श्रीकृष्ण की लीलाओं के रंगों से सजा गीता शोध संस्थान, राष्ट्रीय चित्रांकन शिविर का समापन
रिपोर्ट- योगेश शर्मा
मथुरा। भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा में तीन दिनों तक कला, संस्कृति और आध्यात्मिक भावनाओं का अनूठा संगम देखने को मिला। गीता शोध संस्थान में आयोजित ‘श्री कृष्ण नेशनल आर्ट वर्कशॉप-2026’ का बुधवार को समापन हुआ। राष्ट्रीय चित्रांकन शिविर में देश के विभिन्न हिस्सों से आए 20 ख्यातिप्राप्त चित्रकारों ने अपनी-अपनी विशिष्ट कला शैलियों के माध्यम से श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं को कैनवास पर साकार किया।
इस दौरान चित्रकारों ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर राधा-कृष्ण के प्रेम, माखन चोरी, गौ-प्रेम, बांसुरी वादन, गिरिराज धारण और ब्रज की सांस्कृतिक परंपराओं को रंगों और रेखाओं के जरिए जीवंत रूप प्रदान किया। तीन दिनों तक गीता शोध संस्थान का वातावरण कला और कृष्ण भक्ति के रंगों से सराबोर रहा।
हेमा मालिनी ने चित्रकारों की कलाकृतियों को सराहा
राष्ट्रीय चित्रांकन शिविर के समापन समारोह में सांसद एवं अभिनेत्री हेमा मालिनी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। उन्होंने कार्यशाला में भाग लेने वाले प्रत्येक चित्रकार के पास पहुंचकर उनकी कलाकृतियों का बारीकी से अवलोकन किया। इस दौरान उन्होंने चित्रों के विषय, कला शैली और उनमें निहित भावों को समझा तथा कलाकारों से उनकी रचनाओं के बारे में जानकारी भी ली।
चित्रकारों ने हेमा मालिनी को अपने चित्रों के पीछे की कल्पना और श्रीकृष्ण की संबंधित लीला के बारे में विस्तार से बताया। कैनवास पर उकेरी गई कृष्ण लीलाओं की विविधता और भावपूर्ण प्रस्तुति ने उन्हें प्रभावित किया।
हेमा मालिनी ने कहा कि उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कलाकारों ने इतने कम समय में श्रीकृष्ण की लीलाओं को इतनी सुंदरता और संवेदनशीलता के साथ कैनवास पर उतारा। उन्होंने कहा कि ब्रजभूमि में भगवान श्रीकृष्ण की असंख्य लीलाएं हुई हैं और इन लीलाओं को चित्रकला के माध्यम से संरक्षित करने का प्रयास लगातार जारी रहना चाहिए।
उन्होंने उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के अधिकारियों से आग्रह किया कि भविष्य में राष्ट्रीय चित्रांकन शिविर की अवधि तीन दिन के बजाय पांच दिन की जाए। उनका कहना था कि किसी उत्कृष्ट और भावपूर्ण चित्र को तैयार करने के लिए कलाकारों को पर्याप्त समय मिलना आवश्यक है।
कलाकारों ने अलग-अलग शैलियों में उकेरी कृष्ण लीलाएं
कार्यशाला में शामिल कलाकारों ने श्रीकृष्ण के जीवन और ब्रज संस्कृति से जुड़े अलग-अलग प्रसंगों को अपनी विशिष्ट कला शैलियों में प्रस्तुत किया। मध्य प्रदेश की अलका मनीष पाठक ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता तथा आत्मीयता को भावपूर्ण तरीके से चित्रित किया।
वहीं, दिल्ली की सुमित्रा अहलावत ने माखन चोरी लीला के दौरान गोपियों के आनंद और नृत्य को अपने चित्र में सहजता से अभिव्यक्त किया। पटना की सोमा आनंद ने मनमोहन कृष्ण की छवि में भक्तिभाव और आध्यात्मिक रस को प्रमुखता दी।
पटना की ख्यातिप्राप्त चित्रकार अलका दास ने मिथिला शैली में राधा-कृष्ण की मनोहारी छवि प्रस्तुत की। पारंपरिक रंगों और आकृतियों के माध्यम से उनकी रचना में मिथिला कला की विशिष्ट पहचान दिखाई दी।
लखनऊ के विनोद कुमार ने ‘ब्रह्मांड नायक’ की संकल्पना के माध्यम से लोक से परलोक तक की प्रेम यात्रा को आधुनिक भावबोध में चित्रित किया। दूसरी ओर, नाथद्वारा राजस्थान की वंदना जोशी ने श्रीनाथजी की आकर्षक छवि और ताज बीबी द्वारा उन्हें पहनाए गए वस्त्राभूषण से जुड़े प्रसंग को अपनी रचना का आधार बनाया।
