मैरीकॉम के कोच बोले- शादी में भी स्कूल ड्रेस पहनता था, पिता के PF से पहली विदेश यात्रा; अब द्रोणाचार्य अवार्ड
Digital UP News Desk
भारतीय खेल जगत में कुछ उपलब्धियां ऐसी होती हैं, जो केवल एक पुरस्कार तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, अनुशासन और समर्पण की पूरी कहानी बयां करती हैं। बॉक्सिंग के क्षेत्र में खिलाड़ियों को तराशने वाले प्रसिद्ध कोच की ऐसी ही प्रेरणादायक यात्रा अब चर्चा में है। उन्हें प्रतिष्ठित द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उनके लंबे प्रशिक्षण करियर और भारतीय बॉक्सिंग में दिए गए योगदान की पहचान माना जा रहा है।
उनकी कहानी इसलिए भी खास है, क्योंकि आज जिस मुकाम पर वह पहुंचे हैं, वहां तक का सफर बेहद साधारण परिस्थितियों से शुरू हुआ था। संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने खेल को अपना जीवन बनाया और लगातार मेहनत करते रहे। यही वजह है कि उनके प्रशिक्षण से निकले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया।
शादी में भी स्कूल ड्रेस पहनने की कहानी
कोच के जीवन से जुड़ा एक किस्सा उनकी सादगी और अनुशासन को अच्छी तरह सामने रखता है। बताया जाता है कि शुरुआती दिनों में वह इतने साधारण जीवन जीते थे कि शादी जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर भी स्कूल की ड्रेस पहनते थे। यह बात सुनने में भले ही असामान्य लगे, लेकिन उनके व्यक्तित्व में सादगी और जिम्मेदारी हमेशा प्रमुख रही।
उनका मानना था कि व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों या दिखावे से नहीं, बल्कि उसके काम और व्यवहार से होती है। इसलिए सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया। धीरे-धीरे यही अनुशासन उनके प्रशिक्षण का हिस्सा भी बन गया।
खिलाड़ियों को तैयार करते समय वह तकनीक के साथ-साथ अनुशासन, मेहनत और आत्मविश्वास पर भी जोर देते रहे। उनके प्रशिक्षण की यही शैली आगे चलकर कई खिलाड़ियों के करियर की मजबूत नींव बनी।
पिता के PF के पैसे से पहली बार विदेश यात्रा
उनकी जिंदगी का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव पहली विदेश यात्रा से जुड़ा है। शुरुआती दौर में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंचना आसान नहीं था। आर्थिक संसाधन सीमित थे और विदेश यात्रा के लिए पर्याप्त धन जुटाना बड़ी चुनौती थी।
ऐसे समय में उनके पिता ने अपने प्रॉविडेंट फंड (PF) के पैसे का इस्तेमाल कर उनकी पहली विदेश यात्रा का रास्ता तैयार किया। यह फैसला परिवार के विश्वास और बेटे के सपने के प्रति उनके समर्थन को दर्शाता है।
उस दौर में विदेश जाना केवल यात्रा नहीं था, बल्कि खेल की दुनिया में आगे बढ़ने का एक बड़ा अवसर था। इस यात्रा ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग की बारीकियों को करीब से समझने का मौका दिया। इसके बाद उनके अनुभव में लगातार इजाफा हुआ और उन्होंने अपने ज्ञान को खिलाड़ियों के प्रशिक्षण में इस्तेमाल करना शुरू किया।
संघर्ष से निकला प्रशिक्षण का मजबूत नजरिया
किसी भी महान कोच की पहचान सिर्फ इस बात से नहीं होती कि उसने कितने खिलाड़ियों को प्रशिक्षित किया, बल्कि यह भी देखा जाता है कि उसने खिलाड़ियों के व्यक्तित्व और सोच को कितना मजबूत बनाया। इस कोच की कार्यशैली में भी यही नजरिया दिखाई देता है।
उन्होंने प्रशिक्षण को केवल रिंग की तकनीक तक सीमित नहीं रखा। इसके बजाय खिलाड़ियों को मानसिक रूप से मजबूत बनाने, दबाव में बेहतर प्रदर्शन करने और लगातार सीखते रहने के लिए प्रेरित किया।
बॉक्सिंग जैसे खेल में खिलाड़ी की शारीरिक क्षमता के साथ मानसिक मजबूती भी बेहद जरूरी होती है। मुकाबले के दौरान कुछ सेकंड में निर्णय लेना पड़ता है। ऐसे में प्रशिक्षण के दौरान विकसित किया गया आत्मविश्वास खिलाड़ी के प्रदर्शन में निर्णायक भूमिका निभाता है।
यही कारण है कि उनके प्रशिक्षण से जुड़े खिलाड़ियों ने विभिन्न स्तरों पर अपनी पहचान बनाई।
मैरीकॉम के करियर में भी महत्वपूर्ण भूमिका
भारतीय बॉक्सिंग की बात हो और एमसी मैरीकॉम का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है। मैरीकॉम ने भारतीय महिला बॉक्सिंग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। उनके करियर में कई प्रशिक्षकों और विशेषज्ञों का योगदान रहा, जिन्होंने अलग-अलग चरणों में उनकी क्षमता को निखारने में भूमिका निभाई।
मैरीकॉम के साथ काम करने वाले प्रशिक्षकों की मेहनत ने भारतीय बॉक्सिंग में कोच की भूमिका को भी नई पहचान दी। खिलाड़ियों की सफलता के पीछे मौजूद प्रशिक्षकों का योगदान अक्सर सुर्खियों से दूर रह जाता है। हालांकि, द्रोणाचार्य अवार्ड जैसे सम्मान इस योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाते हैं।
मैरीकॉम जैसी चैंपियन को तैयार करने की प्रक्रिया ने भारतीय खेल प्रशिक्षण व्यवस्था को भी मजबूती दी। इससे यह संदेश गया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की सफलता के लिए केवल प्रतिभा ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाला वैज्ञानिक और अनुशासित प्रशिक्षण भी जरूरी है।
द्रोणाचार्य अवार्ड क्यों है खास?
