मलाला की किताब पढ़ने पर विवाद: अहमदाबाद घटना के बीच मौलाना खालिद रशीद ने कहा- किताब पढ़ना अपराध नहीं है

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Digital UP News  Desk

लखनऊ: नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई की आत्मकथा आई एम मलाला को लेकर गुजरात के अहमदाबाद में शुरू हुआ विवाद अब चर्चा का विषय बन गया है। अहमदाबाद के वस्त्रपुर इलाके स्थित औडा गार्डन में आयोजित एक पुस्तक पठन कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद (VHP) से जुड़े कार्यकर्ताओं के पहुंचने के बाद हंगामा हुआ। इस दौरान कार्यक्रम में मौजूद कुछ लोगों के साथ मारपीट किए जाने की बात सामने आई है। पुलिस ने मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है।

विवाद के बीच लखनऊ के ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने मलाला की किताब पढ़ने को लेकर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि भारत में प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद की किताब पढ़ने की स्वतंत्रता है। उनके मुताबिक, किसी किताब को पढ़ना तब तक कानून का उल्लंघन नहीं माना जा सकता, जब तक वह देश के कानूनों का उल्लंघन नहीं करती।

मलाला की किताब को लेकर क्या है विवाद?

अहमदाबाद में मलाला यूसुफजई की आत्मकथा को लेकर विवाद करीब दो सप्ताह पहले शुरू हुआ था। बताया गया कि शहर के एक स्कूल ने अपने छात्रों को मलाला की किताब पढ़ने के लिए दी थी। इसके बाद बजरंग दल के सदस्यों ने स्कूल प्रबंधन के खिलाफ विरोध जताया।

विरोध करने वालों ने मलाला के कश्मीर मुद्दे पर पुराने रुख का हवाला देते हुए उनकी आलोचना की। उनका आरोप था कि मलाला का पूर्व में भारत से जुड़े मुद्दों पर रुख भारत के हितों के अनुरूप नहीं रहा है। विवाद बढ़ने के बाद स्कूल प्रबंधन ने कथित तौर पर मलाला की आत्मकथा को अपनी रीडिंग लिस्ट से हटा दिया।

हालांकि, इसके बाद भी यह मुद्दा पूरी तरह शांत नहीं हुआ। अहमदाबाद के औडा गार्डन में आयोजित एक सार्वजनिक रीडिंग सेशन में जब ‘आई एम मलाला’ को पढ़ा गया, तो एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया।

औडा गार्डन में रीडिंग सेशन के दौरान हुआ हंगामा

अहमदाबाद के वस्त्रपुर इलाके में स्थित औडा गार्डन में ‘स्टूडेंट एंड यूथ कलेक्टिव’ नामक सिविल सोसायटी संगठन की ओर से पुस्तक पठन कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में मलाला यूसुफजई की आत्मकथा ‘आई एम मलाला’ के अलावा ऐनी फ्रैंक की ‘डायरी ऑफ एनी फ्रैंक’ भी पढ़ी जा रही थी।

कार्यक्रम के दौरान बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कार्यकर्ताओं के वहां पहुंचने के बाद किताबों के चयन को लेकर आपत्ति जताई गई। विशेष रूप से मलाला की आत्मकथा पढ़े जाने को लेकर विरोध किया गया। पहले बहस और विवाद की स्थिति बनी और बाद में मामला मारपीट तक पहुंच गया।

घटना में कई लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए तीन मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया। पुलिस की जांच के बाद घटना से जुड़े अन्य तथ्यों के सामने आने की उम्मीद है।

मौलाना खालिद रशीद ने क्या कहा?

विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए लखनऊ के ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि हर भारतीय नागरिक को अपनी पसंद की किताब पढ़ने का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि स्कूल और कॉलेज अपने पाठ्यक्रम में किताबों को शामिल करने या नहीं करने का फैसला कर सकते हैं।

उनके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपनी रुचि से मलाला की आत्मकथा पढ़ता है तो केवल किताब पढ़ने की वजह से इसे कानून का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने विरोध और आपत्ति के बजाय शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने पर जोर दिया।

मौलाना खालिद रशीद ने मलाला के सामाजिक कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें लड़कियों की शिक्षा और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है। उन्होंने कहा कि एक समय मलाला को लड़कियों के लिए रोल मॉडल के रूप में देखा जाता था।

क्या है ‘आई एम मलाला’?

