मथुरा में अष्टछाप कवि कृष्णदास जी की जयंती पर विचार एवं काव्य गोष्ठी, भक्ति साहित्य पर हुई चर्चा
रिपोर्ट – योगेश भारद्वाज
गोवर्धन (मथुरा): ब्रज की समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से पारासोली स्थित सूरदास ब्रज भाषा अकादमी में अष्टछाप कवि कृष्णदास महाराज की जयंती के उपलक्ष्य में विचार एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ब्रज भाषा के विद्वानों, साहित्यकारों और रचनाकारों ने कृष्णदास जी के व्यक्तित्व, कृतित्व तथा कृष्णभक्ति साहित्य में उनके योगदान पर विचार व्यक्त किए। साथ ही, वक्ताओं ने ब्रज भाषा की परंपरा को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक भक्ति साहित्य की विरासत पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम में साहित्य और भक्ति के संबंध पर चर्चा करते हुए कहा गया कि अष्टछाप के कवियों की रचनाएं आज भी कृष्णभक्ति, ब्रज संस्कृति और भारतीय साहित्यिक परंपरा को समृद्ध कर रही हैं। इस अवसर पर साहित्यकारों ने काव्य पाठ भी किया, जिससे गोष्ठी का वातावरण साहित्यिक और भक्तिमय बना रहा।
दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ
सूरदास ब्रज भाषा अकादमी में आयोजित विचार एवं काव्य गोष्ठी का शुभारंभ उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी राजीव पांडेय और ब्रज भाषा के प्रमुख रचनाकार राधा गोविन्द पाठक ने किया। दोनों अतिथियों ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया और माल्यार्पण कर कार्यक्रम की शुरुआत की।
इसके बाद अकादमी के निदेशक डॉ. केशव देव शर्मा ने अतिथियों का उत्तरीय पहनाकर स्वागत किया। कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यकारों और विद्वानों ने अष्टछाप कवि कृष्णदास जी की साहित्यिक विरासत को याद करते हुए उनके योगदान पर अपने विचार रखे।
कार्यक्रम का उद्देश्य केवल जयंती मनाना ही नहीं, बल्कि ब्रज भाषा के साहित्य, भक्ति काव्य और सांस्कृतिक मूल्यों पर संवाद को आगे बढ़ाना भी रहा। इसी क्रम में वक्ताओं ने कृष्णदास जी के जीवन और रचनाओं की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
कृष्णदास जी का साहित्य आज भी प्रेरणास्रोत: डॉ. केशव देव शर्मा
अकादमी के निदेशक डॉ. केशव देव शर्मा ने कहा कि कृष्णदास जी जैसे कृष्णभक्त कवियों का जीवन और साहित्य शताब्दियों बाद भी ब्रजवासियों के साथ-साथ समूचे विश्व के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है। उनकी कविताओं में सहज ज्ञान और भक्ति की धारा निरंतर प्रवाहित होती है।
उन्होंने कहा कि ऐसे कवियों के साहित्य और विचारों को जन-जन तक पहुंचाना आवश्यक है। इससे न केवल ब्रज भाषा की परंपरा जीवंत बनी रहती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर मिलता है।
डॉ. शर्मा के अनुसार, ब्रज भाषा का साहित्य भारतीय भक्ति परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ लोकजीवन, सांस्कृतिक पहचान और मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति भी मिलती है। इसलिए साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से पुराने रचनाकारों के योगदान को याद करना और उनकी रचनाओं पर चर्चा करना उपयोगी है।
अष्टछाप के कवियों की रचनाओं में कृष्णभक्ति की परंपरा
गोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने अष्टछाप के कवियों के साहित्यिक योगदान पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि अष्टछाप की काव्य परंपरा कृष्णभक्ति से गहराई से जुड़ी हुई है। इन कवियों की रचनाओं में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, समर्पण और भक्ति की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
इसके साथ ही, ब्रज भाषा में रचित पदों ने ब्रज क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक स्तर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन रचनाओं के माध्यम से ब्रज की धार्मिक मान्यताओं, लोकपरंपराओं और भक्ति भाव को अभिव्यक्ति मिली।
वक्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि साहित्यिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए उसका अध्ययन, पाठ और प्रचार-प्रसार जरूरी है। जब नई पीढ़ी ऐसे कवियों की रचनाओं से परिचित होती है, तो उसे अपनी भाषा और सांस्कृतिक इतिहास को समझने का अवसर मिलता है।
सरस्वती वंदना और काव्य पाठ ने बांधा समां
कार्यक्रम में गोपाल उपाध्याय ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। इसके माध्यम से साहित्य और ज्ञान की देवी मां सरस्वती का स्मरण किया गया। वहीं, मंच संचालन ब्रज भाषा के मनीषी हरिबाबू ओम ने किया। उन्होंने कार्यक्रम को क्रमबद्ध तरीके से आगे बढ़ाते हुए वक्ताओं और रचनाकारों को अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर दिया।
गोष्ठी में उपस्थित साहित्यकारों ने कृष्णदास जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा के साथ अपनी साहित्यिक प्रस्तुतियां भी दीं। काव्य पाठ के दौरान ब्रज भाषा की अभिव्यक्ति, भक्ति भाव और साहित्यिक परंपरा के विभिन्न पक्ष सामने आए।
इस प्रकार, कार्यक्रम विचार-विमर्श और काव्य प्रस्तुति का साझा मंच बना। इसमें ब्रज भाषा के साहित्यकारों को एक-दूसरे के विचार सुनने और अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने का अवसर मिला।
कई साहित्यकारों और रचनाकारों ने रखे विचार
इस अवसर पर पूर्ण प्रकाश कौशिक, देवी प्रसाद गौड़, केसी गौर, रेनू उपाध्याय, मोहन माही, महेश चन्द्र शर्मा, हरे कृष्ण शर्मा, डॉ. नन्द किशोर शास्त्री, अमर सिंह द्वितीय, श्याम बाबू कौशिक, मोहित मनोहर, सतीश एकांत, शिल्पी केशोरैया और कीर्ति शर्मा सहित अन्य साहित्यकार उपस्थित रहे।
इन साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किए और काव्य पाठ के माध्यम से कार्यक्रम में सहभागिता की। उनकी प्रस्तुतियों में ब्रज भाषा की साहित्यिक परंपरा तथा भक्ति काव्य की महत्ता को रेखांकित किया गया।
कार्यक्रम में विद्वानों और रचनाकारों की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि भाषा और साहित्य की परंपरा को आगे बढ़ाने में सामूहिक प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे आयोजन साहित्यकारों के बीच संवाद स्थापित करने के साथ क्षेत्रीय भाषा और संस्कृति को प्रोत्साहित करने का अवसर भी प्रदान करते हैं।
आभार के साथ हुआ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के समापन अवसर पर अकादमी के निदेशक डॉ. केशव देव शर्मा ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों और सहभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यक्रम में शामिल होकर कृष्णदास जी के व्यक्तित्व और साहित्य पर विचार साझा करने वाले सभी लोगों का धन्यवाद किया।
कुल मिलाकर, पारासोली स्थित सूरदास ब्रज भाषा अकादमी में आयोजित यह विचार एवं काव्य गोष्ठी अष्टछाप कवि कृष्णदास महाराज की साहित्यिक विरासत को याद करने का अवसर बनी। कार्यक्रम के माध्यम से ब्रज भाषा, कृष्णभक्ति और साहित्यिक परंपरा के संरक्षण तथा प्रचार-प्रसार की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।
ऐसे आयोजन ब्रज क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने और साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में योगदान दे सकते हैं।

