यूबीआई ऑफिसर्स एसोसिएशन चुनाव से जुड़ा मुकदमा खारिज, जानिए अदालत ने क्या कहा

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रिपोर्ट – पित्तेश्वर कुमार 

आजमगढ़: यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ऑफिसर्स एसोसिएशन ईस्टर्न यूपी के त्रैवार्षिक चुनाव को लेकर दाखिल मुकदमे को अदालत ने खारिज कर दिया है। चुनाव में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए पराजित प्रत्याशियों की ओर से यह मुकदमा दाखिल किया गया था। मामले की सुनवाई करते हुए फॉस्ट ट्रैक कोर्ट सीनियर डिवीजन के न्यायाधीश अतुल पाल ने मुकदमे को क्षेत्राधिकार और पोषणीयता के आधार पर निरस्त कर दिया।

मामला यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ऑफिसर्स एसोसिएशन के चुनाव से जुड़ा था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एसोसिएशन का ईस्टर्न यूपी क्षेत्र का त्रैवार्षिक चुनाव 18 जनवरी 2026 को भंवरनाथ में आयोजित हुआ था। चुनाव के बाद कुछ पराजित प्रत्याशियों ने प्रक्रिया में कथित अनियमितता का आरोप लगाते हुए अदालत का रुख किया और चुनाव को निरस्त करने की मांग की थी।

18 जनवरी को हुआ था एसोसिएशन का चुनाव

यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ऑफिसर्स एसोसिएशन ईस्टर्न यूपी के चुनाव में यूनियन बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय में प्रबंधक दीपक चौधरी को अध्यक्ष चुना गया था। इसी तरह क्षेत्रीय कार्यालय में वरिष्ठ प्रबंधक कौशलेंद्र कुमार को महासचिव और सिधारी शाखा के प्रबंधक विकास कुमार सिंह को उप महासचिव चुना गया था।

चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिणामों को लेकर कुछ पराजित प्रत्याशियों ने आपत्ति जताई। उनका आरोप था कि चुनाव में कथित तौर पर अनियमितताएं हुई हैं। इसके बाद उन्होंने दीवानी न्यायालय में मुकदमा दाखिल किया। मुकदमे में चुनाव में विजयी प्रत्याशियों के साथ-साथ चुनाव कमेटी को भी पक्षकार बनाया गया था।

इस मुकदमे के माध्यम से चुनाव प्रक्रिया को चुनौती देते हुए उसे निरस्त करने की मांग की गई थी। हालांकि, मामले की सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष की ओर से अदालत के समक्ष मुकदमे की पोषणीयता और न्यायालय के क्षेत्राधिकार को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई।

बैंक और विजयी प्रत्याशियों ने उठाया क्षेत्राधिकार का मुद्दा

मुकदमे की सुनवाई के दौरान विजयी प्रत्याशियों और यूनियन बैंक की ओर से यह तर्क रखा गया कि ट्रेड यूनियन से संबंधित चुनाव में कथित अनियमितताओं की सुनवाई का अधिकार सामान्य सिविल कोर्ट के पास नहीं है। उनके अनुसार, ऐसे मामलों के लिए निर्धारित वैधानिक व्यवस्था के तहत संबंधित ट्रिब्यूनल में कार्यवाही की जानी चाहिए।

इसी आधार पर प्रतिवादी पक्ष ने अदालत से मुकदमे को पोषणीय नहीं मानते हुए खारिज करने का आग्रह किया। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने मामले से जुड़े क्षेत्राधिकार और कानूनी प्रावधानों पर विचार किया।

इसके बाद अदालत ने पाया कि प्रस्तुत मुकदमा औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के प्रावधानों के तहत वर्जित है। परिणामस्वरूप अदालत ने मुकदमे को निरस्त कर दिया।

औद्योगिक संबंध संहिता में ट्रेड यूनियन से जुड़े प्रावधान

ट्रेड यूनियन से जुड़े मामलों के लिए औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 में प्रावधान किए गए हैं। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, यह संहिता ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926, औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 से जुड़े प्रावधानों को समेकित करती है।

संहिता में ट्रेड यूनियनों से संबंधित प्रावधानों के साथ-साथ औद्योगिक विवादों के निपटारे और ट्रेड यूनियन से जुड़े विभिन्न मामलों के लिए वैधानिक व्यवस्था का उल्लेख है। वहीं, ट्रेड यूनियन विवादों के संबंध में औद्योगिक ट्रिब्यूनल के समक्ष विवादों के निपटारे की व्यवस्था से जुड़े नियम भी बनाए गए हैं।

इसी कानूनी व्यवस्था का हवाला देते हुए इस मामले में प्रतिवादी पक्ष ने सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार पर सवाल उठाया था। अदालत ने दलीलों और संबंधित प्रावधानों पर विचार करने के बाद मुकदमे को आगे चलाने योग्य नहीं माना।

चुनाव परिणाम पर उठी आपत्ति अदालत तक पहुंची

दरअसल, किसी भी संगठन के चुनाव के बाद परिणाम को लेकर आपत्ति होने पर संबंधित पक्ष कानूनी प्रक्रिया का सहारा ले सकते हैं। इस मामले में भी पराजित प्रत्याशियों ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए अदालत में मुकदमा दाखिल किया था।

हालांकि, अदालत ने इस मामले में चुनाव के आरोपों या कथित अनियमितताओं की विस्तृत मेरिट पर फैसला देने के बजाय सबसे पहले यह देखा कि जिस अदालत में मुकदमा दाखिल किया गया है, उसे ऐसे मामले की सुनवाई का अधिकार है या नहीं। इसी बिंदु पर अदालत ने मुकदमे की पोषणीयता पर विचार किया।

इसके बाद न्यायालय ने क्षेत्राधिकार से जुड़ी आपत्ति को स्वीकार करते हुए मुकदमे को खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद फिलहाल सिविल कोर्ट में दाखिल चुनाव निरस्तीकरण संबंधी मुकदमा समाप्त हो गया है।

फैसले से क्या स्पष्ट हुआ?

इस मामले में अदालत के फैसले का मुख्य आधार मुकदमे की पोषणीयता और क्षेत्राधिकार रहा। यानी अदालत ने यह निर्धारित किया कि संबंधित विवाद की सुनवाई किस वैधानिक मंच पर की जा सकती है। प्रतिवादी पक्ष की ओर से इसी आधार पर सिविल कोर्ट में मुकदमा चलाने पर आपत्ति की गई थी।

वहीं, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ट्रेड यूनियन और औद्योगिक विवादों से संबंधित कानूनी ढांचे को समेकित करती है।

इस प्रकार, आजमगढ़ में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ऑफिसर्स एसोसिएशन के चुनाव को लेकर दाखिल मुकदमे में अदालत ने क्षेत्राधिकार और पोषणीयता के प्रश्न को महत्वपूर्ण माना। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने मुकदमे को निरस्त करने का आदेश दिया।

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