बांदा के तिंदवारी नगर पंचायत में सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप, डीएम से निष्पक्ष जांच की मांग

8b945bc5-f452-46ff-ae1e-6c8437697faf

रिपोर्ट – शैलेन्द्र शानू वर्मा 

बांदा: उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की तिंदवारी नगर पंचायत में एक आउटसोर्सिंग कर्मचारी से कथित तौर पर निजी काम कराए जाने और उसके भुगतान में सरकारी धन के इस्तेमाल का मामला सामने आया है। इस संबंध में स्थानीय नागरिक बुद्धि विकास पटेल ने जिलाधिकारी को शिकायती पत्र देकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि नगर पंचायत में तैनात कर्मचारी से निकाय के काम के बजाय कथित अध्यक्ष प्रतिनिधि के निजी वाहन को चलवाया जा रहा है और उससे घरेलू व अन्य निजी कार्य भी कराए जा रहे हैं।

शिकायत में सरकारी बजट के उपयोग, कर्मचारी की ड्यूटी और भुगतान से जुड़े अभिलेखों की जांच कराने की मांग उठाई गई है। इसके अलावा, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जब उन्होंने इस मामले को नगर पंचायत के अधिशासी अधिकारी के सामने उठाया, तो जांच कराने के बजाय उन्हें झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी गई। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। संबंधित पक्षों का आधिकारिक जवाब भी सामने आना आवश्यक है।

आउटसोर्सिंग कर्मचारी से निजी काम कराने का आरोप

जिलाधिकारी को भेजे गए शिकायती पत्र के अनुसार, बुद्धि विकास पटेल पुत्र बलबीर सिंह ने नगर पंचायत तिंदवारी में कार्यरत आउटसोर्सिंग कर्मचारी उमाशंकर उर्फ बबलू को लेकर सवाल उठाए हैं। शिकायतकर्ता के मुताबिक, कर्मचारी कबीर नगर का निवासी है और नगर पंचायत में कार्यरत है।

आरोप है कि खुद को नगर पंचायत अध्यक्ष का प्रतिनिधि बताने वाले रमेश चंद्र साहू पुत्र स्वर्गीय गया प्रसाद साहू उक्त कर्मचारी से नगर पंचायत के आधिकारिक कार्यों के बजाय निजी काम करा रहे हैं। शिकायत में यह भी कहा गया है कि कर्मचारी से उनकी निजी स्कॉर्पियो गाड़ी चलवाई जाती है, जिसका पंजीकरण नंबर यूपी-90-AA-8920 बताया गया है। इसके साथ ही, कर्मचारी से अन्य घरेलू और निजी कार्य कराए जाने का आरोप भी लगाया गया है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि नगर पंचायत के बजट से कर्मचारी को वेतन या मानदेय दिया जा रहा है, तो उसकी ड्यूटी सरकारी अथवा निकाय के निर्धारित कार्यों के लिए ही होनी चाहिए। ऐसे में कर्मचारी से कथित रूप से निजी काम कराए जाने की स्थिति में भुगतान और कार्य आवंटन की जांच जरूरी है।

सरकारी धन के इस्तेमाल पर उठाए सवाल

इस मामले में शिकायतकर्ता ने सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग का मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि किसी भी सरकारी निकाय में तैनात कर्मचारी की जिम्मेदारी और कार्यक्षेत्र निर्धारित नियमों के अनुसार होना चाहिए। यदि कर्मचारी को नगर पंचायत के काम के लिए भुगतान किया जा रहा है, लेकिन उससे निजी कार्य लिए जा रहे हैं, तो इस स्थिति की जांच की जानी चाहिए।

