नारियल की भूसी से उद्यम तक: कॉयर रेशा ग्रामीण भारत में बदल रहा रोजगार की तस्वीर,जानिए कैसे हुई महिलाएं सशक्त,,,

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रिपोर्ट- अमित सिंह यादव

नई दिल्लीः नारियल की भूसी, जिसे लंबे समय तक सामान्य कृषि अपशिष्ट के तौर पर देखा जाता था, अब ग्रामीण भारत में उद्यमिता, रोजगार और महिला सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है। नारियल से मिलने वाला प्राकृतिक रेशा यानी कॉयर आज चटाई और रस्सी जैसे पारंपरिक उत्पादों से आगे बढ़कर जैव-उर्वरक, हस्तशिल्प, बागवानी सामग्री और पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग जैसे कई मूल्यवर्धित उत्पादों का आधार बन चुका है।

दरअसल, भारत के नारियल उत्पादक क्षेत्रों में हजारों ग्रामीण कारीगर और उद्यमी कॉयर को आय के स्थायी स्रोत में बदल रहे हैं। खास बात यह है कि इस बदलाव में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। कौशल विकास, तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार से जुड़ाव मिलने के कारण कॉयर क्षेत्र अब पारंपरिक काम से आगे बढ़कर आधुनिक ग्रामीण कारोबार का रूप ले रहा है।

इस परिवर्तन को बढ़ावा देने में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) के साथ कॉयर बोर्ड और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) जैसी योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।

आंध्र प्रदेश में अल्लम गौथमी ने 120 महिलाओं को दिया हुनर

आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कडियाम की अल्लम गौथमी की कहानी इस बदलाव की एक उल्लेखनीय मिसाल है। उन्होंने नारियल के रेशे और कॉयर अपशिष्ट को कारोबार के अवसर में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया।

गौथमी ने धवलेश्वरम स्थित कॉयर बोर्ड प्रशिक्षण केंद्र से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद वर्ष 2024-25 में करीब 10 लाख रुपये की परियोजना लागत से उन्होंने एडिगो कॉयर प्रोडक्ट्स की स्थापना की। उद्यम के लिए उन्हें लगभग 6.50 लाख रुपये का बैंक ऋण और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत सहायता मिली।

उनकी इकाई में पर्यावरण-अनुकूल दरवाजे की चटाइयां, रस्सियां, सजावटी गुड़िया और विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प तैयार किए जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप कारोबार ने स्थानीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस उद्यम ने करीब 35 लाख रुपये का वार्षिक कारोबार और लगभग 10 लाख रुपये का लाभ अर्जित किया है। वहीं, छह महिलाओं को प्रत्यक्ष रोजगार भी मिला है।

हालांकि, गौथमी की उपलब्धि केवल उनके कारोबार तक सीमित नहीं है। उन्होंने लगभग 120 महिलाओं को कॉयर चटाई बुनाई, रस्सी निर्माण और हस्तशिल्प तैयार करने का प्रशिक्षण दिया है। इससे इन महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर आजीविका के नए अवसर पैदा हुए हैं।

इसके अलावा, उनकी सफलता से आसपास के इलाकों में लगभग पांच अतिरिक्त कॉयर इकाइयां स्थापित करने की प्रेरणा मिली। इनमें से कई इकाइयों को PMEGP के माध्यम से सहायता प्राप्त हुई। इस तरह एक स्थानीय उद्यम का प्रभाव आसपास के ग्रामीण आर्थिक तंत्र तक पहुंचा।

केरल में कॉयर पिथ से तैयार हो रहा जैव-उर्वरक

कॉयर क्षेत्र में सिर्फ रेशा ही नहीं, बल्कि कॉयर पिथ भी नए कारोबार का आधार बन रहा है। केरल के कोझिकोड में पी. सुरेंद्रन ने नवंबर 2024 में संपूर्ण प्लस एग्रो फर्टिलाइजर एंटरप्राइजेज (SAFE) की स्थापना की।

उन्होंने कन्नूर स्थित कॉयर बोर्ड और कलावूर स्थित केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान (CCRI) से प्रशिक्षण तथा तकनीकी सहायता प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने कॉयर पिथ से पर्यावरण-अनुकूल जैव-उर्वरक तैयार करने का काम शुरू किया।

कॉयर पिथ से तैयार उत्पाद कृषि के लिए उपयोगी हो सकते हैं और मिट्टी की उर्वरता तथा नमी बनाए रखने में सहायता करते हैं। इस प्रकार, कॉयर प्रसंस्करण से निकलने वाले पदार्थ का भी आर्थिक उपयोग संभव हो रहा है।

सिर्फ एक वर्ष में सुरेंद्रन के उद्यम ने 500 से अधिक ग्राहकों का आधार तैयार किया। इस दौरान 20 टन से अधिक जैव-उर्वरक की बिक्री हुई और करीब 13 लाख रुपये का कारोबार दर्ज किया गया। वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग चार लाख रुपये का लाभ हुआ।

इसके साथ ही इस इकाई में पांच कामगारों को रोजगार मिला, जिनमें दो महिलाएं शामिल हैं। यह उदाहरण बताता है कि उचित प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग मिलने पर कॉयर अपशिष्ट भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मूल्य पैदा कर सकता है।

