तिरुपति बालाजी की ठोड़ी पर आज भी क्यों लगाया जाता है कपूर? जानिए भक्त और भगवान की भावपूर्ण कथा

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तिरुमला की पवित्र पहाड़ियों पर विराजमान भगवान श्री वेंकटेश्वर यानी तिरुपति बालाजी देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। भगवान वेंकटेश्वर से जुड़ी अनेक मान्यताएं और परंपराएं भक्तों के बीच सदियों से प्रचलित हैं। इन्हीं में एक विशेष परंपरा भगवान बालाजी की ठोड़ी से जुड़ी है। मान्यता है कि उनकी ठोड़ी पर आज भी विशेष कपूर-मिश्रित औषधि का लेप लगाया जाता है। इसके पीछे एक भावपूर्ण कथा भगवान और उनके अनन्य भक्त के प्रेम को दर्शाती है।

भगवान बालाजी और वृद्ध ग्वाले की कथा

लोकमान्यता के अनुसार, बहुत समय पहले तिरुमला की पहाड़ियों के नीचे बसे एक गांव में एक वृद्ध ग्वाला रहता था। उसके पास कई गौएं थीं और वह भगवान वेंकटेश्वर का परम भक्त था। उम्र बढ़ने के बावजूद उसकी श्रद्धा और सेवा-भाव में कभी कमी नहीं आई।

वह प्रतिदिन सुबह अपनी गायों का ताजा दूध निकालता और उसे लेकर कठिन पहाड़ी रास्ते से भगवान बालाजी के मंदिर पहुंचता था। वहां वह पूरे प्रेम और श्रद्धा के साथ दूध भगवान के चरणों में अर्पित करता था।

हालांकि, उम्र बढ़ने के कारण उसके लिए रोज इतनी कठिन यात्रा करना मुश्किल होता जा रहा था। भक्त की परेशानी देखकर भगवान वेंकटेश्वर ने उसकी भक्ति की परीक्षा लेने के बजाय उसके कष्ट को कम करने का निश्चय किया।

कहा जाता है कि एक रात भगवान ने वृद्ध ग्वाले को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि अब उसे इतनी कठिन यात्रा करने की आवश्यकता नहीं है। भगवान स्वयं उसकी सेवा-भावना से प्रसन्न थे और चाहते थे कि वृद्ध भक्त अपने शरीर को अधिक कष्ट न दे।

लेकिन ग्वाले ने भगवान से कहा कि उनकी सेवा करना ही उसके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। इसलिए वह इस सेवा को छोड़ना नहीं चाहता।

भगवान ने बदला ग्वाले का रूप

भक्त की इच्छा देखकर भगवान ने एक अद्भुत लीला रची। मान्यता के अनुसार, भगवान हर रात साधारण ग्वाले का रूप धारण करके वृद्ध भक्त की गौशाला में पहुंचने लगे। वहां वे गायों का दूध पी लेते।

सुबह जब वृद्ध ग्वाला दूध दुहने पहुंचता, तो गायों से अपेक्षित मात्रा में दूध नहीं मिलता। कई दिनों तक ऐसा होने पर उसे चिंता होने लगी। उसे लगा कि रात के समय कोई व्यक्ति उसकी गायों का दूध ले जाता है।

आखिरकार उसने सच्चाई जानने का फैसला किया। एक रात वह जागकर गौशाला में पहरा देने लगा। आधी रात के समय उसने एक व्यक्ति को गायों के पास देखा। उसे लगा कि वही व्यक्ति रोज दूध ले जाता है।

गुस्से में वृद्ध ग्वाले ने लाठी उठाई और उस व्यक्ति का पीछा करने लगा। वह रहस्यमयी ग्वाला वहां से भागने लगा। इसी दौरान वृद्ध भक्त ने लाठी फेंकी, जो उस ग्वाले की ठोड़ी पर जा लगी।

इसके बाद वह व्यक्ति वहां से ओझल हो गया।

मंदिर पहुंचकर भक्त को हुआ अपनी भूल का एहसास

अगली सुबह वृद्ध ग्वाला हमेशा की तरह दूध लेकर भगवान बालाजी के मंदिर पहुंचा। लेकिन जैसे ही उसने भगवान के दर्शन किए, वह स्तब्ध रह गया।

मान्यता के अनुसार, भगवान वेंकटेश्वर की दिव्य प्रतिमा की ठोड़ी पर चोट के निशान दिखाई दिए और वहां रक्त की बूंदें नजर आईं। यह देखकर भक्त व्याकुल हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि भगवान को चोट कैसे लगी।

तभी भगवान की करुणामयी वाणी सुनाई दी कि जिस व्यक्ति ने पिछली रात ग्वाले को लाठी मारी थी, चोट उसी के कारण लगी है।

वृद्ध भक्त को तुरंत अपनी गलती का एहसास हो गया। उसे समझ आ गया कि रात में दिखाई देने वाला साधारण ग्वाला कोई और नहीं, बल्कि स्वयं भगवान वेंकटेश्वर थे।

वह भगवान के चरणों में गिर पड़ा और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगने लगा।

भगवान ने बताया भक्त के प्रेम का रहस्य

कथा के अनुसार, भगवान ने अपने भक्त को बताया कि वह उसकी कठिनाई को देखकर स्वयं उसके घर दूध लेने जाते थे। भगवान नहीं चाहते थे कि वृद्ध भक्त उम्र के इस पड़ाव पर रोज कठिन पहाड़ी रास्ते की यात्रा करे।

यह सुनकर ग्वाले की आंखों में आंसू आ गए। उसने भगवान की ठोड़ी पर लगी चोट के लिए स्वयं को जिम्मेदार माना। इसके बाद उसने श्रद्धापूर्वक औषधि और कपूर का लेप तैयार किया और भगवान की ठोड़ी पर लगाया।

कहा जाता है कि भगवान अपने भक्त की निष्काम सेवा और प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भक्त से वरदान मांगने को कहा।

वृद्ध ग्वाले ने धन, संपत्ति, वैभव या स्वर्ग की कामना नहीं की। उसने केवल इतना वर मांगा कि उसे जीवनभर भगवान की सेवा और भक्ति करने का अवसर मिलता रहे।

भगवान ने उसकी यह इच्छा स्वीकार कर ली।

आज भी जुड़ी है कपूर लगाने की परंपरा

लोकमान्यता में इसी कथा को भगवान तिरुपति बालाजी की ठोड़ी पर कपूर-मिश्रित औषधि लगाने की परंपरा से जोड़ा जाता है। श्रद्धालुओं के लिए यह परंपरा भगवान और भक्त के बीच अटूट प्रेम, करुणा और सेवा-भाव का प्रतीक मानी जाती है।

दरअसल, इस कथा का संदेश केवल एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है। इसमें भक्त की निस्वार्थ सेवा और भगवान की अपने भक्त के प्रति करुणा को प्रमुखता दी गई है। वृद्ध होने के बावजूद ग्वाले ने अपनी सेवा को बोझ नहीं माना। वहीं, भगवान ने भी अपने भक्त की परेशानी को समझते हुए स्वयं उसकी सहायता करने की लीला रची।

इसलिए तिरुपति बालाजी की ठोड़ी पर कपूर या औषधि लगाए जाने की मान्यता श्रद्धालुओं के लिए आस्था और भावनाओं से जुड़ी हुई है। यह कथा उन्हें याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति में किसी फल की अपेक्षा नहीं होती। भक्त जब पूरी श्रद्धा और निष्काम भाव से भगवान की सेवा करता है, तो भगवान भी अपने भक्त के प्रति करुणा और प्रेम का भाव रखते हैं।

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