वाणिज्यिक कोयला खदानों की पारदर्शी नीलामी से आत्मनिर्भर भारत को नई ऊर्जा

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Digital UP News Desk

नई दिल्ली: भारत में कोयला खदानों के आवंटन की प्रक्रिया पिछले एक दशक में बड़े संरचनात्मक बदलावों से गुजरी है। वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 204 कोयला ब्लॉकों का आवंटन रद्द किए जाने के बाद सरकार ने कोयला क्षेत्र में पारदर्शिता और नियम आधारित व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया। इसी दिशा में 18 जून 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वाणिज्यिक कोयला खदानों की नीलामी की शुरुआत को एक महत्वपूर्ण सुधार के तौर पर देखा गया। छह वर्षों के दौरान यह व्यवस्था देश के खनन क्षेत्र में प्रमुख सुधारों में शामिल हो गई है।

वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामी का उद्देश्य केवल कोयले का उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि देश की ऊर्जा जरूरतों को घरेलू संसाधनों से पूरा करने, राज्यों के राजस्व में वृद्धि करने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने के साथ-साथ निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना भी है। इसके परिणामस्वरूप कोयला क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और उत्पादन क्षमता में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।

ऑनलाइन नीलामी से बढ़ी पारदर्शिता

वाणिज्यिक कोयला खदानों की नीलामी प्रक्रिया को तकनीक आधारित और पारदर्शी बनाया गया है। बोली प्रक्रिया एमएसटीसी प्लेटफॉर्म के माध्यम से ऑनलाइन दो चरणों में आयोजित की जाती है। बोली दस्तावेजों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत डिक्रिप्ट कर बोलीदाताओं के सामने लाइव प्रस्तुत किया जाता है। इससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने और प्रतिस्पर्धी माहौल तैयार करने में मदद मिलती है।

इसके अलावा, वाणिज्यिक खदानों के अंतिम उपयोग पर प्रतिबंध नहीं होने से कंपनियों को अपने कारोबारी मॉडल के अनुसार कोयले का इस्तेमाल करने की सुविधा मिलती है। इस व्यवस्था में स्वचालित मार्ग के जरिए 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति भी दी गई है। वहीं, अग्रिम भुगतान का बोझ अपेक्षाकृत कम रखा गया है और इसे भविष्य के राजस्व हिस्से के आधार पर समायोजित करने की व्यवस्था की गई है।

इस तरह नीति का ढांचा बड़े उद्योगों के साथ-साथ नए और छोटे खिलाड़ियों के लिए भी अवसर पैदा करता है। परिणामस्वरूप कोयला खनन क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का दायरा लगातार बढ़ा है।

147 कोयला खदानों की हो चुकी नीलामी

सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 से अब तक नौ राज्यों में 147 कोयला खदानों की नीलामी की जा चुकी है। इनमें से 44 खदानें ऐसी नई कंपनियों ने हासिल की हैं, जो पहले इस क्षेत्र में प्रमुख खिलाड़ी नहीं थीं। यह आंकड़ा बताता है कि नीलामी व्यवस्था ने कोयला खनन क्षेत्र में नए उद्यमियों के प्रवेश का रास्ता खोला है।

खास बात यह है कि इस प्रतिस्पर्धा में केवल निजी कंपनियां ही शामिल नहीं हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की पारंपरिक कोयला कंपनियां भी अब नीलामी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं। उदाहरण के तौर पर कोल इंडिया की सहायक कंपनियां वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) और नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (NCL) भी हाल के समय में कोयला ब्लॉकों के लिए आयोजित निविदाओं में शामिल हुई हैं।

इस प्रकार सरकारी और निजी कंपनियां समान नियमों के तहत ब्लॉक हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। इससे कोयला क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मक दक्षता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

राज्यों को राजस्व का बड़ा लाभ

वाणिज्यिक कोयला खदानों की नीलामी का एक महत्वपूर्ण लाभ राज्यों को मिलने वाला राजस्व है। प्रत्येक नीलाम किए गए ब्लॉक से संबंधित राज्य को प्रतिस्पर्धी बोली से प्राप्त राजस्व हिस्सेदारी के अलावा रॉयल्टी, जिला खनिज फाउंडेशन यानी डीएमएफ, राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट यानी एनएमईटी और जीएसटी के रूप में भी राजस्व प्राप्त होता है।