भारत में द्रोणाचार्य अवार्ड खेल प्रशिक्षकों को दिया जाने वाला प्रतिष्ठित सम्मान है। इसका उद्देश्य उन कोचों के योगदान को पहचान देना है, जिन्होंने खिलाड़ियों को तैयार करने और उन्हें उच्च स्तर पर सफलता हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इस सम्मान का नाम महाभारत के गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर रखा गया है। जिस तरह गुरु द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों को प्रशिक्षण देकर उन्हें श्रेष्ठ योद्धा बनाने में योगदान दिया, उसी भावना के साथ यह पुरस्कार खेल प्रशिक्षकों के समर्पण को सम्मानित करता है।
इसलिए किसी कोच के लिए द्रोणाचार्य अवार्ड मिलना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उनके वर्षों के प्रशिक्षण, संघर्ष और खिलाड़ियों के प्रति समर्पण की सार्वजनिक मान्यता है।
साधारण शुरुआत से राष्ट्रीय सम्मान तक
उनकी यात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें संघर्ष और सफलता दोनों एक साथ दिखाई देते हैं। एक तरफ शादी में स्कूल ड्रेस पहनने जैसी सादगी की कहानी है, तो दूसरी तरफ पिता के PF से विदेश यात्रा शुरू करने का दौर। वहीं आज उसी सफर का परिणाम प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान के रूप में सामने आया है।
यह यात्रा बताती है कि किसी भी क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल करने के लिए शुरुआत में उपलब्ध संसाधन हमेशा निर्णायक नहीं होते। कई बार लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता, परिवार का सहयोग और लगातार मेहनत व्यक्ति को ऐसी ऊंचाई तक पहुंचा देती है, जिसकी शुरुआत में कल्पना करना भी मुश्किल होता है।
खास तौर पर खेलों में खिलाड़ियों के साथ-साथ कोचों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। खिलाड़ी मैदान या रिंग में प्रदर्शन करता है, लेकिन उसके पीछे रणनीति, तकनीक, फिटनेस और मानसिक तैयारी की लंबी प्रक्रिया होती है। इस पूरी प्रक्रिया में कोच की भूमिका केंद्रीय होती है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
उनकी कहानी आज के युवा खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों के लिए भी प्रेरणा है। सुविधाएं और आधुनिक प्रशिक्षण संसाधन महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका सही इस्तेमाल तभी संभव है, जब मेहनत और अनुशासन के साथ लक्ष्य तय किया जाए।
इसके अलावा, परिवार का समर्थन भी किसी खिलाड़ी या प्रशिक्षक के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। पिता द्वारा PF की राशि से विदेश यात्रा के लिए मदद करना इसका उदाहरण है। यह समर्थन केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि उनके सपने पर परिवार के भरोसे का प्रतीक भी था।
आज जब भारतीय खिलाड़ी दुनिया के बड़े मंचों पर लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, तब ऐसे प्रशिक्षकों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। खिलाड़ियों को तैयार करने वाले कोच आने वाली पीढ़ी के खेल भविष्य को आकार देते हैं।
सम्मान के साथ पूरी हुई एक लंबी यात्रा
द्रोणाचार्य अवार्ड मिलना उनके लिए उस लंबी यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसकी शुरुआत सीमित संसाधनों और साधारण परिस्थितियों से हुई थी। शादी में स्कूल ड्रेस पहनने से लेकर पिता के PF के सहारे पहली विदेश यात्रा और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण के अनुभव तक, उनकी कहानी कई उतार-चढ़ाव से होकर गुजरी है।
अंततः यह सम्मान इस बात की याद दिलाता है कि खेलों में पदक और ट्रॉफी जीतने वालों के साथ-साथ उन्हें तैयार करने वालों की मेहनत को भी सम्मान मिलना चाहिए। एक अच्छा कोच केवल खिलाड़ी की तकनीक नहीं सुधारता, बल्कि उसके भीतर आत्मविश्वास, अनुशासन और जीतने की सोच विकसित करता है।
इस लिहाज से द्रोणाचार्य अवार्ड उनके लिए केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और भारतीय बॉक्सिंग के प्रति समर्पण की पहचान है। उनकी कहानी उन सभी युवाओं के लिए संदेश है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करते हैं।

