विश्व सुसाइड दिवस पर कानपुर में जागरूकता कार्यक्रम, मानसिक स्वास्थ्य-जीवन के प्रति सकारात्मक सोच का दिया संदेश

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रिपोर्ट: सोनू शर्मा 

कानपुर: विश्व सुसाइड दिवस के अवसर पर कानपुर में मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या की रोकथाम को लेकर जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील बनाने, तनावपूर्ण परिस्थितियों में सकारात्मक सोच विकसित करने तथा जरूरत के समय उचित सहायता लेने के लिए प्रेरित करना रहा। कार्यक्रम का शुभारंभ प्राचार्य डॉ. संजय काला, विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय चौधरी और डॉ. गणेश शंकर ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य भी शारीरिक स्वास्थ्य की तरह ही महत्वपूर्ण है। बदलती जीवनशैली, पढ़ाई और रोजगार का दबाव, पारिवारिक परिस्थितियां, सामाजिक अपेक्षाएं तथा व्यक्तिगत समस्याएं कई बार व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में जरूरी है कि मानसिक तनाव को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते उसके बारे में बात की जाए और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों की मदद ली जाए।

मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता जरूरी

विश्व सुसाइड दिवस जैसे अवसरों का प्रमुख उद्देश्य समाज में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर खुलकर संवाद को बढ़ावा देना है। अक्सर मानसिक तनाव या भावनात्मक परेशानी से जूझ रहा व्यक्ति अपनी समस्या किसी के साथ साझा नहीं कर पाता। इसके पीछे सामाजिक झिझक, परिवार और समाज की प्रतिक्रिया का डर अथवा मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को लेकर जागरूकता की कमी प्रमुख कारण हो सकते हैं।

इसीलिए विशेषज्ञों का मानना है कि परिवार, शिक्षण संस्थान और कार्यस्थल सभी को ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए, जहां व्यक्ति बिना किसी संकोच के अपनी परेशानियों के बारे में बात कर सके। इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को कमजोरी के रूप में देखने की सोच में भी बदलाव जरूरी है।

कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई देने पर उसके प्रति संवेदनशील रवैया अपनाया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति लगातार तनाव, अकेलेपन, निराशा या भावनात्मक परेशानी की बात करता है तो उसकी बात को गंभीरता से सुनना चाहिए और जरूरत पड़ने पर परिवार के सदस्यों या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से संपर्क करना चाहिए।

समय पर सहायता से मिल सकता है बेहतर सहयोग

मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित किसी भी परेशानी में समय पर सहायता लेना महत्वपूर्ण है। कई बार व्यक्ति अपनी समस्या को छोटा समझकर उसे लंबे समय तक नजरअंदाज करता रहता है। परिणामस्वरूप तनाव बढ़ सकता है और दैनिक जीवन प्रभावित होने लगता है। इसलिए शुरुआती स्तर पर ही समस्या की पहचान करना और उचित सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।

वक्ताओं ने यह भी संदेश दिया कि किसी परेशान व्यक्ति को केवल सलाह देने के बजाय पहले उसकी बात ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए। सहानुभूति और सहयोग का व्यवहार उसके लिए महत्वपूर्ण सहारा बन सकता है। परिवार और मित्रों की सकारात्मक भूमिका मानसिक रूप से परेशान व्यक्ति को अकेलेपन की भावना से बाहर आने में मदद कर सकती है।

इसके अलावा, यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि वह अपनी भावनाओं या मानसिक तनाव को स्वयं संभाल नहीं पा रहा है, तो उसे योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करने में संकोच नहीं करना चाहिए। विशेषज्ञ की सलाह समस्या को समझने और उससे निपटने की बेहतर दिशा तय करने में सहायता कर सकती है।

