सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हत्या के आरोपी किशोर पर वयस्क की तरह चल सकता है मुकदमा, जानिए पूरा मामला
Digital UP News Desk
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि हत्या का अपराध किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत ‘जघन्य अपराध’ की श्रेणी में आता है। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या के अपराध के लिए आजीवन कारावास को न्यूनतम निर्धारित सजा माना जा सकता है। अब भारतीय न्याय संहिता में हत्या का प्रावधान धारा 103(1) के तहत है।
इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोर पर, निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद, कुछ मामलों में वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर किशोर आरोपी को स्वतः वयस्क मान लिया जाएगा या सीधे आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी। इसके लिए किशोर न्याय अधिनियम के तहत प्रारंभिक आकलन और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक होगा।
बिहार के हत्या मामले में आया फैसला
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने बिहार से जुड़े एक हत्या मामले में यह फैसला सुनाया। पीठ ने किशोर आरोपी की अपील खारिज करते हुए पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें आरोपी पर बाल न्यायालय में वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का रास्ता साफ किया गया था।
मामले में किशोर आरोपी ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने अपील पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया। कोर्ट ने इस मामले में किशोर न्याय अधिनियम के तहत ‘जघन्य अपराध’ की कानूनी व्याख्या को स्पष्ट किया।
हत्या को ‘जघन्य अपराध’ की श्रेणी में रखा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत जघन्य अपराध वह अपराध है, जिसमें न्यूनतम सजा सात वर्ष या उससे अधिक हो। अदालत ने हत्या के अपराध से जुड़े प्रावधान की व्याख्या करते हुए कहा कि धारा 302 आईपीसी के तहत आजीवन कारावास को न्यूनतम सजा के रूप में देखा जा सकता है।
इसी आधार पर हत्या को किशोर न्याय कानून के तहत ‘जघन्य अपराध’ माना गया। अब भारतीय न्याय संहिता लागू होने के बाद हत्या का प्रावधान धारा 103(1) में है। इस कानूनी व्याख्या का सीधा प्रभाव उन मामलों पर पड़ सकता है, जिनमें 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोर गंभीर अपराधों में आरोपी बनाए जाते हैं।
हर किशोर आरोपी को सीधे वयस्क नहीं माना जाएगा
फैसले को लेकर एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि हत्या के प्रत्येक मामले में किशोर आरोपी को स्वतः वयस्क मान लिया जाएगा।
किशोर न्याय अधिनियम में 16 से 18 वर्ष की आयु के बच्चों के संबंध में विशेष प्रक्रिया निर्धारित है। यदि किसी किशोर पर जघन्य अपराध का आरोप है, तो किशोर न्याय बोर्ड को प्रारंभिक आकलन करना होता है। इस आकलन में किशोर की मानसिक क्षमता, शारीरिक क्षमता, अपराध के परिणामों को समझने की क्षमता और कथित अपराध की परिस्थितियों पर विचार किया जाता है।
इसके बाद ही यह तय किया जाता है कि मामला किस प्रकार आगे बढ़ेगा। इसलिए, इस फैसले में भी अदालत ने कानूनी प्रक्रिया और प्रारंभिक आकलन के महत्व को रेखांकित किया है।
विशेषज्ञों की राय लेना अनिवार्य नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 101(2) से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर भी स्पष्टीकरण दिया। अदालत ने कहा कि मनोवैज्ञानिक या चिकित्सा विशेषज्ञों की सहायता लेना अपीलीय अदालत के लिए अनिवार्य नहीं है।
कानून में इस्तेमाल किए गए प्रावधान के अनुसार, अदालत आवश्यकता और मामले की परिस्थितियों के आधार पर विशेषज्ञों की सहायता ले सकती है। यानी विशेषज्ञ की राय लेना अदालत का विवेकाधिकार है, हर मामले में अनिवार्य प्रक्रिया नहीं।
हालांकि, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि किशोर की मानसिक और शारीरिक क्षमता का आकलन महत्वहीन हो जाता है। किशोर न्याय बोर्ड को उपलब्ध सभी सामग्री पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा।
किशोर न्याय बोर्ड को सभी पहलुओं पर स्वतंत्र विचार करना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय बोर्ड प्रारंभिक आकलन के दौरान किसी एक रिपोर्ट या विशेषज्ञ की राय पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकता। बोर्ड को मामले से जुड़े सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों और परिस्थितियों पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा।
इसमें सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट, सोशल बैकग्राउंड रिपोर्ट, गवाहों के बयान, विशेषज्ञों की राय और अन्य उपलब्ध सामग्री शामिल हो सकती है। इसके बाद बोर्ड को यह देखना होगा कि किशोर कथित अपराध के परिणामों को समझने में सक्षम था या नहीं और मामले की परिस्थितियां क्या थीं।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि प्रारंभिक आकलन महज औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए मामले से जुड़े सभी पहलुओं का सावधानीपूर्वक परीक्षण आवश्यक है।
कानून विशेषज्ञ रिपोर्ट को अकेला आधार नहीं बनाया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी विशेषज्ञ की रिपोर्ट महत्वपूर्ण सामग्री हो सकती है, लेकिन उसे ही अंतिम और एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। किशोर न्याय बोर्ड को विशेषज्ञ की राय को अन्य उपलब्ध सामग्री के साथ पढ़ना और समझना होगा।
अदालत के अनुसार, बोर्ड के सदस्यों को अपने स्तर पर सभी तथ्यों पर विचार करना चाहिए। इस प्रकार, विशेषज्ञ की रिपोर्ट प्रक्रिया का एक हिस्सा है, लेकिन अंतिम निर्णय पूरी सामग्री के समग्र मूल्यांकन के आधार पर होना चाहिए।
यह टिप्पणी किशोर न्याय व्यवस्था में निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक संतुलित और तथ्यपरक बनाने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का व्यापक महत्व
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला किशोर न्याय व्यवस्था में गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने एक ओर जघन्य अपराधों की कानूनी श्रेणी को स्पष्ट किया है, वहीं दूसरी ओर किशोरों के प्रारंभिक आकलन की प्रक्रिया में सावधानी बरतने पर भी जोर दिया है।
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि गंभीर अपराधों के मामलों में किशोर न्याय कानून के प्रावधानों की व्याख्या करते समय अपराध की प्रकृति के साथ-साथ आरोपी की उम्र, मानसिक क्षमता और परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाएगा।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हत्या का अपराध किशोर न्याय अधिनियम के तहत जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है। हालांकि, 16 से 18 वर्ष के किशोर आरोपी के मामले में वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और प्रारंभिक आकलन के बाद ही लिया जाएगा। इस फैसले से किशोर न्याय कानून के तहत गंभीर अपराधों की सुनवाई को लेकर कानूनी स्थिति और अधिक स्पष्ट हुई है।

