घुमंतू समाज को सम्मान, शिक्षा और स्वावलंबन से जोड़ना समय की पुकार : दुर्गादास जी
रिपोर्ट – योगेश भारद्वाज
वृंदावन: आरोग्य पीठ, वृंदावन केंद्र में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं अखिल भारतीय घुमंतू कार्य प्रमुख माननीय श्री दुर्गादास जी के सान्निध्य में “घुमंतू जनजातियों का उत्थान—आज की आवश्यकता” विषय पर विशेष संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें मथुरा-वृंदावन के धर्माचार्यों, कथाव्यासों और प्रबुद्धजनों ने भाग लेकर घुमंतू समाज की स्थिति, उनकी समस्याओं और सामाजिक उत्थान के उपायों पर विचार-विमर्श किया।
संगोष्ठी का आयोजन आरोग्य पीठ, भक्तिवाटिका कॉलोनी, आरोग्य पीठ मार्ग, तेहरा मोड़, ग्राम धौरहरा, वृंदावन में हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत आरोग्य पीठ के संस्थापक आचार्य डॉ. राम गोपाल दीक्षित द्वारा संतों, धर्माचार्यों, कथाव्यासों और अतिथियों के स्वागत एवं अभिनंदन से हुई। उन्होंने सभी अतिथियों को अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया और संगोष्ठी की भूमिका प्रस्तुत की।
समाज के स्वास्थ्य और समरसता पर भी आरोग्य पीठ का जोर
आचार्य डॉ. राम गोपाल दीक्षित ने कहा कि आरोग्य पीठ केवल व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के स्वास्थ्य, संतुलन और समरसता को भी महत्वपूर्ण मानता है। उन्होंने कहा कि दुर्गादास जी के वृंदावन प्रवास के अवसर पर धर्माचार्यों, कथाव्यासों और प्रबुद्धजनों को एक मंच पर लाकर घुमंतू समाज की परिस्थितियों तथा उनके उत्थान में समाज की भूमिका पर चर्चा करने का विचार सामने आया। इसी उद्देश्य से यह संगोष्ठी आयोजित की गई।
उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की प्रगति तभी संभव है, जब उसके प्रत्येक वर्ग को सम्मान, अवसर और विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। इसी दृष्टि से घुमंतू समुदायों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पहचान और स्वावलंबन जैसे विषयों पर गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता है।
घुमंतू समाज का इतिहास राष्ट्रसेवा से जुड़ा : दुर्गादास जी
मुख्य वक्ता दुर्गादास जी ने घुमंतू जनजातियों के इतिहास और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत का घुमंतू समाज केवल सहायता का पात्र नहीं है, बल्कि उसने देश की संस्कृति, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने बंजारा समाज का उदाहरण देते हुए कहा कि एक समय देश की परिवहन और व्यापार व्यवस्था में बंजारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे विभिन्न क्षेत्रों के बीच सामान पहुंचाने का कार्य करते थे, जिससे आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती थी। इसी प्रकार गाड़िया लोहार समाज ने महाराणा प्रताप के संघर्ष के दौर में अस्त्र-शस्त्र तैयार करने में योगदान दिया।
उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप के संघर्ष के दौरान गाड़िया लोहार समाज ने चित्तौड़ की पुनर्प्राप्ति तक स्थायी रूप से घर में न बसने का संकल्प लिया था। हालांकि, समय के साथ राष्ट्र और स्वाभिमान के लिए अपना घर छोड़ने वाला यह समाज स्वयं अनेक कठिनाइयों से घिर गया।
दुर्गादास जी ने कहा कि देश में घुमंतू एवं उनसे जुड़े समुदायों की संख्या लगभग 15 करोड़ मानी जाती है। इनमें बड़ी संख्या अब स्थायी रूप से बस चुकी है, जबकि कई परिवार आज भी आजीविका के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप अनेक परिवारों के सामने स्थायी आवास, पहचान और सरकारी दस्तावेजों की समस्या बनी हुई है।
पारंपरिक रोजगार प्रभावित होने से बढ़ीं चुनौतियां
संगोष्ठी में घुमंतू समुदायों की पारंपरिक आजीविका में आए बदलावों पर भी चर्चा हुई। दुर्गादास जी ने कहा कि औपनिवेशिक काल में अनेक घुमंतू समुदायों पर लगाए गए प्रतिबंधों से उनकी पारंपरिक आजीविका और सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हुई।