युवाओं और छात्रों के लिए विशेष संदेश

वर्तमान समय में युवाओं और विद्यार्थियों के बीच पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं, करियर और भविष्य को लेकर दबाव बढ़ता दिखाई देता है। ऐसे में शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। विद्यार्थियों को केवल अकादमिक सफलता के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि विद्यार्थियों को अपनी समस्याओं को छिपाने के बजाय माता-पिता, शिक्षक, मित्र या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करना चाहिए। पढ़ाई या करियर में असफलता जीवन का अंतिम परिणाम नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थितियां अलग होती हैं और कठिन दौर के बाद बेहतर अवसर भी सामने आ सकते हैं।

इसी तरह अभिभावकों को भी बच्चों से संवाद बनाए रखने की आवश्यकता है। बच्चों की उपलब्धियों की तुलना दूसरों से करने के बजाय उनके प्रयासों और भावनाओं को समझना अधिक उपयोगी हो सकता है। सकारात्मक संवाद बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करता है।

समाज की सामूहिक जिम्मेदारी

मानसिक स्वास्थ्य केवल किसी एक व्यक्ति या परिवार की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए पूरे समाज को संवेदनशील होने की आवश्यकता है। यदि किसी व्यक्ति को मानसिक परेशानी है तो उसके साथ भेदभाव करने या उसकी भावनाओं को हल्के में लेने के बजाय उसे सहयोग देना चाहिए।

इसी क्रम में स्वास्थ्य संस्थानों और शिक्षण संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। नियमित जागरूकता कार्यक्रमों, परामर्श सेवाओं और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी के माध्यम से लोगों को समय पर सहायता लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

विश्व सुसाइड दिवस का संदेश भी यही है कि जीवन से जुड़ी कठिन परिस्थितियों के दौरान व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। उसके साथ संवाद बनाए रखना, उसकी बात सुनना और आवश्यक सहायता तक पहुंच सुनिश्चित करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी हो सकती है।

सकारात्मक सोच और संवाद पर जोर

कार्यक्रम में सकारात्मक सोच, आपसी संवाद और भावनात्मक सहयोग के महत्व पर भी चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि जीवन में कठिन परिस्थितियां आ सकती हैं, लेकिन उनसे निपटने के लिए सहायता और मार्गदर्शन उपलब्ध है। इसलिए लोगों को अपनी समस्याओं को लेकर चुप रहने के बजाय भरोसेमंद लोगों से बातचीत करनी चाहिए।

साथ ही, समाज में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मिथकों को दूर करना भी जरूरी है। मानसिक परेशानी किसी व्यक्ति के चरित्र या क्षमता का प्रमाण नहीं होती। जैसे शारीरिक बीमारी के उपचार के लिए डॉक्टर से सलाह ली जाती है, उसी प्रकार मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी में भी प्रशिक्षित विशेषज्ञ से परामर्श लेना सामान्य और उचित कदम है।

जागरूकता कार्यक्रमों की जरूरत

कानपुर में आयोजित इस कार्यक्रम के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या की रोकथाम जैसे महत्वपूर्ण विषय पर जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया। दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए प्राचार्य डॉ. संजय काला, विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय चौधरी और डॉ. गणेश शंकर ने इस विषय की गंभीरता और सामाजिक महत्व को रेखांकित किया।

ऐसे कार्यक्रमों की निरंतरता इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वर्षभर परिवारों, विद्यालयों, कॉलेजों, चिकित्सा संस्थानों और सामाजिक संगठनों के स्तर पर संवाद को बढ़ावा दिया जा सकता है।

अंततः विश्व सुसाइड दिवस का संदेश समाज को यह याद दिलाता है कि मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी व्यक्ति की परेशानी को सुनना, उसे समझना और जरूरत के समय सही सहायता उपलब्ध कराना एक सकारात्मक सामाजिक पहल हो सकती है। कानपुर में आयोजित जागरूकता कार्यक्रम ने भी इसी दिशा में संवाद और संवेदनशीलता बढ़ाने का संदेश दिया।

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