बांदा में सांसद की बेटी की ड्यूटी पर उठे सवाल, शिकायत के बाद उपस्थिति और रिकॉर्ड जांच की रखी गई मांग

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रिपोर्ट – शैलेन्द्र शानू वर्मा 

बांदा: उत्तर प्रदेश के बांदा जिला चिकित्सालय में तैनात एक स्टाफ नर्स की ड्यूटी को लेकर शिकायत सामने आने के बाद मामला चर्चा का विषय बन गया है। शिकायतकर्ता ने जिलाधिकारी को शिकायती पत्र सौंपकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि जिला अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में तैनात नर्स नियमित रूप से अपनी निर्धारित ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हो रही हैं। हालांकि, इन आरोपों की अभी तक किसी सक्षम अधिकारी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है और संबंधित पक्ष की ओर से भी सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

शिकायत में क्या लगाए गए हैं आरोप?

शिकायतकर्ता रवीन्द्र नाथ गुप्ता ने जिलाधिकारी को दिए गए प्रार्थना पत्र में कहा है कि संबंधित नर्स की ड्यूटी रोस्टर के अनुसार प्रतिदिन सुबह 8:00 बजे से ट्रॉमा सेंटर में निर्धारित है। शिकायत के अनुसार, पिछले लगभग दो वर्षों से वह नियमित रूप से ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हो रही हैं।

शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि संबंधित नर्स बांदा-चित्रकूट लोकसभा क्षेत्र की सांसद श्रीमती कृष्णा देवी पटेल की पुत्री हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उनकी अनुपस्थिति के दौरान उनकी जगह “संजय” नामक व्यक्ति अस्पताल में कार्य करता है, जो सेवा नियमों के अनुरूप नहीं है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

अधिकारियों से संपर्क का भी किया गया दावा

शिकायतकर्ता का कहना है कि मामले की जानकारी प्राप्त करने के लिए उन्होंने अस्पताल प्रशासन के कई अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया। उनके अनुसार, ड्यूटी रोस्टर तैयार करने वाली महिला कर्मचारी, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) तथा मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) को कई बार फोन किया गया, लेकिन किसी ने कॉल रिसीव नहीं की।

शिकायत में आगे दावा किया गया है कि बाद में “शिवम” नामक एक कर्मचारी ने फोन उठाया, लेकिन उसने मामले से संबंधित कोई जानकारी देने से इनकार कर दिया। शिकायतकर्ता का कहना है कि अस्पताल प्रशासन की ओर से उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिला।

जानिए किन बिंदुओं की जांच की है मांग?

जिलाधिकारी को दिए गए प्रार्थना पत्र में शिकायतकर्ता ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जांच कराने की मांग की है। इनमें प्रमुख रूप से—

  • पिछले लगभग दो वर्षों के उपस्थिति रजिस्टर की जांच।
  • संबंधित ड्यूटी अवधि के दौरान उपलब्ध रिकॉर्ड का सत्यापन
  • ट्रॉमा सेंटर और संबंधित ड्यूटी स्थल पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज का परीक्षण।
  • ड्यूटी से जुड़े अन्य प्रशासनिक अभिलेखों की निष्पक्ष जांच।

शिकायतकर्ता का कहना है कि इन अभिलेखों की जांच से पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी उठे सवाल

यह मामला सामने आने के बाद सरकारी अस्पतालों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। यदि किसी सरकारी कर्मचारी की उपस्थिति या ड्यूटी को लेकर शिकायत मिलती है, तो नियमानुसार उसकी जांच संबंधित विभाग द्वारा की जाती है। ऐसे मामलों में रिकॉर्ड, रोस्टर और अन्य उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर तथ्यों का सत्यापन किया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है ताकि यदि आरोप सही हों तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सके और यदि आरोप निराधार हों तो संबंधित कर्मचारी की स्थिति भी स्पष्ट हो सके।

अभी तक नहीं हुई आधिकारिक पुष्टि

महत्वपूर्ण बात यह है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की अभी तक प्रशासन या स्वास्थ्य विभाग की ओर से पुष्टि नहीं की गई है। इसी प्रकार, संबंधित नर्स अथवा उनके प्रतिनिधियों का पक्ष भी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।

पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के अनुसार किसी भी आरोप को तब तक अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता, जब तक उसकी आधिकारिक जांच पूरी न हो जाए। इसलिए इस मामले को फिलहाल शिकायत और जांच की मांग के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

सरकारी अस्पतालों में जवाबदेही क्यों जरूरी?

सरकारी अस्पताल आम नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख केंद्र होते हैं। ऐसे में डॉक्टरों, नर्सों और अन्य कर्मचारियों की नियमित उपस्थिति मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

यदि किसी कर्मचारी की अनुपस्थिति या ड्यूटी व्यवस्था को लेकर शिकायत प्राप्त होती है, तो उसका निष्पक्ष परीक्षण प्रशासनिक व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक होता है। वहीं, बिना जांच किसी भी व्यक्ति को दोषी मानना भी उचित नहीं माना जाता।

जांच के बाद ही सामने आएगी वास्तविक स्थिति

फिलहाल पूरे मामले की निगाह जिला प्रशासन की संभावित कार्रवाई पर टिकी हुई है। यदि प्रशासन शिकायत का संज्ञान लेकर जांच के आदेश देता है, तो संबंधित अभिलेखों, उपस्थिति विवरण और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तथ्यों का सत्यापन किया जाएगा।

जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं। यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। वहीं, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो संबंधित पक्ष को भी राहत मिल सकती है।

बांदा जिला चिकित्सालय में तैनात नर्स की ड्यूटी को लेकर सामने आई शिकायत ने प्रशासनिक व्यवस्था पर कई सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, अभी तक यह मामला केवल शिकायत के स्तर पर है और किसी भी आरोप की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में निष्पक्ष जांच ही पूरे मामले की वास्तविकता सामने ला सकती है।

जब तक सक्षम प्राधिकारी अपनी जांच पूरी कर आधिकारिक निष्कर्ष जारी नहीं करते, तब तक इस मामले को आरोप और शिकायत के रूप में ही देखा जाना चाहिए। प्रशासन की आगामी कार्रवाई और जांच रिपोर्ट के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।

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