सहारनपुर कलक्ट्रेट मस्जिद के मलबे में मिला कुआं, पुराना होने के संकेत, ASI से जांच की तैयारी
Digital UP News Desk
सहारनपुर: कलक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को हटाने के बाद मलबा साफ करने के दौरान एक पुराने कुएं के मिलने से प्रशासन के सामने अब नया सवाल खड़ा हो गया है। आखिर यह कुआं कितना पुराना है और इसका इस्तेमाल किस दौर में तथा किस उद्देश्य से किया जाता था? फिलहाल इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा। प्रशासन ने कुएं के इतिहास और निर्माण शैली की जानकारी जुटाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से संपर्क किया है। इसके साथ ही राजस्व अभिलेखों को भी खंगालने की तैयारी की जा रही है।
मलबा हटाने के दौरान सामने आया कुआं
सहारनपुर कलक्ट्रेट परिसर में शनिवार को मस्जिद हटाने की कार्रवाई शुरू हुई थी। प्रशासन की टीम ने मलबा हटाने का काम भी शुरू कर दिया। रविवार तड़के मलबे की सफाई के दौरान टीम को एक कंक्रीट का स्लैब दिखाई दिया। शुरुआत में बुलडोजर की मदद से स्लैब हटाने का प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली।
इसके बाद पोकलैंड मशीन की मदद से स्लैब को हटाया गया। स्लैब हटते ही उसके नीचे एक कुआं दिखाई दिया। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार कुएं का व्यास करीब डेढ़ मीटर यानी लगभग पांच फीट है, जबकि इसकी दिखाई दे रही गहराई करीब 20 से 22 फीट बताई गई है। कुएं के अंदर भी मलबा भरा हुआ है। ऐसे में इसकी वास्तविक गहराई इससे अधिक होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
लखौरी ईंटों से बने होने का अनुमान
कुएं की बनावट को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। मौके पर मौजूद टीम को कुएं में पुरानी शैली की ईंटें दिखाई दी हैं। प्रारंभिक तौर पर इन्हें लखौरी ईंटें माना जा रहा है। हालांकि, कुएं की वास्तविक उम्र और निर्माण काल की पुष्टि विशेषज्ञों की जांच के बाद ही हो सकेगी।
इतिहासकार और लेखक डॉ. राजीव उपाध्याय यायावर के अनुसार मुगलकाल के दौरान, खासकर 17वीं और 18वीं शताब्दी में उत्तर भारत के निर्माण कार्यों में लखौरी ईंटों का व्यापक इस्तेमाल होता था। इन ईंटों को जोड़ने के लिए गारे या चूने का प्रयोग किया जाता था। उन्होंने बताया कि इस तरह की ईंटों का इस्तेमाल लगभग 1850 तक निर्माण कार्यों में होता रहा।
सहारनपुर जिले में भी कुछ पुराने ऐतिहासिक निर्माणों में लखौरी ईंटों के इस्तेमाल के उदाहरण मिलते हैं। इनमें सर्किट हाउस के सामने स्थित मकबरा और लखनौती का किला शामिल बताए जाते हैं। हालांकि, केवल ईंटों की बनावट के आधार पर इस कुएं की निश्चित उम्र बताना संभव नहीं है।
राजस्व रिकॉर्ड से भी खुलेगा इतिहास
कुएं के इतिहास का पता लगाने के लिए प्रशासन अब पुराने राजस्व अभिलेखों की भी मदद ले सकता है। राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में जमीन और उसके उपयोग से संबंधित कई महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज होती रही हैं।
पुराने खसरे में लेखपालों द्वारा समय-समय पर मौके पर जाकर फसलों और जमीन की स्थिति का निरीक्षण किया जाता था। खरीफ, रबी और जायद की फसलों से संबंधित विवरण के साथ जमीन पर मौजूद अन्य संरचनाओं की जानकारी भी कई मामलों में अभिलेखों में दर्ज होती थी।
ऐसे में यदि पुराने खसरा-खतौनी रिकॉर्ड अथवा अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों में कलक्ट्रेट परिसर में कुएं का उल्लेख मिलता है, तो उसके इतिहास को समझने में मदद मिल सकती है। प्रशासन के लिए यह रिकॉर्ड इसलिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि इससे यह पता लगाने में सहायता मिलेगी कि पुराने समय में इस स्थान का इस्तेमाल किस प्रकार होता था।
ASI की जांच से सामने आ सकती है वास्तविक स्थिति
