कानपुर में लावारिस मरीज के इलाज में अस्पताल ने पेश की मिसाल, 24 दिन बाद बिना शुल्क किया डिस्चार्ज – जरूर पढ़ें यह मानवता की मिसाल

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Digital UP News

कानपुर: शहर में सड़क पर बीमार और बेसहारा अवस्था में मिलने वाले लोगों के लिए चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती माना जाता है। ऐसे में कानपुर के कल्याणपुर स्थित SIS अस्पताल एंड रिसर्च सेंटर से जुड़ा एक मामला मानवीय संवेदनाओं और सेवा भावना की मिसाल के रूप में सामने आया है। अस्पताल में करीब 24 से 25 दिनों तक एक लावारिस मरीज का उपचार किया गया। डिस्चार्ज प्रक्रिया के दौरान अस्पताल प्रबंधन ने चिकित्सा सेवाओं से जुड़े कई खर्च मरीज से लिए बिना उसे अस्पताल से विदा करने का निर्णय लिया।

यह मामला विजय नगर चौराहे पर मिले राजेश कुमार दीक्षित से जुड़ा है, जिन्हें सड़क पर बीमार अवस्था में पाया गया था। सेवा-सुश्रुषा से जुड़े केके सिंह उर्फ मुन्ना के प्रयासों से उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। इसके बाद अस्पताल के प्रबंधक अशोक सिंह और चिकित्सकों ने मरीज के इलाज के लिए सहयोग का भरोसा दिया।

विजय नगर चौराहे पर मिले थे बीमार अवस्था में

बताया गया कि राजेश कुमार दीक्षित विजय नगर चौराहे के आसपास लावारिस और बीमार अवस्था में पड़े मिले थे। उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें उपचार की आवश्यकता थी। ऐसे समय में उन्हें अस्पताल तक पहुंचाना और इलाज की व्यवस्था करना सबसे महत्वपूर्ण चुनौती थी।

सेवा कार्य से जुड़े केके सिंह उर्फ मुन्ना ने मरीज को अस्पताल पहुंचाने का प्रयास किया। उनके मुताबिक, उस समय यह भी निश्चित नहीं था कि मरीज को जीवित अवस्था में अस्पताल तक पहुंचाया जा सकेगा या नहीं। हालांकि, प्रयास जारी रहे और उन्हें कल्याणपुर स्थित SIS अस्पताल एंड रिसर्च सेंटर में भर्ती कराया गया।

अस्पताल प्रबंधन ने इलाज के लिए बढ़ाया सहयोग का हाथ

मरीज को अस्पताल पहुंचाए जाने के बाद अस्पताल के प्रबंधक अशोक सिंह और चिकित्सक आदित्य त्रिपाठी से उपचार को लेकर बातचीत हुई। इसके बाद मरीज का उपचार शुरू किया गया। करीब 24 से 25 दिनों तक अस्पताल में राजेश कुमार दीक्षित का इलाज चला।

इस दौरान चिकित्सकों और अस्पताल कर्मचारियों की ओर से मरीज की देखभाल की गई। उपचार के साथ-साथ पैथोलॉजी जांच, बेड और भोजन जैसी व्यवस्थाएं भी अस्पताल में उपलब्ध कराई गईं।

डिस्चार्ज के समय अस्पताल प्रबंधन की ओर से बताया गया कि चिकित्सा प्रणाली से जुड़े कई खर्च मरीज से नहीं लिए जाएंगे। अस्पताल प्रबंधन ने पैथोलॉजी जांच, बेड, भोजन और उपचार से संबंधित अन्य खर्चों में सहयोग किया।

चिकित्सकों ने नहीं लिया इलाज का मेहनताना

इस मामले में चिकित्सकों की भूमिका भी सामने आई। उपचार में शामिल चिकित्सकों ने अपने इलाज के मेहनताने को भी मरीज से लेने से इनकार कर दिया। इस पहल के पीछे अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सकों की ओर से मानवीय आधार पर सहयोग की भावना बताई गई।

इससे लावारिस और बेसहारा लोगों के लिए चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने के प्रयास को एक नई दिशा मिली। हालांकि, मरीज के उपचार के दौरान दवाओं पर खर्च हुआ, जिसके लिए अलग से बिल तैयार किया गया था।