डीएमएफ के माध्यम से खनन प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों और स्थानीय जरूरतों के लिए धन उपलब्ध कराया जाता है। वहीं, एनएमईटी के माध्यम से भविष्य में खनिज अन्वेषण को वित्तीय समर्थन मिलता है। इस तरह कोयला खनन से प्राप्त आर्थिक गतिविधियों का प्रभाव केवल खदान क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राज्य और स्थानीय स्तर पर भी इसका लाभ पहुंचता है।

सरकार के अनुमान के मुताबिक 147 नीलाम किए गए कोयला ब्लॉकों से करीब 47,500 करोड़ रुपये का वार्षिक राजस्व, लगभग 55,000 करोड़ रुपये का पूंजी निवेश और करीब 4.9 लाख रोजगार सृजित होने का अनुमान है। वित्त वर्ष 2025-26 में आवंटित वाणिज्यिक खदानों से अग्रिम और प्रीमियम भुगतान के माध्यम से लगभग 3,090 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ।

कोयला उत्पादन में तेजी

नीलामी व्यवस्था का प्रभाव कोयला उत्पादन के आंकड़ों में भी दिखाई देता है। केवल वाणिज्यिक कोयला खदानों से उत्पादन वित्त वर्ष 2023-24 में 12.55 मिलियन टन था, जो वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 23.51 मिलियन टन हो गया। यह वृद्धि बताती है कि वाणिज्यिक खनन व्यवस्था के तहत उत्पादन क्षमता तेजी से विकसित हो रही है।

इसके अलावा कैप्टिव और वाणिज्यिक कोयला ब्लॉकों से संयुक्त उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 210 मिलियन टन तक पहुंच गया। पहली बार इस श्रेणी में उत्पादन 200 मिलियन टन के आंकड़े को पार कर गया।

तुलना करें तो करीब एक दशक पहले कैप्टिव और वाणिज्यिक ब्लॉकों से संयुक्त कोयला उत्पादन लगभग 28.8 मिलियन टन था। इस अवधि में उत्पादन में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है और लगभग 22 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई है।

आयात पर निर्भरता कम करने में मदद

भारत की ऊर्जा जरूरतों में कोयले की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ाना ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। घरेलू स्तर पर कोयले का उत्पादन बढ़ने से आयातित कोयले की जरूरत को कम करने में मदद मिल सकती है।

सरल शब्दों में कहा जाए तो देश में उत्पादित अतिरिक्त कोयला घरेलू मांग को पूरा करने में योगदान देता है और इससे आयात पर निर्भरता घटाने का अवसर मिलता है। यही वजह है कि वाणिज्यिक कोयला खदानों की नीलामी को भारत के आत्मनिर्भरता अभियान से भी जोड़ा जा रहा है।

हालांकि, इसके साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियों, भूमि पुनर्वास, स्थानीय समुदायों के हित और खनन प्रभावित क्षेत्रों के सतत विकास को भी समान महत्व देना आवश्यक है। खनन गतिविधियों से होने वाले आर्थिक लाभ को स्थानीय विकास के साथ जोड़ना इस क्षेत्र की दीर्घकालिक सफलता के लिए महत्वपूर्ण होगा।

नए निवेश और रोजगार के अवसर

वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामी से पूंजी निवेश को बढ़ावा मिलने के साथ रोजगार के नए अवसर भी बनने की संभावना है। अनुमानित 4.9 लाख रोजगार का सृजन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक गतिविधियों को गति दे सकता है।

इसके अलावा खदानों के संचालन के लिए परिवहन, मशीनरी, लॉजिस्टिक्स, सेवा क्षेत्र और अन्य सहायक उद्योगों में भी मांग बढ़ सकती है। परिणामस्वरूप कोयला खनन का आर्थिक प्रभाव व्यापक स्तर पर दिखाई दे सकता है।