प्रशिक्षण कार्यक्रम के जरिए छात्राओं को सांझी कला की बारीकियां सीखने का अवसर मिल रहा है।
संगोष्ठी में सांझी कला के संरक्षण पर हुआ मंथन
कार्यशाला के साथ सांझी कला के संरक्षण और संवर्धन पर केंद्रित संगोष्ठी भी आयोजित की गई। इसमें अनीता सिकरवार, मांडवी राठौर और संतोष रिचा सहित अन्य कलाकारों ने भाग लिया। वक्ताओं ने सांझी निर्माण की परंपराओं, इसकी विशिष्ट कलात्मक विशेषताओं और नई पीढ़ी तक इसे पहुंचाने के तरीकों पर विचार साझा किए।
संगोष्ठी में इस बात पर जोर दिया गया कि पारंपरिक लोककलाओं को जीवित रखने के लिए केवल प्रदर्शन पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रशिक्षण, नियमित अभ्यास और युवाओं की भागीदारी भी जरूरी है। इसके साथ ही, कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से सांझी कला को आजीविका के अवसरों से जोड़ने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।
ब्रज की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की पहल
सांझी महोत्सव-2026 के माध्यम से ब्रज की प्राचीन लोककला को एक ऐसा मंच मिल रहा है, जहां अनुभवी कलाकारों के साथ विद्यार्थी भी अपनी प्रतिभा प्रदर्शित कर रहे हैं। एक ओर कलात्मक प्रस्तुतियां दर्शकों को भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और ब्रज की परंपराओं से परिचित करा रही हैं, वहीं दूसरी ओर कार्यशालाएं नई पीढ़ी को इस कला को सीखने का अवसर दे रही हैं।

