सहारनपुर मस्जिद के नीचे मिला 250 साल पुराना कुआं, 1909 की ईंटों ने बढ़ाई ऐतिहासिक पड़ताल
Digital UP News Desk
सहारनपुर: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद सामने आई एक कुएंनुमा संरचना ने पूरे मामले को नई दिशा दे दी है। करीब 20 फीट नीचे मिली इस संरचना की पुरातत्व विभाग की टीम ने जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक निरीक्षण के आधार पर इसे उत्तर मध्यकालीन दौर से जुड़ा हुआ माना जा रहा है। हालांकि, इसकी वास्तविक उम्र, निर्माण का उद्देश्य और ऐतिहासिक महत्व क्या है, इसे लेकर अभी अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
पुरातत्व विभाग के सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव के अनुसार, संरचना की निर्माण शैली और इसमें इस्तेमाल की गई सामग्री को देखते हुए इसके करीब 200 से 250 वर्ष पुराना होने की संभावना जताई जा रही है। वहीं, संरचना के अंदर काफी मात्रा में मलबा भरा होने के कारण इसके स्वरूप और मूल उपयोग की विस्तृत जानकारी फिलहाल स्पष्ट नहीं हो सकी है।
मस्जिद ध्वस्तीकरण के बाद सामने आई संरचना
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद मलबे के बीच पुराने निर्माण अवशेष दिखाई दिए। इसी दौरान करीब 20 फीट गहराई में एक कुएं जैसी संरचना सामने आई। इसके बाद प्रशासन और पुरातत्व विभाग की सक्रियता बढ़ गई।
लखनऊ से पहुंची पुरातत्व विभाग की टीम ने सोमवार को मौके का निरीक्षण किया। टीम ने संरचना की बनावट, इस्तेमाल की गई ईंटों और निर्माण सामग्री का जायजा लिया। इसके अलावा मंगलवार को भी जांच जारी रहने की बात कही गई है।
दरअसल, यह संरचना सामान्य कुएं से अलग निर्माण शैली वाली बताई जा रही है। इसलिए पुरातत्व विभाग इसके हर पहलू का अध्ययन कर रहा है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इसका निर्माण किस उद्देश्य से किया गया था और उस समय इसका इस्तेमाल किस तरह होता था।
करीब 20 फीट गहराई में मिली संरचना
सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव के मुताबिक, जमीन की सतह से यह संरचना करीब 20 फीट नीचे स्थित है। इसका व्यास लगभग तीन फीट बताया गया है। शुरुआती निरीक्षण में इसके निर्माण में लखौरी ईंटों के इस्तेमाल के संकेत मिले हैं।
बताया गया है कि इन ईंटों का आकार लगभग 20 × 10 × 5 सेंटीमीटर है। वहीं, संरचना के अंदर करीब तीन फीट की गहराई पर मोल्डेड ईंटनुमा हिस्सा भी दिखाई दिया है। इन ईंटों को काटकर गोलाकार आकार दिया गया था।
इसके साथ ही निर्माण में चूने के प्लास्टर के इस्तेमाल के संकेत भी मिले हैं। पुरातत्व विभाग इन सभी विशेषताओं को संरचना की संभावित उम्र निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण मान रहा है।
हालांकि, अभी कुएं के भीतर मलबा जमा है। इसलिए संरचना की पूरी बनावट सामने नहीं आ सकी है। ऐसे में पुरातत्व विभाग फिलहाल किसी निश्चित ऐतिहासिक निष्कर्ष पर पहुंचने से बच रहा है।
1909 अंकित ईंटों ने बढ़ाई उत्सुकता
कुएंनुमा संरचना के साथ-साथ ध्वस्तीकरण स्थल से मिली कुछ पुरानी ईंटों ने भी लोगों और विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है। मलबे में ऐसी ईंटें मिली हैं, जिन पर 1909 का निर्माण वर्ष अंकित बताया जा रहा है।
इन ईंटों के सामने आने के बाद मस्जिद की पुरानी संरचना और उसके निर्माण काल को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। ध्वस्तीकरण के बाद मौके पर बिखरे मलबे में मौजूद ईंटों की बनावट और उन पर दर्ज वर्ष को स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि, किसी भवन के इतिहास का निर्धारण केवल किसी एक ईंट पर दर्ज वर्ष के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए निर्माण शैली, अभिलेखीय दस्तावेज, स्थल की पुरानी तस्वीरें, नक्शे और अन्य ऐतिहासिक साक्ष्यों का अध्ययन जरूरी होता है। इसलिए पुरातत्व विभाग की विस्तृत जांच इस मामले में अहम मानी जा रही है।
