बरसाना के विरक्त संत रमेश बाबा का गोलोक गमन, ब्रज में शोक की लहर

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रिपोर्ट – योगेश भारद्वाज

मथुरा/बरसाना। ब्रजभूमि की भक्ति, गौ-सेवा और पर्यावरण संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले विरक्त संत एवं पद्मश्री सम्मानित रमेश बाबा महाराज के गोलोक गमन की खबर से पूरे ब्रजमंडल में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके निधन की सूचना मिलते ही बरसाना स्थित मान मंदिर, राधा रानी मंदिर और श्री माताजी गौशाला में श्रद्धालुओं एवं संत समाज की भीड़ जुटने लगी। भक्तगण उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके आध्यात्मिक एवं सामाजिक योगदान को याद कर रहे हैं।

रमेश बाबा को ब्रज में केवल एक संत के रूप में नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण भक्ति, गौ-सेवा और प्रकृति संरक्षण के लिए जीवनभर कार्य करने वाले संत के रूप में जाना जाता था। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राधा नाम के प्रचार, ब्रज की संस्कृति के संरक्षण और निराश्रित गौवंश की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनके गोलोक गमन से ब्रज ने एक ऐसे संत को खो दिया है, जिनका प्रभाव धार्मिक क्षेत्र के साथ-साथ सामाजिक और पर्यावरणीय गतिविधियों पर भी रहा।

बचपन से ही वैराग्य की ओर था झुकाव

रमेश बाबा का जन्म वर्ष 1938 में तीर्थराज प्रयाग में हुआ था। वे विख्यात ज्योतिषाचार्य बलदेव प्रसाद शुक्ल के पुत्र बताए जाते हैं। बचपन से ही उनका मन सांसारिक जीवन की अपेक्षा आध्यात्मिकता और वैराग्य की ओर अधिक आकर्षित था। युवावस्था में उन्होंने गृह त्याग कर ब्रजभूमि को अपनी कर्मभूमि बनाया और बरसाना धाम में रहकर साधना एवं सेवा का मार्ग अपनाया।

बरसाना पहुंचने के बाद उन्होंने राधा-कृष्ण भक्ति को अपने जीवन का आधार बनाया। इसी क्रम में मान मंदिर और श्री माताजी गौशाला जैसे महत्वपूर्ण सेवा संस्थानों की स्थापना हुई। समय के साथ इन संस्थानों ने ब्रज क्षेत्र में धार्मिक और सामाजिक सेवा का व्यापक स्वरूप धारण किया।

60 हजार से अधिक गौवंश की सेवा

रमेश बाबा की सबसे बड़ी पहचान उनकी गौ-सेवा से जुड़ी रही। बरसाना स्थित श्री माताजी गौशाला में निराश्रित, बीमार और वृद्ध गौवंश की सेवा की जाती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहां 60 हजार से अधिक गौवंश की देखभाल की जाती है। खास बात यह है कि गौशाला की सेवा व्यवस्था को बिना किसी सरकारी अनुदान के संचालित किए जाने का दावा किया जाता है।

रमेश बाबा का मानना था कि गौ-सेवा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि समाज की जिम्मेदारी भी है। इसलिए उन्होंने जीवनभर गौवंश की रक्षा और सेवा के लिए लोगों को प्रेरित किया। उनके प्रयासों से बड़ी संख्या में लोग गौशाला से जुड़े और सेवा कार्यों में योगदान देने लगे।

पर्यावरण संरक्षण के लिए भी चलाया अभियान

गौ-सेवा के साथ-साथ रमेश बाबा ब्रज के प्राकृतिक स्वरूप को बचाने के लिए भी लगातार सक्रिय रहे। उन्होंने ब्रज के पर्वतों पर अवैध खनन के खिलाफ आवाज उठाई। इसके अलावा यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने और ब्रज के पर्यावरण की रक्षा के लिए भी उन्होंने लंबे समय तक अभियान चलाया।

दरअसल, ब्रजभूमि की धार्मिक पहचान उसके पर्वतों, कुंडों, वन क्षेत्रों और यमुना नदी से जुड़ी हुई है। रमेश बाबा इन प्राकृतिक धरोहरों को ब्रज की आध्यात्मिक विरासत का अभिन्न हिस्सा मानते थे। इसलिए उन्होंने धार्मिक गतिविधियों के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी अपने सेवा कार्य का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

उनके इन्हीं सामाजिक और पर्यावरणीय प्रयासों को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2019 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया था। यह सम्मान उनके लंबे सामाजिक, धार्मिक और पर्यावरणीय योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान के रूप में देखा गया।

राधा नाम संकीर्तन था जीवन का आधार

रमेश बाबा का दैनिक जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण बताया जाता है। वे राधा नाम संकीर्तन और प्रभात फेरी के माध्यम से भक्तों को भक्ति मार्ग से जोड़ते थे। उनके लिए राधा नाम केवल आध्यात्मिक साधना नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने का माध्यम था।

उनके शिष्यों और संत समाज के अनुसार बाबा का जीवन त्याग, सादगी और सेवा की मिसाल रहा। वे स्वयं भी सादगीपूर्ण जीवन जीते थे और अपने अनुयायियों को भी सेवा, भक्ति तथा प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देते थे।

अंतिम दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु

रमेश बाबा के गोलोक गमन की सूचना के बाद बरसाना में श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया। मान मंदिर, राधा रानी मंदिर और माताजी गौशाला में संत समाज तथा भक्तों की मौजूदगी बनी हुई है। उनके शिष्य ब्रजशरण महाराज सहित अन्य संतों ने बाबा के जीवन और उनके सेवा कार्यों को याद किया।

भक्तों का कहना है कि रमेश बाबा ने अपना पूरा जीवन ब्रजभूमि की सेवा में लगा दिया। उन्होंने राधा-कृष्ण भक्ति के साथ गौ-सेवा और पर्यावरण संरक्षण को जिस तरह आगे बढ़ाया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणादायक रहेगा।

रमेश बाबा का अंतिम संस्कार बरसाना धाम में वैष्णव परंपरा के अनुसार किए जाने की जानकारी दी गई है। उनके गोलोक गमन पर राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र से भी शोक संवेदनाएं व्यक्त की गई हैं। मुख्यमंत्री और कई केंद्रीय मंत्रियों ने भी उनके निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित की है।

ब्रज के लिए अपूरणीय क्षति

रमेश बाबा के निधन से ब्रजभूमि ने एक ऐसे संत को खो दिया है, जिन्होंने अपना जीवन व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से दूर रहकर लोकसेवा और आध्यात्मिक साधना को समर्पित किया। उनका योगदान केवल मंदिर और आश्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गौ-सेवा, पर्यावरण संरक्षण और ब्रज संस्कृति की रक्षा तक विस्तृत रहा।

आज उनके अनुयायी उन्हें श्रद्धा के साथ याद कर रहे हैं। वहीं, उनके द्वारा स्थापित सेवा परंपराओं और संस्थानों के माध्यम से उनके कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प भी लिया जा रहा है। राधा-कृष्ण भक्ति, गौ-सेवा और ब्रज संरक्षण के क्षेत्र में रमेश बाबा की भूमिका लंबे समय तक याद की जाएगी।