सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में दवा की अवधि घटने से मरीज हो रहे परेशान – इस तरह से लगी हुई हैं लंबी कतारें
रिपोर्ट – रोहित सिंह चौहान
सैफई: उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में दवा वितरण की अवधि कम किए जाने से लंबे समय से उपचार करा रहे मरीजों की परेशानी बढ़ गई है। मरीजों के अनुसार, पहले उन्हें 15 दिन की दवा एक साथ उपलब्ध कराई जाती थी, लेकिन अब केवल सात दिन की दवा दी जा रही है। इसके कारण गंभीर और पुराने मरीजों को बार-बार अस्पताल पहुंचकर दवा लेने की प्रक्रिया दोहरानी पड़ रही है।
विश्वविद्यालय की ओपीडी और 500 बेड के सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की ओपीडी में दवा काउंटरों पर मरीजों की लंबी कतारें देखी गईं। इनमें कई ऐसे मरीज भी शामिल थे, जिनका लंबे समय से उपचार चल रहा है और उनकी दवाओं में तत्काल किसी बदलाव की जरूरत नहीं बताई जा रही है। मरीजों का कहना है कि बीमारी और दवा में बदलाव नहीं होने के बावजूद दवा की अवधि कम किए जाने से उन्हें हर सात दिन बाद सैफई आना पड़ रहा है।
पहले 15 दिन की मिलती थी दवा
मरीजों के मुताबिक, पहले लंबे समय से उपचार करा रहे मरीजों को 15 दिन की दवा एक साथ मिल जाती थी। इससे उन्हें बार-बार अस्पताल आने की जरूरत नहीं पड़ती थी। हालांकि, अब सात दिन की दवा मिलने के कारण उन्हें कम अंतराल पर अस्पताल पहुंचना पड़ रहा है।
जमीन पर बैठे वृद्ध मरीज रमेश सिंह ने बताया कि उपचार की शुरुआत में उन्हें एक महीने की दवा मिलती थी। इसके बाद दवा देने की अवधि 15 दिन कर दी गई और अब सात दिन की दवा दी जा रही है। उनका कहना है कि कम अवधि की दवा मिलने के कारण उन्हें जल्दी-जल्दी सैफई आना पड़ रहा है, जिससे परेशानी बढ़ गई है।
वहीं, विनोद कुमार ने बताया कि 15 दिन की दवा मिलने की व्यवस्था मरीजों के लिए सुविधाजनक थी। अब सात दिन की दवा मिलने के बाद पर्चा बनवाने, चिकित्सक को दिखाने और फिर दवा लेने की प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है। उनके अनुसार, दवा में कोई बदलाव नहीं होता, लेकिन निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद फिर अस्पताल आना पड़ता है।
गंभीर मरीजों के लिए बढ़ी परेशानी
न्यूरो सर्जरी विभाग में उपचार करा रहे सुखदेव सिंह ने बताया कि चिकित्सक ने सात दिन की दवा लिखी है, जबकि उनका उपचार एक महीने से अधिक समय तक चलना है। ऐसे में सात दिन बाद फिर दवा लेने के लिए सैफई आना पड़ेगा।
इसी तरह मैनपुरी निवासी पाल सिंह पाल ने भी दवा की अवधि कम होने से होने वाली परेशानी का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उनकी दवा लंबे समय से चल रही है और पहले 15 दिन की दवा मिल जाती थी। अब सात दिन की दवा मिलने के कारण अस्पताल आने-जाने की आवृत्ति बढ़ गई है।
मरीजों का कहना है कि गंभीर या लंबे समय से इलाज करा रहे मरीजों के लिए दवा की अवधि उनकी जरूरत के अनुसार तय की जानी चाहिए। यदि किसी मरीज की दवा में तत्काल बदलाव की आवश्यकता नहीं है, तो उसे कम अवधि की दवा के लिए बार-बार अस्पताल बुलाने से अनावश्यक परेशानी बढ़ती है।
दूसरे जिलों से आने वाले मरीजों पर अधिक असर
सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में उपचार के लिए मैनपुरी सहित आसपास के कई जिलों से मरीज पहुंचते हैं। ऐसे मरीजों के लिए सात दिन की दवा की व्यवस्था अधिक चुनौतीपूर्ण बताई जा रही है। मरीज के साथ अक्सर एक तीमारदार भी अस्पताल आता है, जिसके कारण आने-जाने में पूरा दिन लग जाता है।