भारत में कॉयर उद्योग का लंबा इतिहास

भारत में कॉयर उद्योग की जड़ें काफी पुरानी हैं। देश में संगठित कॉयर उत्पादन की शुरुआत वर्ष 1859 में केरल के अलाप्पुझा में पहली कॉयर फैक्ट्री की स्थापना से मानी जाती है। इसके बाद धीरे-धीरे कॉयर उद्योग देश के प्रमुख नारियल उत्पादक क्षेत्रों में फैलता गया।

आज भारत दुनिया के प्रमुख कॉयर उत्पादक देशों में शामिल है और वैश्विक कॉयर रेशा उत्पादन में देश की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक बताई जाती है।

इस उद्योग की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक महिलाओं की भागीदारी है। रेशा निकालने और उसकी कताई जैसे कार्यों में लगे लोगों में लगभग 80 प्रतिशत महिलाएं हैं। इसलिए कॉयर क्षेत्र ग्रामीण महिलाओं की आय और आर्थिक भागीदारी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इसके अलावा, कॉयर की मूल्य श्रृंखला में नारियल किसान, कामगार, महिला कारीगर, सहकारी समितियां, छोटे उद्यमी, निर्माता और निर्यातक जुड़े हुए हैं। इस कारण कॉयर उद्योग का प्रभाव केवल एक उत्पाद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कई स्तरों पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जोड़ता है।

चटाई और रस्सी से आगे बढ़ा कॉयर का कारोबार

कॉयर की उपयोगिता पारंपरिक चटाई और रस्सी तक सीमित नहीं है। प्रसंस्करण, डिजाइन और तकनीकी नवाचार के जरिए इससे कई प्रकार के मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।

इनमें प्रमुख रूप से चटाइयां, दरवाजे की चटाइयां, रस्सियां, सूत, ब्रश, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, सजावटी सामान, हस्तशिल्प और बागवानी उत्पाद शामिल हैं।

इसके अलावा, पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की बढ़ती मांग के बीच कॉयर आधारित पैकेजिंग समाधान भी नई संभावनाएं पैदा कर रहे हैं। इससे ग्रामीण उद्यमियों को स्थानीय कच्चे माल से नए बाजार तलाशने का अवसर मिल रहा है।

कॉयर बोर्ड और सरकारी सहायता से बढ़ रहे अवसर

कॉयर बोर्ड MSME मंत्रालय के अधीन काम करने वाला वैधानिक निकाय है। इसका उद्देश्य कॉयर क्षेत्र में कौशल विकास, तकनीकी उन्नयन, अनुसंधान, बाजार संवर्धन, निर्यात और कामगार कल्याण को बढ़ावा देना है।कॉयर विकास योजना के अंतर्गत तकनीक और अनुसंधान, कौशल विकास, महिला प्रशिक्षण, घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार संवर्धन, उद्योग विकास और कामगार कल्याण जैसे क्षेत्रों में सहायता दी जाती है।

दरअसल, प्रशिक्षण से लेकर बाजार तक सहायता मिलने पर छोटे उद्यमियों के लिए कारोबार शुरू करना और उसे आगे बढ़ाना आसान हो सकता है। प्रदर्शनियों, मेलों, शोरूम और निर्यात संवर्धन गतिविधियों के जरिए कॉयर उत्पादकों को नए ग्राहकों और बाजारों से जुड़ने का अवसर मिलता है।

तकनीकी नवाचार से कॉयर को मिल रही नई पहचान

कॉयर क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार भी लगातार नए रास्ते खोल रहे हैं। केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान ने एचडीपीई प्लास्टिक कपों के विकल्प के तौर पर पर्यावरण-अनुकूल कॉयर रेल व्हील एक्सल पैकेजिंग कप विकसित किए हैं।

यह पहल बताती है कि प्राकृतिक रेशे का उपयोग केवल पारंपरिक घरेलू उत्पादों तक सीमित नहीं है। सही तकनीक और अनुसंधान के जरिए कॉयर को आधुनिक औद्योगिक जरूरतों के अनुरूप भी विकसित किया जा सकता है।

ऐसे नवाचार एक ओर ग्रामीण उद्योगों के लिए नए बाजार तैयार कर सकते हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन को बढ़ावा देने में भी मददगार हो सकते हैं।

ग्रामीण समृद्धि का माध्यम बन रहा कॉयर

अल्लम गौथमी और पी. सुरेंद्रन की सफलता की कहानियां दिखाती हैं कि स्थानीय संसाधनों को सही प्रशिक्षण, तकनीक, वित्त और बाजार से जोड़कर किस तरह नए व्यवसाय खड़े किए जा सकते हैं।

कॉयर की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसका कच्चा माल नारियल उत्पादक क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध है। इसलिए इसके प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन से ग्रामीण इलाकों में ही रोजगार और कारोबार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

वहीं, महिलाओं की बड़ी भागीदारी इसे सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का प्रभावी माध्यम बनाती है। आने वाले समय में डिजाइन, तकनीक, ई-कॉमर्स और निर्यात बाजार से बेहतर जुड़ाव कॉयर आधारित उद्यमों की संभावनाओं को और बढ़ा सकता है।

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