दवाओं का बिल देखकर सामने आई नई चुनौती

डिस्चार्ज प्रक्रिया के दौरान दवाओं से संबंधित बिल की राशि करीब 1 लाख 4 हजार 448 रुपये बताई गई। यह राशि सामने आने के बाद मरीज की ओर से दवाओं का भुगतान करना चुनौती बन गया।

बताया गया कि दवाओं के मद में पहले से करीब 13,400 रुपये जमा थे और शेष राशि जमा करने की आवश्यकता थी। ऐसी स्थिति में मरीज की मदद करने वाले लोगों के सामने फिर से आर्थिक समस्या खड़ी हो गई।

इसी दौरान अस्पताल प्रबंधन की ओर से मानवीय सहयोग का भरोसा दिया गया। प्रबंधक अशोक सिंह और चिकित्सक आदित्य त्रिपाठी ने मरीज की स्थिति को देखते हुए सहयोग जारी रखने की बात कही।

सेवा मिशन से जुड़े हैं केके सिंह उर्फ मुन्ना

इस पूरे प्रयास में केके सिंह उर्फ मुन्ना की भूमिका महत्वपूर्ण बताई गई है। सड़क पर बीमार या बेसहारा अवस्था में मिलने वाले लोगों को अस्पताल तक पहुंचाने और उनके उपचार की व्यवस्था कराने के लिए वह लगातार प्रयास करते हैं।

उनका उद्देश्य ऐसे लोगों को चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना है, जिनके पास इलाज कराने के लिए परिवार या आर्थिक संसाधन नहीं होते। इसी क्रम में विजय नगर चौराहे पर मिले राजेश कुमार दीक्षित को भी अस्पताल तक पहुंचाया गया।

केके सिंह के अनुसार, ऐसे सेवा कार्यों में केवल अस्पताल तक मरीज को पहुंचाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उपचार के दौरान दवाओं, जांच और अन्य आवश्यकताओं की व्यवस्था भी करनी पड़ती है। ऐसे में समाज और संस्थानों के सहयोग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

लावारिस मरीजों की सेवा के लिए सहयोग की जरूरत

कानपुर जैसे बड़े शहर में सड़क पर रहने वाले बेसहारा और बीमार लोगों के लिए चिकित्सा सहायता की आवश्यकता लगातार बनी रहती है। ऐसे मामलों में अस्पताल, चिकित्सक, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक मिलकर सहयोग करें तो जरूरतमंद लोगों तक उपचार पहुंचाया जा सकता है।

राजेश कुमार दीक्षित के मामले में भी यही देखने को मिला। एक ओर सेवा कार्य से जुड़े लोगों ने उन्हें अस्पताल तक पहुंचाया, वहीं दूसरी ओर अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सकों ने इलाज में सहयोग किया। इसके परिणामस्वरूप करीब 24 से 25 दिनों के उपचार के बाद उनके डिस्चार्ज की प्रक्रिया आगे बढ़ सकी।

यह घटना इस बात को भी सामने लाती है कि चिकित्सा सेवा केवल अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। जरूरतमंद व्यक्ति तक सहायता पहुंचाने के लिए सामाजिक सहभागिता भी उतनी ही जरूरी है।

मानवीय सेवा का संदेश

विजय नगर से अस्पताल तक पहुंचे राजेश कुमार दीक्षित के इलाज का यह मामला कानपुर में बेसहारा लोगों के लिए चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के प्रयासों को सामने लाता है। अस्पताल प्रबंधन, चिकित्सकों और सेवा कार्य से जुड़े लोगों के सहयोग से करीब 24 दिनों तक उपचार की व्यवस्था की गई।

वहीं, केके सिंह उर्फ मुन्ना की ओर से लावारिस और बेसहारा लोगों की सेवा के लिए किए जा रहे प्रयासों ने इस पूरे मामले को मानवीय पहलू दिया है। दवाओं के खर्च की चुनौती के बावजूद मरीज को उपचार उपलब्ध कराने के लिए सहयोग जुटाने का प्रयास जारी रहा।

ऐसे सेवा कार्य समाज में जरूरतमंद लोगों के प्रति संवेदनशीलता और सहयोग की भावना को मजबूत करते हैं। खास तौर पर उन लोगों के लिए, जिनके पास इलाज के समय साथ देने वाला कोई परिवार या आर्थिक सहारा नहीं होता।

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