इसके अलावा, यात्रा का किराया, भोजन और अन्य खर्च भी मरीज के परिवार को उठाना पड़ता है। ऐसे में दवा की अवधि कम होने से बार-बार अस्पताल आने का आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।
मरीजों का कहना है कि लंबे समय से चल रहे उपचार में यदि चिकित्सकीय स्थिति स्थिर है, तो दवा की उपलब्धता कुछ अधिक अवधि के लिए की जानी चाहिए। इससे अस्पताल में अनावश्यक भीड़ को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
नए मरीजों को डायरी नहीं मिलने की शिकायत
मरीजों ने दवा की अवधि के अलावा नए मरीजों को डायरी उपलब्ध नहीं कराए जाने की बात भी कही है। उनके अनुसार, पहले नए मरीजों को डायरी दी जाती थी, जिसमें दवा और चिकित्सकीय निर्देशों से संबंधित जानकारी दर्ज रहती थी।
मरीजों का कहना है कि लंबे समय तक चलने वाले उपचार में यह डायरी उपयोगी होती थी। अगली बार अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सक पुराने उपचार और दवा से संबंधित जानकारी देख सकते थे। हालांकि, मरीजों के अनुसार करीब एक सप्ताह से नए मरीजों को डायरी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है।
इस व्यवस्था को लेकर भी मरीजों में असुविधा की स्थिति बनी हुई है। उनका कहना है कि यदि पुरानी व्यवस्था बहाल हो जाए तो लंबे समय से उपचार करा रहे मरीजों को सुविधा मिल सकती है।
ओपीडी पर भी बढ़ रहा दबाव
दवा की अवधि सात दिन किए जाने का असर केवल दवा काउंटर तक सीमित नहीं रहने की बात मरीजों ने कही है। उनके अनुसार, जो मरीज पहले 15 दिन के अंतराल पर अस्पताल आते थे, अब उन्हें सात दिन में वापस आना पड़ रहा है। इससे ओपीडी और विशेषज्ञ चिकित्सकों के कक्षों पर मरीजों की संख्या बढ़ सकती है।
वहीं, मरीजों की संख्या बढ़ने पर नए मरीजों की जांच, बीमारी का निदान और उपचार निर्धारित करने के लिए चिकित्सकों को मिलने वाला समय भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे में दवा वितरण व्यवस्था का असर अस्पताल की ओपीडी व्यवस्था पर भी पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
पुरानी व्यवस्था बहाल करने की मांग
मरीजों ने विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति से दवा वितरण की पुरानी व्यवस्था बहाल करने की मांग की है। उनका कहना है कि लंबे समय से उपचार करा रहे मरीजों को उनकी चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार पर्याप्त अवधि की दवा उपलब्ध कराई जाए।
मरीजों के अनुसार, इससे उन्हें बार-बार अस्पताल आने से राहत मिलेगी और साथ ही दवा काउंटरों तथा ओपीडी पर भी दबाव कम किया जा सकेगा।
फिलहाल मरीजों की मांग है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस व्यवस्था की समीक्षा करे और गंभीर तथा पुराने मरीजों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए दवा वितरण की अवधि को लेकर उचित निर्णय लिया जाए। साथ ही, नए मरीजों के लिए डायरी उपलब्ध कराने की व्यवस्था को लेकर भी स्पष्टता की मांग की जा रही है।
कुल मिलाकर, सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में दवा वितरण की अवधि सात दिन किए जाने से लंबे समय से उपचार करा रहे मरीजों को बार-बार अस्पताल आने की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मरीजों का कहना है कि 15 दिन की पुरानी व्यवस्था उनके लिए अधिक सुविधाजनक थी। अब देखना होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन मरीजों की मांग और ओपीडी पर पड़ रहे संभावित दबाव को ध्यान में रखते हुए इस व्यवस्था में कोई बदलाव करता है या नहीं।