राधा-कृष्ण से लेकर बाल लीलाओं तक दिखा भावों का संसार
लखनऊ की नेहा ने किशनगढ़ शैली में राधा-कृष्ण को प्रकृति से जोड़ते हुए सुंदर चित्रांकन किया। गाजियाबाद की खुशबू शर्मा ने बालकृष्ण की माखन चोरी लीला को कैनवास पर उतारा।
उज्जैन के जयेश त्रिवेदी ने श्रीकृष्ण के गौ-प्रेम को अपनी कला के माध्यम से अभिव्यक्त किया। वहीं पटना की विनीता सिंह ने ध्यानमग्न श्रीकृष्ण की शांत और आध्यात्मिक छवि को चित्र में स्थान दिया।
ललित कला अकादमी, आगरा से जुड़े डॉ. मनोज कुमार सिंह ने बंसी बजाते श्रीकृष्ण की मनोहारी लीला का चित्रण किया। मेरठ के डॉ. प्रिंस राज ने अपने विशिष्ट रंग संयोजन के जरिए बांसुरी बजाते श्रीकृष्ण की प्रभावशाली छवि प्रस्तुत की।
मोहाली, चंडीगढ़ की मनजीत कौर ने श्रीकृष्ण और श्रीनाथजी की छवियों को एक संयुक्त रचना में प्रस्तुत किया। इस चित्र में दोनों स्वरूपों के आध्यात्मिक भाव को उभारने का प्रयास किया गया।
जयपुर के विनीत शर्मा ने माखन खाते बालकृष्ण के चंचल और वात्सल्यपूर्ण स्वरूप को कैनवास पर उतारा। वहीं दिल्ली की नीतिक्षा डाबर ने गाय के थन से दूध पीते बालकृष्ण के वात्सल्यपूर्ण स्वरूप को चित्रित किया।
मधुबनी शैली में उभरा कृष्ण जन्म का प्रसंग
पद्मश्री चित्रकार श्रीमती शांति देवी ने अपनी विशिष्ट मधुबनी शैली में श्रीकृष्ण जन्म से जुड़े प्रसंग को चित्रित किया। उन्होंने जन्म के बाद वासुदेव द्वारा बालकृष्ण को सिर पर रखकर यमुना पार ले जाने के प्रसंग को प्रभावशाली ढंग से कैनवास पर प्रस्तुत किया।
उनकी रचना में मधुबनी चित्रकला की पारंपरिक रेखाओं और रंगों के साथ प्रसंग के भाव पक्ष को विशेष महत्व दिया गया। इससे धार्मिक प्रसंग और लोक कला शैली का सुंदर समन्वय देखने को मिला।
ग्रेटर नोएडा की श्रीमती कंचन प्रकाश ने बज्जिका शैली में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गिरिराज पर्वत धारण करने की लीला को आकर्षक रूप दिया। उज्जैन की श्रीमती सुमन डोंगरे ने राधा-कृष्ण और सखियों के प्रेम, माधुर्य एवं रासभाव को अपनी विशिष्ट शैली में चित्रित किया।
इंदौर की श्रीमती अलका झा ने बांसुरी बजाते श्रीकृष्ण और राधा की प्रेममयी छवि को कैनवास पर उकेरा। वहीं अलीगढ़ के मंगलायतन विश्वविद्यालय में फाइन आर्ट की फैकल्टी प्रोफेसर पूनम रानी ने बालकृष्ण की वैणी गूथन लीला को अपने चित्र का विषय बनाया।
चित्रकार महेंद्र सिंह ने आधुनिक शैली के माध्यम से ब्रज की संगीत परंपरा और श्रीकृष्ण से जुड़े संगीत भाव को कैनवास पर अभिव्यक्त किया। इस प्रकार कार्यशाला में पारंपरिक लोक कलाओं से लेकर आधुनिक चित्रकला तक कई शैलियों का सुंदर समागम देखने को मिला।
कलाकारों और आयोजन टीम का जताया आभार
समापन समारोह में उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद की सीईओ लक्ष्मी नागप्पन ने सांसद हेमा मालिनी सहित कार्यशाला में प्रतिभाग करने वाले सभी चित्रकारों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों से ब्रज की कला, संस्कृति और श्रीकृष्ण से जुड़ी परंपराओं को व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।
पटना की चित्रकार अलका दास ने परिषद की ओर से आयोजित कार्यशाला की सराहना की। उन्होंने गीता शोध संस्थान में कलाकारों के लिए की गई व्यवस्थाओं की भी प्रशंसा की। पद्मश्री शांति देवी ने मधुबनी चित्रकला शैली की विशेषताओं पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का संचालन गीता शोध संस्थान के कोऑर्डिनेटर चंद्र प्रताप सिंह सीकरवार ने किया। महेश चंद्र शर्मा ने वैदिक मंत्रोच्चार एवं शंखवादन कराया। वहीं कार्यक्रम के अंत में डॉ. उमेश चंद्र शर्मा ने सभी अतिथियों, कलाकारों और आयोजन से जुड़े लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया।