स्वतंत्रता के बाद कानूनी परिस्थितियों में बदलाव आया, लेकिन इसके बावजूद कई समुदाय अपनी पुरानी आर्थिक व्यवस्था को पूरी तरह पुनर्स्थापित नहीं कर सके। सपेरे, मदारी, पारंपरिक कलाकार, पशुपालक, लोहार और अन्य भ्रमणशील समुदायों के सामने रोजगार के नए अवसरों की कमी रही।
ऐसे में शिक्षा, कौशल विकास और सम्मानजनक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है। इसके साथ ही सामाजिक स्तर पर उनके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की जरूरत है।
संत समाज से घुमंतू समुदायों के लिए जागरूकता बढ़ाने का आह्वान
दुर्गादास जी ने संत समाज और कथाव्यासों से अपील की कि वे अपने कथा-प्रवचनों तथा सामाजिक कार्यक्रमों में घुमंतू समाज के इतिहास और वर्तमान परिस्थितियों को भी स्थान दें। उन्होंने कहा कि संतों और कथाव्यासों की वाणी बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचती है। इसलिए उनके माध्यम से समाज में घुमंतू समुदायों के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना मजबूत की जा सकती है।
इस दौरान उपस्थित धर्माचार्यों एवं कथाव्यासों ने भी घुमंतू समाज को भारतीय संस्कृति और लोकपरंपराओं का अभिन्न हिस्सा बताया। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, पहचान और स्वावलंबन के लिए सामूहिक प्रयास करने पर जोर दिया।
शिक्षा और दस्तावेजों की उपलब्धता पर विशेष जोर
संगोष्ठी में घुमंतू परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने और उनके आवश्यक दस्तावेज बनवाने को महत्वपूर्ण विषय माना गया। कई परिवारों के पास आधार कार्ड, राशन कार्ड, जाति प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की उपलब्धता की समस्या बताई गई।
इस कारण उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए बैठक में घुमंतू बस्तियों से संपर्क बढ़ाने, बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने, दस्तावेज बनवाने में सहयोग करने तथा कौशल विकास के माध्यम से रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।
संतों और प्रबुद्धजनों ने लिया सामूहिक प्रयास का संकल्प
कार्यक्रम में महंत स्वामी प्रह्लाद दास जी, आचार्य बद्रीश जी महाराज, स्वामी पवन दास जी महाराज, महामंडलेश्वर भक्तानंद जी महाराज, स्वामी ध्यानानंद सरस्वती जी, मोहिनी बिहारी शरण जी, गोविंदानंद महाराज जी, स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज, स्वामी रामशरण दास जी और पूज्य गिरिराज किशोर जी सहित अनेक संतों ने अपने विचार रखे।
प्रसिद्ध कथावाचक ज्ञानेश गौड़ जी ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए कहा कि कथाव्यासों और संतों को घुमंतू समाज के गौरव, समस्याओं और उत्थान के विषय को अपनी कथाओं में प्रमुखता देनी चाहिए।
वहीं, पूज्य सर्वेश्वर शरण दास जी, पूज्य रोहितानंद महाराज जी और स्वामी रामशरण दास जी ने भजनों की प्रस्तुति दी। डॉ. प्रमोद गौतम जी ने भी घुमंतू समुदायों की सामाजिक परिस्थितियों और उनके लिए संगठित प्रयासों की आवश्यकता पर विचार रखे।
कार्यक्रम में श्री दिनेश लवानिया, श्री कन्हैयालाल अग्रवाल, श्री गोपुलेश गौतम, श्री विमल प्रताप, श्री कपिल पंडित, श्री नितिन चौधरी, श्री राजेंद्र वर्मा, श्री बृज बिहारी जोशी, श्री संदीप शर्मा सहित अनेक सामाजिक एवं धार्मिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे। दिल्ली से श्री राजबीर सिंह, श्री स्नेहकांत चौधरी और श्री लक्ष्मण जी ने भी सहभागिता की।
अंततः सभी उपस्थित संतों और प्रबुद्धजनों ने घुमंतू समाज को सम्मान, शिक्षा, पहचान और स्वावलंबन से जोड़ने तथा उसे राष्ट्र की मुख्यधारा में सशक्त भागीदारी दिलाने के लिए संगठित प्रयास करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन आचार्य डॉ. राम गोपाल दीक्षित द्वारा सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करने और सामूहिक कल्याण मंत्र के साथ हुआ।