कुएं की खोज के बाद प्रशासन ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से संपर्क किया है। माना जा रहा है कि विशेषज्ञों की टीम मौके पर पहुंचकर कुएं की संरचना, निर्माण सामग्री और तकनीक का अध्ययन कर सकती है।
विशेषज्ञ यदि कुएं में इस्तेमाल हुई ईंटों, गारे या अन्य निर्माण सामग्री का परीक्षण करते हैं, तो इसके निर्माण काल के बारे में महत्वपूर्ण संकेत मिल सकते हैं। इसके अलावा आसपास के पुराने अभिलेखों और ऐतिहासिक निर्माणों से तुलना करके भी इसकी पृष्ठभूमि समझने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, अभी तक प्रशासन की ओर से कुएं को किसी विशेष काल या ऐतिहासिक घटना से जोड़कर कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। इसलिए जांच पूरी होने तक इससे जुड़े किसी भी दावे को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।
कुएं को लेकर अलग-अलग दावे
कुआं मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक और मुख्य शिकायतकर्ता विकास त्यागी ने इसे देवस्थान से जुड़ा होने का दावा किया है। उनका कहना है कि भारतीय परंपरा में कुओं का धार्मिक महत्व रहा है और जहां कुआं होता है, वहां पुराने समय में पूजित स्थान होने की संभावना हो सकती है।
उन्होंने प्रशासन से कुएं का सर्वे कराने और इसकी वास्तविक उम्र का पता लगाने की मांग की है। साथ ही उन्होंने यह संभावना भी जताई कि किसी पुराने पूजित स्थान को हटाकर बाद में वहां दूसरा निर्माण किया गया हो सकता है।
हालांकि, यह दावा फिलहाल जांच के दायरे में है। किसी भी ऐतिहासिक या धार्मिक निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पुरातात्विक और राजस्व अभिलेखों के साथ अन्य उपलब्ध प्रमाणों की भी जांच जरूरी होगी।
मस्जिद ध्वस्तीकरण के दौरान रही कड़ी सुरक्षा
कलक्ट्रेट परिसर स्थित दो मंजिला मस्जिद को जिला प्रशासन ने शनिवार को हटाने की कार्रवाई की थी। करीब पांच घंटे तक चली कार्रवाई में सात बुलडोजर और 12 डंपर लगाए गए। प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए कलक्ट्रेट परिसर के सभी पांच द्वारों पर पुलिस बल तैनात किया था।
तनाव की आशंका को देखते हुए आसपास के जिलों से भी अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया था। प्रशासन ने शुक्रवार रात से ही कलक्ट्रेट परिसर की घेराबंदी कर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी थी।
शनिवार सुबह करीब पांच बजे डंपर और जेसीबी मशीनें परिसर में पहुंचनी शुरू हुईं। इसके करीब ढाई घंटे बाद सुबह साढ़े सात बजे ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू हुई। दोपहर करीब 12 बजे तक लगभग 315 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में बनी मस्जिद को हटा दिया गया और मलबे को भी बाहर ले जाया गया।
कार्रवाई के दौरान मौके पर पहुंचे एमएलसी शाहनवाज खान, मस्जिद प्रबंधन पक्ष के लोगों और अन्य नेताओं को प्रशासन की ओर से कार्रवाई के संबंध में जानकारी दी गई।
परिसर में दूसरे दिन भी सुरक्षा के इंतजाम
कुआं मिलने के बाद रविवार को भी कलक्ट्रेट परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रही। बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगाई गई। परिसर के पांचों गेट बंद रखे गए और पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई। केवल मुख्य गेट से ही नियंत्रित आवाजाही की अनुमति रही।
अब प्रशासन के सामने प्राथमिकता कुएं की वास्तविक उम्र, निर्माण शैली और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का पता लगाना है। इसके लिए पुरातत्व विशेषज्ञों की राय के साथ-साथ पुराने राजस्व रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
फिलहाल कुएं की खोज ने कलक्ट्रेट परिसर के इतिहास को लेकर नई जिज्ञासा पैदा कर दी है। हालांकि, कुएं का निर्माण कब हुआ, इसे किस उद्देश्य से बनाया गया और बाद में इसका क्या उपयोग हुआ—इन सभी सवालों का जवाब विशेषज्ञों के सर्वे और दस्तावेजी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

