मुजफ्फरनगर में 11 साल पुराने NDPS केस में अशोक भारती दोषमुक्त, जज रवि दिवाकर ने न्याय में देरी पर उठाए सवाल

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Digital UP News

मुजफ्फरनगर में करीब 11 साल पुराने नशीले पदार्थ से जुड़े मामले में अदालत ने अशोक भारती को दोषमुक्त कर दिया है। विशेष एनडीपीएस अदालत/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी और अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने 17 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को तर्कपूर्ण संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। इस फैसले के साथ ही अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया में हुई देरी पर भी गंभीर टिप्पणी की।

करीब 11 साल तक चला मुकदमा

मामला वर्ष 2015 का बताया गया है। पुलिस ने अशोक भारती के पास से 150 ग्राम चरस बरामद होने का दावा करते हुए मुकदमा दर्ज किया था। इसके बाद मामले में आरोपपत्र दाखिल हुआ और न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी। हालांकि, सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों में कई कमियां और विरोधाभास सामने आए।

अदालत ने उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि अभियोजन आरोपों को आवश्यक कानूनी कसौटी पर साबित नहीं कर सका। परिणामस्वरूप अशोक भारती को मामले में दोषमुक्त कर दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, बरामदगी के साक्ष्य, गवाहों की उपलब्धता और कथित बरामद पदार्थ के नमूने को अदालत के समक्ष पेश किए जाने समेत कई बिंदुओं पर सवाल सामने आए थे।

फैसले में न्याय में देरी पर टिप्पणी

फैसले का सबसे चर्चित हिस्सा न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की वह टिप्पणी रही, जिसमें उन्होंने एक निर्दोष व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया में लंबा समय लगने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अंततः दोषमुक्त होना है, लेकिन उसे वर्षों तक मुकदमे का सामना करना पड़े, तो यह स्थिति स्वयं न्याय व्यवस्था की गति पर सवाल खड़े करती है।

न्यायाधीश ने अपने फैसले में न्याय में देरी को लेकर फिल्म ‘दामिनी’ के चर्चित संवाद का भी उल्लेख किया। फिल्म में अदालतों में बार-बार तारीख मिलने को लेकर कहा गया संवाद लंबे समय से न्यायिक देरी पर चर्चा का हिस्सा रहा है। जज दिवाकर ने इसी संदर्भ का इस्तेमाल करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के लिए वर्षों तक अदालत के चक्कर लगाना भी अपने आप में एक प्रकार का दंड बन जाता है।

यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि मामला केवल एक आरोपी के दोषमुक्त होने तक सीमित नहीं है। यह न्यायिक प्रक्रिया में समयबद्ध सुनवाई, साक्ष्यों की गुणवत्ता और अभियोजन की जिम्मेदारी जैसे व्यापक सवालों की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है।

साक्ष्य के आधार पर मिला दोषमुक्ति का फैसला

अदालतों में आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष पर आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने का दायित्व होता है। इस मामले में अदालत ने इसी कानूनी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया। जब आरोपों को पर्याप्त रूप से साबित करने के लिए आवश्यक साक्ष्य नहीं मिले, तो अदालत ने अशोक भारती को दोषमुक्त कर दिया।

इस तरह यह फैसला केवल लंबे समय तक चले मुकदमे की वजह से चर्चा में नहीं आया, बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने साक्ष्यों की पर्याप्तता को फैसला सुनाने का प्रमुख आधार बनाया।

कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?

रवि कुमार दिवाकर मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा विशेष न्यायाधीश के रूप में तैनात हैं। पिछले कुछ महीनों में उनके कई फैसले राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, मुजफ्फरनगर में करीब पांच महीनों की अवधि में उनकी अदालत से 11 मामलों में कुल 23 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है।

इसी वजह से उनके न्यायिक फैसलों पर देशभर में ध्यान गया है। हालांकि, किसी भी मामले में दोषसिद्धि या मृत्युदंड का अंतिम प्रभाव संबंधित उच्च न्यायिक प्रक्रिया और अपील के अधिकारों के अधीन होता है। इसलिए ट्रायल कोर्ट के फैसले को न्यायिक प्रक्रिया के एक चरण के रूप में देखा जाना चाहिए।

‘डरपोक जज कहलाना पसंद नहीं’ बयान भी रहा चर्चा में

जज रवि कुमार दिवाकर इससे पहले भी अपने एक फैसले में की गई टिप्पणी को लेकर चर्चा में आए थे। सितंबर 2026 में एक मामले में मृत्युदंड सुनाते हुए उन्होंने कहा था कि वह डर के कारण अपने कर्तव्य से पीछे हटना पसंद नहीं करेंगे। मीडिया रिपोर्टों में उनके बयान को इस रूप में उद्धृत किया गया कि वह “मरना पसंद करेंगे, डरपोक जज कहलाना नहीं।”

यह बयान उस समय सामने आया था जब उन्होंने अपने न्यायिक कार्य से जुड़े दबाव और धमकियों का भी उल्लेख किया था। इसके बाद उनके न्यायिक फैसलों और टिप्पणियों को लेकर चर्चा और तेज हो गई।

न्याय व्यवस्था की गति पर फिर उठी बहस

अशोक भारती के मामले में आया फैसला एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि आपराधिक मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और समयबद्ध कैसे बनाया जाए। किसी आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज होने से लेकर अंतिम निर्णय तक लंबा समय बीतने पर आरोपी, पीड़ित परिवार, गवाह और न्याय व्यवस्था से जुड़े अन्य पक्ष सभी प्रभावित होते हैं।

हालांकि, तेज सुनवाई के साथ निष्पक्ष सुनवाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए अदालतों के सामने चुनौती यह रहती है कि मामलों का निपटारा समय पर हो, लेकिन साथ ही अभियोजन और बचाव पक्ष को कानून के अनुसार अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर भी मिले।

मुजफ्फरनगर के इस मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अशोक भारती को दोषमुक्त कर दिया। साथ ही, न्यायाधीश की टिप्पणी ने न्याय में देरी और न्यायिक प्रक्रिया की गति को लेकर एक व्यापक बहस को फिर सामने ला दिया है। आने वाले समय में यह चर्चा इस बात पर केंद्रित हो सकती है कि लंबित मामलों के निपटारे के साथ-साथ साक्ष्य संकलन और अभियोजन की प्रक्रिया को किस तरह अधिक प्रभावी बनाया जाए।

मुख्य तथ्य:

  • मामला: 150 ग्राम चरस बरामदगी से जुड़ा NDPS केस
  • मामला दर्ज: 2015
  • फैसला: 17 सितंबर 2026
  • आरोपी: अशोक भारती
  • फैसला: साक्ष्य पर्याप्त न होने पर दोषमुक्त
  • अदालत: विशेष एनडीपीएस/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3, मुजफ्फरनगर
  • न्यायाधीश: रवि कुमार दिवाकर
  • चर्चा का प्रमुख विषय: न्याय में देरी और साक्ष्यों की पर्याप्तता