कानपुर में मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर FIR की मांग, पुलिस कमिश्नर को दिया प्रार्थना पत्र
रिपोर्ट – हनुमंत सिंह
कानपुर: कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य मल्लिकार्जुन खड़गे के एक सार्वजनिक बयान को लेकर कानपुर में कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। शिकायतकर्ता कृष्णा तिवारी ने पुलिस कमिश्नर के समक्ष प्रार्थना पत्र देकर खड़गे के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने की मांग की है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि खड़गे के कथित बयान से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति असंतोष पैदा हो सकता है और इससे जुड़े वक्तव्य आपत्तिजनक हैं।
शिकायतकर्ता ने अपने आवेदन में संबंधित बयान की जांच कराने, कथित रूप से उससे जुड़े इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और कानून के अनुसार कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि पुलिस ने इस प्रार्थना पत्र पर FIR दर्ज की है या जांच शुरू की है। इसलिए फिलहाल इसे शिकायत और कार्रवाई की मांग के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
3 अक्टूबर के कथित बयान को लेकर उठाए सवाल
शिकायत के अनुसार, 3 अक्टूबर 2026 को एक सार्वजनिक संवाद के दौरान मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर टिप्पणी की थी। आवेदन में खड़गे के हवाले से कहा गया है कि देश में चुनाव अवैध तरीके से कराए जा रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा निर्वाचित मुख्यमंत्रियों की वैधता पर सवाल उठाए गए। शिकायत में यह भी उल्लेख है कि खड़गे ने सदनों को भंग करने और मतपत्रों के जरिए नए चुनाव कराने की मांग की थी।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, खड़गे ने 3 अक्टूबर को कर्नाटक के कलबुर्गी में चुनाव प्रक्रिया, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सवाल उठाए थे। उन्होंने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं को भंग कर बैलेट पेपर के माध्यम से नए चुनाव कराने की मांग भी की थी।
इसी राजनीतिक बयान को आधार बनाकर कानपुर में शिकायतकर्ता ने कानूनी कार्रवाई की मांग की है। हालांकि, किसी बयान पर आपत्ति दर्ज कराना और उस बयान से कानूनी अपराध सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं। शिकायत में लगाए गए आरोपों पर निर्णय संबंधित तथ्यों, साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर ही किया जा सकता है।
शिकायत में लगाए गए गंभीर आरोप
कृष्णा तिवारी की ओर से दिए गए प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया है कि खड़गे की कथित टिप्पणियां असत्य और भड़काऊ हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि ऐसे बयानों से लोकतांत्रिक सरकार और संवैधानिक व्यवस्था के प्रति लोगों में अवमानना या असंतोष पैदा होने की आशंका है।
आवेदन में यह भी कहा गया है कि कथित बयान के प्रसार और उसके प्रभाव की जांच की जानी चाहिए। शिकायतकर्ता ने पुलिस से अनुरोध किया है कि मामले से जुड़े मूल बयान, उपलब्ध रिकॉर्डिंग और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री की जांच कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वास्तव में क्या कहा गया था और उसका संदर्भ क्या था।
BNS की विभिन्न धाराओं में कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने अपने आवेदन में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 152, 353 और 356 का उल्लेख करते हुए कार्रवाई की मांग की है।
- धारा 152: भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित है।
- धारा 353: लोक-अपद्रव कारित करने वाले कुछ कथनों, सूचनाओं और अफवाहों से संबंधित प्रावधान है।
- धारा 356: मानहानि से संबंधित प्रावधान है।
इन धाराओं का उल्लेख शिकायतकर्ता की ओर से किया गया है। इनका लागू होना संबंधित बयान की वास्तविक सामग्री, संदर्भ, आवश्यक कानूनी तत्वों और जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा। भारतीय न्याय संहिता का आधिकारिक पाठ भारत सरकार के India Code पोर्टल पर उपलब्ध है।
इसके अतिरिक्त, प्रार्थना पत्र में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 और 67 का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता ने कथित बयान के इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों और सोशल मीडिया पर प्रसार से जुड़े पहलुओं की जांच करने का अनुरोध किया है। इन प्रावधानों की प्रासंगिकता का निर्धारण भी तथ्यों और लागू कानूनी शर्तों के आधार पर किया जाना होगा।
पुलिस कमिश्नर से FIR और जांच की मांग
शिकायतकर्ता कृष्णा तिवारी ने पुलिस कमिश्नर से अनुरोध किया है कि प्रार्थना पत्र में लगाए गए आरोपों की जांच कराई जाए और यदि कानूनी रूप से आवश्यक आधार बनते हैं, तो संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की जाए। साथ ही, उन्होंने मामले से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की मांग भी की है।
फिलहाल, इस मामले में शिकायतकर्ता की ओर से की गई मांग ही उपलब्ध जानकारी का मुख्य आधार है। पुलिस की ओर से प्रार्थना पत्र पर की गई कार्रवाई, FIR दर्ज होने की स्थिति या जांच के निष्कर्षों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
इसलिए मामले में आगे की स्थिति पुलिस की कार्रवाई और जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। कानूनी प्रक्रिया के तहत तथ्यों की जांच और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आने के बाद ही मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