हालांकि, केवल शिकायत के आधार पर सरकारी धन के दुरुपयोग की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसके लिए कर्मचारी की नियुक्ति और तैनाती से जुड़े दस्तावेज, कार्य आवंटन, उपस्थिति पंजिका, भुगतान अभिलेख और वास्तविक ड्यूटी की स्थिति का परीक्षण जरूरी होगा। जांच के दौरान यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कर्मचारी की तैनाती किस एजेंसी के माध्यम से हुई है और उसके कार्यों की निगरानी की जिम्मेदारी किस अधिकारी के पास है।

इसलिए मामले में दस्तावेजों के आधार पर जांच होने से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और यदि कोई नियम उल्लंघन हुआ है, तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है।

अधिशासी अधिकारी पर धमकी देने का आरोप

शिकायतकर्ता बुद्धि विकास पटेल ने अपने पत्र में नगर पंचायत के अधिशासी अधिकारी के व्यवहार को लेकर भी आरोप लगाया है। उनका दावा है कि जब उन्होंने कथित वित्तीय अनियमितता और नियमों के उल्लंघन की शिकायत अधिकारी से की, तो मामले की जांच कराने के बजाय उन्हें झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी गई।

यह आरोप भी जांच का विषय है। यदि शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है, तो संबंधित घटनाक्रम और अधिकारियों की भूमिका की भी नियमानुसार जांच की जा सकती है। वहीं, निष्पक्षता बनाए रखने के लिए संबंधित अधिकारी का पक्ष जानना और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा करना जरूरी होगा।

फिलहाल, उपलब्ध शिकायत संबंधी विवरण में अधिशासी अधिकारी की ओर से इस आरोप पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया शामिल नहीं है। इसलिए पूरे मामले में सभी संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

जिलाधिकारी से स्वतंत्र जांच कराने की मांग

शिकायतकर्ता ने जिलाधिकारी से मांग की है कि मामले की जांच नगर पंचायत के स्थानीय प्रभाव से बाहर के किसी सक्षम अधिकारी से कराई जाए। उनका कहना है कि जांच ऐसी होनी चाहिए, जिसमें कर्मचारी की वास्तविक ड्यूटी, उपस्थिति और भुगतान से संबंधित सभी अभिलेखों की बारीकी से पड़ताल की जाए।

शिकायत में यह भी मांग की गई है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही, सरकारी धन की क्षति प्रमाणित होने पर नियमानुसार वसूली की प्रक्रिया अपनाई जाए। शिकायतकर्ता ने शासकीय धन की शत-प्रतिशत रिकवरी की मांग भी उठाई है।

निष्पक्ष जांच के लिए संबंधित कर्मचारी, आउटसोर्सिंग एजेंसी, नगर पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों और कथित अध्यक्ष प्रतिनिधि की भूमिका की समीक्षा की जा सकती है। साथ ही, यह भी देखा जाना चाहिए कि कर्मचारी को किस कार्य के लिए नियुक्त किया गया था और उसकी उपस्थिति व भुगतान का सत्यापन किस आधार पर किया जाता रहा है।

जांच के बाद ही स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति

तिंदवारी नगर पंचायत से जुड़ा यह मामला सरकारी संसाधनों के उपयोग और कर्मचारियों की जवाबदेही से संबंधित सवाल उठाता है। यदि किसी कर्मचारी से निर्धारित कार्यों के बजाय निजी काम कराए जाने की शिकायत मिलती है, तो संबंधित अभिलेखों और साक्ष्यों के आधार पर जांच किया जाना आवश्यक है।

हालांकि, अभी यह मामला शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोपों के स्तर पर है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर आरोपों को सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। अब जिलाधिकारी के स्तर पर शिकायत पर क्या कार्रवाई होती है और जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं, इस पर नजर रहेगी।

जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट होगा कि सरकारी धन के इस्तेमाल में कोई अनियमितता हुई है या नहीं। यदि नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो संबंधित नियमों के अनुसार कार्रवाई और वसूली का निर्णय लिया जा सकता है। वहीं, आरोप प्रमाणित नहीं होने की स्थिति में तथ्यात्मक स्थिति भी सामने आएगी।

You may have missed