‘आई एम मलाला’ मलाला यूसुफजई की चर्चित आत्मकथा है। यह पुस्तक उन्होंने ब्रिटिश पत्रकार क्रिस्टिना लैम्ब के सहयोग से लिखी थी। पुस्तक पहली बार अक्टूबर 2013 में प्रकाशित हुई थी। इसका हिंदी अनुवाद ‘मैं मलाला हूं’ नाम से उपलब्ध है।

आत्मकथा में मलाला ने अपने बचपन, पाकिस्तान की स्वात घाटी में अपने जीवन, शिक्षा के प्रति अपने विचार और लड़कियों की शिक्षा के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन किया है। पुस्तक में उनके सामने आई चुनौतियों और वर्ष 2012 में हुए हमले के बाद उनके जीवन में आए बदलावों का भी उल्लेख मिलता है।

मलाला को लड़कियों की शिक्षा के अधिकार के लिए आवाज उठाने के कारण दुनिया भर में पहचान मिली। वर्ष 2014 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वह इस सम्मान को पाने वाली सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता बनी थीं।

स्कूलों में किताबों के चयन को लेकर बहस

अहमदाबाद की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि स्कूलों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में किताबों के चयन को लेकर किस तरह की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। एक तरफ स्कूल प्रबंधन और आयोजक अपने शैक्षणिक उद्देश्यों के अनुसार पुस्तकों का चयन करने की बात कहते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ संगठन किताबों की विषयवस्तु और लेखकों के विचारों को लेकर आपत्ति दर्ज करा रहे हैं।

ऐसे मामलों में किताब को पढ़ने या किसी विचार से असहमति जताने के लिए लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीकों का इस्तेमाल महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा, किसी पुस्तक के बारे में निर्णय लेने से पहले उसके पूरे संदर्भ और विषयवस्तु को समझना भी जरूरी है।

रीडिंग सेशन में सिर्फ मलाला की किताब नहीं थी

कार्यक्रम से जुड़े सिविल सोसायटी सदस्यों के मुताबिक, अहमदाबाद के रीडिंग सेशन में केवल मलाला की किताब नहीं पढ़ी जा रही थी। वहां अलग-अलग विचारधाराओं और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ी रचनाओं को पढ़ने की गतिविधि आयोजित की गई थी।

आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और भगत सिंह जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों की रचनाओं को भी पढ़ा जा रहा था। उनका कहना है कि पुस्तक पठन का उद्देश्य अलग-अलग विचारों और लेखन से परिचित होना है।

इस पूरे विवाद के बीच सिविल सोसायटी से जुड़े लोगों ने भी अभिव्यक्ति और पुस्तक पढ़ने की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि किसी किताब से असहमति होने पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी जा सकती है।

विवाद के बीच सामने आया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा

अहमदाबाद की घटना ने किताबों, विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। भारत में विभिन्न विचारों, लेखकों और ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित किताबें पढ़ी जाती हैं। ऐसे में किसी पुस्तक से सहमत या असहमत होना व्यक्तिगत विचार का विषय हो सकता है।

हालांकि, किसी भी विवाद की स्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखना और शांतिपूर्ण संवाद को प्राथमिकता देना जरूरी है। अहमदाबाद की घटना में पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई के बाद अब जांच के जरिए यह स्पष्ट होना बाकी है कि कार्यक्रम के दौरान वास्तव में क्या-क्या हुआ और विवाद किस तरह बढ़ा।

फिलहाल, मलाला यूसुफजई की आत्मकथा को लेकर शुरू हुआ विवाद अहमदाबाद से निकलकर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर जहां कुछ संगठन उनकी किताब और पुराने बयानों को लेकर सवाल उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मौलाना खालिद रशीद समेत सिविल सोसायटी से जुड़े लोग किताब पढ़ने और विचारों को जानने की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मामले की पुलिस जांच और संबंधित पक्षों के बयान से तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

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