BRICS Summit: दिल्ली घोषणापत्र में फिलिस्तीन का समर्थन, भारत ने टू-स्टेट सॉल्यूशन पर दिया जोर
Digital UP News Desk
नई दिल्ली: भारत की मेजबानी में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) के 18वें शिखर सम्मेलन के दौरान अपनाए गए दिल्ली घोषणापत्र में गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दे को प्रमुखता से शामिल किया गया। घोषणापत्र में फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों, गाजा में मानवीय सहायता की निर्बाध पहुंच और 1967 की सीमाओं के आधार पर एक संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना का समर्थन किया गया है। इसके साथ ही पूर्वी यरुशलम को फिलिस्तीन की राजधानी बनाए जाने की बात भी दोहराई गई।
खास बात यह है कि भारत के इजरायल के साथ पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक, रक्षा और आर्थिक संबंध काफी मजबूत हुए हैं। इसके बावजूद नई दिल्ली लंबे समय से फिलिस्तीन के स्वतंत्र राष्ट्र के अधिकार और टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन करती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के साथ संतुलित कूटनीतिक संबंध बनाए रखने की कोशिश की है।
दिल्ली घोषणापत्र में गाजा की स्थिति पर चिंता
ब्रिक्स देशों के नेताओं ने गाजा में जारी हिंसा और वहां की मानवीय स्थिति को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। घोषणापत्र में फिलिस्तीनी आबादी को जबरन विस्थापित करने वाली किसी भी नीति का विरोध किया गया है। साथ ही गाजा पट्टी में किसी भी प्रकार के भौगोलिक या जनसांख्यिकीय बदलाव का भी विरोध किया गया।
घोषणापत्र में कहा गया कि फिलिस्तीनियों को उनके कब्जे वाले क्षेत्रों से किसी भी बहाने से जबरन हटाया जाना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। यह विस्थापन अस्थायी हो या स्थायी, दोनों ही परिस्थितियों में इसका विरोध किया गया है। इसके अलावा ऐसी किसी भी व्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई, जो फिलिस्तीनी लोगों के मूल अधिकारों को प्रभावित कर सकती है या क्षेत्र में कब्जे की स्थिति को लंबे समय तक बनाए रख सकती है।
इसके साथ ही ब्रिक्स नेताओं ने गाजा पट्टी में मानवीय सहायता की पूरी और बिना किसी बाधा के पहुंच सुनिश्चित करने पर जोर दिया। घोषणापत्र में संबंधित संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को लागू करने की अपील भी की गई।
1967 की सीमाओं पर आधारित फिलिस्तीनी राष्ट्र का समर्थन
ब्रिक्स देशों ने एक बार फिर दोहराया कि इजरायल-फिलिस्तीन विवाद का स्थायी और न्यायपूर्ण समाधान शांतिपूर्ण तरीके से ही संभव है। इसके लिए फिलिस्तीनी लोगों के वैध अधिकारों को सुनिश्चित करना जरूरी बताया गया है।
भारत समेत ब्रिक्स देशों ने 1967 की सीमाओं के भीतर एक संप्रभु फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना का समर्थन किया, जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम हो। यह रुख लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तावित टू-स्टेट सॉल्यूशन के अनुरूप माना जाता है।
घोषणापत्र में कब्जे वाले यरुशलम की कानूनी और ऐतिहासिक स्थिति को बदलने के उद्देश्य से उठाए जाने वाले एकतरफा कदमों को भी खारिज किया गया। इस तरह ब्रिक्स ने फिलिस्तीन मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के आधार पर समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया।
ICJ की कार्यवाही का भी घोषणापत्र में जिक्र
दिल्ली घोषणापत्र में दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) में शुरू की गई कार्यवाही का भी उल्लेख किया गया। इसके साथ ही गाजा में मानवीय सहायता पहुंचाने को लेकर इजरायल की कानूनी जिम्मेदारी पर जोर दिया गया।
ब्रिक्स देशों ने युद्धविराम को बनाए रखने और गाजा में राहत सामग्री की निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई। घोषणापत्र में अक्टूबर 2025 में हुए युद्धविराम समझौते के बावजूद गाजा में जारी हिंसा को लेकर चिंता जताई गई।
हालांकि, भारत का यह रुख इजरायल के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं माना जा रहा है। भारत पहले भी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीन के स्वतंत्र राष्ट्र के अधिकार का समर्थन करता रहा है, जबकि दूसरी ओर इजरायल के साथ उसके रक्षा, तकनीक, कृषि और रणनीतिक सहयोग लगातार आगे बढ़े हैं।
लेबनान के मुद्दे पर भी इजरायल का उल्लेख