पुरातत्व विभाग करेगा विस्तृत जांच
पुरातत्व विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सहारनपुर का इतिहास काफी समृद्ध रहा है। जिले के अलग-अलग हिस्सों में मानवीय संस्कृति और पुराने निर्माणों से जुड़े साक्ष्य समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
इसी वजह से कलेक्ट्रेट परिसर में मिली संरचना को भी सावधानीपूर्वक जांचा जा रहा है। विशेषज्ञ इसकी निर्माण तकनीक, ईंटों के आकार, चूने के प्रयोग और संरचना की बनावट जैसे पहलुओं का अध्ययन करेंगे।
इसके अलावा, यदि मलबे को हटाने के बाद संरचना का अधिक हिस्सा सामने आता है तो इसके आधार पर इसके वास्तविक स्वरूप को समझने में मदद मिल सकती है। जरूरत पड़ने पर अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्थानीय अभिलेखों से भी जानकारी जुटाई जा सकती है।
राजनीतिक विवाद के बीच सामने आया पुरातात्विक पहलू
सहारनपुर में मस्जिद के ध्वस्तीकरण को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज रही है। समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। मुजफ्फरनगर के सपा सांसद हरेंद्र मलिक के हाउस अरेस्ट किए जाने के बाद ध्वस्त मस्जिद के स्थल तक पहुंचने की बात सामने आई। वहीं, सरधना विधायक अतुल प्रधान ने भी सहारनपुर पहुंचने की कोशिश की, लेकिन मेरठ में रोके जाने को लेकर राजनीतिक माहौल गरमाया रहा।
ऐसे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच अब ध्वस्तीकरण स्थल से मिली पुरानी संरचना ने मामले में एक नया पहलू जोड़ दिया है। हालांकि, राजनीतिक दावों और पुरातात्विक जांच को अलग-अलग संदर्भों में देखा जाना जरूरी है।
फिलहाल पुरातत्व विभाग का मुख्य ध्यान संरचना की ऐतिहासिकता और निर्माण संबंधी तथ्यों को समझने पर है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले इसके इतिहास को लेकर किसी तरह का अंतिम दावा करना उचित नहीं होगा।
जांच के बाद ही सामने आएगी पूरी तस्वीर
कुएंनुमा संरचना के मिलने के बाद स्थानीय लोगों में भी इसे लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। करीब 20 फीट नीचे स्थित इस संरचना में लखौरी ईंटों और चूने के इस्तेमाल के शुरुआती संकेत मिले हैं। साथ ही 1909 अंकित ईंटों के मिलने से स्थल के पुराने निर्माण इतिहास को लेकर भी सवाल उठे हैं।
फिर भी, इन सभी तथ्यों को जोड़कर किसी ठोस ऐतिहासिक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विशेषज्ञों की रिपोर्ट का इंतजार करना होगा। पुरातत्व विभाग की जांच से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि संरचना वास्तव में कितनी पुरानी है, इसका निर्माण किस उद्देश्य से किया गया था और क्या इसका संबंध आसपास मौजूद पुराने निर्माणों से रहा है।
इस बीच, लखनऊ से पहुंची टीम के निरीक्षण के बाद आगे की जांच पर नजर बनी हुई है। आने वाले दिनों में मलबे की स्थिति, संरचना की बनावट और निर्माण सामग्री के विस्तृत अध्ययन से इस मामले में और तथ्य सामने आने की उम्मीद है।
1909 अंकित ईंटों ने मामले को पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया है
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद मिली करीब 20 फीट गहरी कुएंनुमा संरचना और 1909 अंकित ईंटों ने मामले को पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया है। प्रारंभिक तौर पर संरचना के 200 से 250 वर्ष पुराना होने की संभावना जताई गई है, लेकिन अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है।

