बाघ बहुल क्षेत्रों में संरक्षण और इकोटूरिज्म पर जोर, भूपेंद्र यादव बोले- मानव-प्रकृति सहअस्तित्व जरूरी

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Digital UP News Desk

नई दिल्ली: केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने बुधवार को नई दिल्ली में बाघ बहुल क्षेत्रों में संरक्षण, जैव अर्थव्यवस्था, इकोटूरिज्म और स्थानीय आजीविका को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रकृति संरक्षण की मजबूत नींव तभी तैयार हो सकती है, जब मानव और प्रकृति के बीच संतुलित सह-अस्तित्व स्थापित हो।

भूपेंद्र यादव ने नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया। इस कार्यशाला का विषय ‘बाघ बहुल क्षेत्र: संरक्षण, जैव अर्थव्यवस्था और आजीविका एवं आय सृजन के लिए इकोटूरिज्म’ है। कार्यशाला का आयोजन 2 और 3 सितंबर 2026 को अंतर्राष्ट्रीय बिग कैट एलायंस (IBCA), एशियाई विकास बैंक (ADB) और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की ओर से संयुक्त रूप से किया जा रहा है।

बाघ संरक्षण के साथ स्थानीय विकास पर जोर

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने भारत में बाघ संरक्षण की यात्रा और प्रोजेक्ट टाइगर की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि बाघों का संरक्षण केवल किसी एक प्रजाति की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य से है।

दरअसल, बाघों का प्राकृतिक आवास जंगलों, घास के मैदानों, नदियों, शिकार प्रजातियों और वन्यजीव गलियारों से जुड़ा होता है। इसके साथ ही स्थानीय समुदाय भी इन क्षेत्रों के संरक्षण और प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए बाघ संरक्षण की रणनीति बनाते समय पर्यावरणीय सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय लोगों की सामाजिक और आर्थिक जरूरतों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

मंत्री ने कहा कि बाघ बहुल क्षेत्र देश और दुनिया के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक पूंजी हैं। ये क्षेत्र जल सुरक्षा, कार्बन पृथक्करण, जलवायु विनियमन, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय आजीविका जैसी अनेक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करते हैं।

प्रजाति-केंद्रित संरक्षण से आगे बढ़ने की जरूरत

भूपेंद्र यादव ने कहा कि वर्तमान समय में केवल किसी एक प्रजाति के संरक्षण पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। इसके बजाय एकीकृत परिदृश्य प्रबंधन की जरूरत है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ा जाए।

उन्होंने प्रकृति-आधारित समाधानों, नए वित्तपोषण तंत्र और समुदाय आधारित इकोटूरिज्म को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, यदि स्थानीय समुदायों को संरक्षण से आर्थिक अवसर मिलते हैं तो वे प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा में अधिक प्रभावी भागीदार बन सकते हैं।

इस दिशा में इकोटूरिज्म एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। हालांकि, इसके लिए पर्यटन गतिविधियों को पर्यावरण की वहन क्षमता और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करना आवश्यक होगा। इससे एक ओर पर्यटकों को प्रकृति और वन्यजीवों को समझने का अवसर मिलेगा, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आय के नए रास्ते भी खुल सकते हैं।

‘मानव-प्रकृति सह-अस्तित्व’ को बताया जरूरी

केंद्रीय मंत्री ने अपने संबोधन में कहा, “पारिस्थितिक संरक्षण की नींव सद्भावपूर्ण संरक्षण और मानव-प्रकृति सह-अस्तित्व पर आधारित होनी चाहिए।”

उन्होंने भूमि संरक्षण को खाद्य सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि स्वस्थ भूमि और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण मानव जीवन के लिए आवश्यक है। दुनिया आज मरुस्थलीकरण, मिट्टी की नमी में कमी और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।

ऐसे में बाघों के प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखना केवल वन्यजीव संरक्षण का विषय नहीं है, बल्कि यह जल, भूमि, जैव विविधता और मानव आजीविका से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव का उपयोग करते हुए सतत सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा में काम किया जाना चाहिए।

पारंपरिक ज्ञान को नीति से जोड़ने की अपील

भूपेंद्र यादव ने कार्यशाला में शामिल विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों से पारंपरिक ज्ञान को व्यवस्थित रूप से संहिताबद्ध करने की दिशा में विचार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों के पास प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने का लंबे समय से अनुभव रहा है।

उनके मुताबिक, इस ज्ञान को संरक्षण, जैव अर्थव्यवस्था और पर्यावरण-पर्यटन से जुड़ी नीतियों में उचित स्थान दिया जा सकता है। इससे नीतियां स्थानीय परिस्थितियों के अधिक अनुकूल बन सकती हैं।

उन्होंने कहा कि कार्यशाला का उद्देश्य केवल विचारों का आदान-प्रदान करना नहीं होना चाहिए, बल्कि ज्ञान साझा करने, क्षमता निर्माण और नीति निर्माण की प्रक्रिया में सकारात्मक बदलाव लाने पर भी ध्यान देना चाहिए।

IBCA को वैश्विक सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका

केंद्रीय मंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय बिग कैट एलायंस (IBCA) की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण के तहत IBCA के बढ़ते महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि यह बाघों समेत बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण के लिए देशों और संस्थानों के बीच सहयोग का वैश्विक मंच तैयार कर रहा है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि IBCA विकासशील देशों के स्थानीय ज्ञान को एक साथ लाने और उसे संरक्षण नीतियों में शामिल करने में अग्रणी भूमिका निभाएगा।

इसके अलावा, कार्यशाला के दौरान IBCA और एशियाई विकास बैंक के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर भी किए गए। यह समझौता भूदृश्य संरक्षण, सतत विकास, क्षमता निर्माण, ज्ञान के आदान-प्रदान और प्रकृति-अनुकूल वित्तपोषण पहलों में सहयोग को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

ADB-भारत साझेदारी के 40 साल पूरे होने का उल्लेख

एशियाई विकास बैंक की भारत के लिए कंट्री डायरेक्टर मिया ओका ने IBCA और ADB के बीच साझेदारी का स्वागत किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2026 में एडीबी और भारत के बीच साझेदारी के 40 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

मिया ओका ने कहा कि भारत के पास पर्यावरण संरक्षण और सतत सामाजिक-आर्थिक विकास के क्षेत्र में व्यापक अनुभव है। इस अनुभव को बाघों की मौजूदगी वाले अन्य देशों के साथ साझा किया जा सकता है।

उन्होंने बाघ बहुल देशों को एक मंच पर लाने, भारत के संरक्षण अनुभवों को साझा करने और पर्यावरण संरक्षण के लिए सतत वित्तपोषण के अवसर विकसित करने में ADB की भूमिका पर भी जोर दिया।

कई देशों के विशेषज्ञ कार्यशाला में शामिल

इस अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला में बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, मलेशिया, नेपाल और वियतनाम के सरकारी प्रतिनिधि और विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं। इसके अलावा भारत के विभिन्न राज्यों के वन विभागों, बाघ अभ्यारण्यों, शोध संस्थानों और संरक्षण क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ भी इसमें शामिल हुए हैं।

कार्यशाला में विकास भागीदारों, शोधकर्ताओं, संरक्षण विशेषज्ञों और अन्य प्रमुख हितधारकों की भागीदारी भी है। इसका उद्देश्य बाघ बहुल क्षेत्रों के संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका और आय के अवसरों को बढ़ाने के नए तरीकों पर चर्चा करना है।

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