ब्रिक्स घोषणापत्र में लेबनान की स्थिति पर भी चर्चा की गई। इसमें लेबनान में युद्धविराम का स्वागत करते हुए सभी पक्षों से इसकी शर्तों का पालन करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 को पूरी तरह लागू करने का आह्वान किया गया।
घोषणापत्र में लेबनान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन पर चिंता जताई गई। इसी संदर्भ में इजरायल से लेबनान सरकार के साथ तय शर्तों का सम्मान करने और उन क्षेत्रों से अपनी सेनाएं हटाने की अपील की गई, जहां वे अभी भी मौजूद हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 1701 वर्ष 2006 में इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष को समाप्त करने के उद्देश्य से अपनाया गया था। इसके तहत दक्षिणी लेबनान में लेबनानी सेना और संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की तैनाती सहित कई व्यवस्थाओं का प्रावधान किया गया था।
भारत की विदेश नीति में फिलिस्तीन का मुद्दा पुराना
डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, भारत लंबे समय से मध्य-पूर्व में शांति के लिए टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन करता रहा है। उनके मुताबिक भारत की नीति रही है कि फिलिस्तीनी लोगों को स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र का अधिकार मिलना चाहिए।
उनका मानना है कि दिल्ली घोषणापत्र में इस्तेमाल की गई भाषा कुछ मामलों में भारत के सामान्य द्विपक्षीय बयानों की तुलना में अधिक स्पष्ट और सख्त दिखाई देती है, लेकिन इसे भारत की विदेश नीति में बुनियादी बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
भारत की कूटनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा है कि उसने अलग-अलग देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रखे हैं। यही वजह है कि नई दिल्ली के इजरायल के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध होने के बावजूद फिलिस्तीन के मुद्दे पर उसका पारंपरिक रुख भी कायम है।
इजरायल और फिलिस्तीन दोनों से भारत के संबंध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाया है। एक ओर इजरायल के साथ रक्षा, सुरक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है। दूसरी ओर भारत फिलिस्तीन के विकास और मानवीय सहायता से जुड़े प्रयासों का भी समर्थन करता रहा है।
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास, दोनों के साथ भारत ने अलग-अलग स्तरों पर संवाद कायम रखा है। ऐसे में दिल्ली घोषणापत्र को भारत की संतुलित पश्चिम एशिया नीति के एक और उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।
अमेरिका के साथ बदलते समीकरण का भी असर
भारत की विदेश नीति को समझने के लिए अमेरिका और रूस के साथ उसके संबंधों को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत ने ऐतिहासिक रूप से गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई, हालांकि अलग-अलग दौर में वैश्विक परिस्थितियों के कारण उसके झुकाव को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आते रहे हैं।
21वीं सदी की शुरुआत के बाद भारत और अमेरिका के संबंधों में तेजी से सुधार हुआ। रक्षा, तकनीक, व्यापार और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्र में दोनों देशों की साझेदारी मजबूत हुई। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में टैरिफ, व्यापार और अन्य नीतिगत मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच कुछ मतभेद भी सामने आए।
इसके बावजूद भारत अपनी विदेश नीति में किसी एक शक्ति केंद्र पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न देशों और समूहों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है।
भारत का संदेश: शांति और दो-राष्ट्र समाधान
कुल मिलाकर, ब्रिक्स के दिल्ली घोषणापत्र में फिलिस्तीन को लेकर भारत का रुख स्पष्ट दिखाई देता है। भारत इजरायल के साथ अपने मजबूत रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए फिलिस्तीनी लोगों के स्वतंत्र राष्ट्र के अधिकार का समर्थन करता है।
गाजा में मानवीय सहायता, जबरन विस्थापन का विरोध, 1967 की सीमाओं पर आधारित संप्रभु फिलिस्तीनी राज्य और पूर्वी यरुशलम को उसकी राजधानी बनाए जाने का समर्थन—ये सभी बिंदु भारत की लंबे समय से चली आ रही टू-स्टेट सॉल्यूशन आधारित नीति को दर्शाते हैं।
ऐसे में दिल्ली घोषणापत्र को भारत की पश्चिम एशिया नीति में निरंतरता के तौर पर देखा जा सकता है। नई दिल्ली का संदेश यही है कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए सभी पक्षों के वैध अधिकारों का सम्मान और शांतिपूर्ण राजनीतिक समाधान जरूरी है।

