सहारनपुर मस्जिद पर बुलडोजर एक्शन से सियासी हलचल, मायावती ने जताई नाराजगी, बोलीं समाधान के उपाय जरूरी

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Digital UP News Desk

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर स्थित करीब 150 साल पुरानी बताई जा रही मस्जिद पर प्रशासन की कार्रवाई के बाद प्रदेश की सियासत गरमा गई है। कोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन द्वारा मस्जिद को हटाए जाने के मामले में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बाद अब बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सरकार से ऐसे कदमों से बचने की अपील करते हुए कहा कि विवादित धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में कानून का पालन करते हुए समाधान के दूसरे रास्ते तलाशे जाने चाहिए।

मायावती ने शनिवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सिलसिलेवार पोस्ट के जरिए सहारनपुर की घटना पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में मस्जिदों को अवैध बताकर जल्दबाजी में ध्वस्त किए जाने की कार्रवाई उचित नहीं है। साथ ही उन्होंने संवैधानिक व्यवस्था का हवाला देते हुए सभी धर्मों और उनके धार्मिक स्थलों के प्रति समान सम्मान और सुरक्षा की जरूरत पर जोर दिया।

मायावती ने सरकार से की कार्रवाई पर पुनर्विचार की अपील

बसपा सुप्रीमो ने अपनी पोस्ट में कहा कि सहारनपुर की मस्जिद समेत प्रदेश में धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में सरकारी कार्रवाई को लेकर लोगों में चिंता पैदा हो रही है। उनके मुताबिक, संवैधानिक व्यवस्था में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी धर्मों के लोगों और उनके धार्मिक स्थलों के साथ समान व्यवहार करे।

मायावती ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता के साथ कदम उठाए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में किसी भी तरह की जल्दबाजी से सामाजिक वातावरण प्रभावित हो सकता है। इसलिए सरकार को नकारात्मक परिस्थितियों से बचने के लिए कार्रवाई पर रोक लगाने और समाधान के वैकल्पिक उपायों पर विचार करना चाहिए।

इसके अलावा, बसपा प्रमुख ने कानून के राज को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करते समय नियम-कानून का पूरी तरह पालन होना चाहिए। उन्होंने मकान ध्वस्तीकरण जैसी कार्रवाई के संदर्भ में भी सरकार और न्यायपालिका से उचित ध्यान देने की अपील की।

बुलडोजर कार्रवाई के बाद बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस मामले में करीब डेढ़ साल तक कानूनी प्रक्रिया चली। इसके बाद अदालत ने संबंधित निर्माण को अवैध करार दिया। अदालत के आदेश के बाद जिला प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी में शनिवार तड़के कार्रवाई की गई।

सुबह के समय हुई इस कार्रवाई के बाद राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए। वहीं, अब मायावती की प्रतिक्रिया के बाद यह मामला राजनीतिक रूप से और महत्वपूर्ण हो गया है।

हालांकि, प्रशासन की कार्रवाई को अदालत के आदेश से जोड़कर देखा जा रहा है। ऐसे में पूरे मामले में न्यायिक प्रक्रिया, प्रशासनिक कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं अलग-अलग पहलू हैं। इसलिए इस घटनाक्रम को समझने के लिए संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक बयानों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

इमरान मसूद ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही

सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी मस्जिद पर हुई कार्रवाई के बाद प्रतिक्रिया दी। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने रात में सोशल मीडिया के जरिए लाइव आकर इस मामले को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की बात कही।

इमरान मसूद ने मुस्लिम समुदाय से शांति बनाए रखने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि किसी भी तरह की प्रतिक्रिया कानून के दायरे में रहकर होनी चाहिए। इस तरह कांग्रेस की ओर से भी मामले को लेकर कानूनी रास्ता अपनाने की बात सामने आई है।

वहीं, प्रशासन की कार्रवाई के बाद क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गईं। विभिन्न दलों के नेताओं ने अपने-अपने स्तर पर इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है।

इकरा हसन को हाउस अरेस्ट किए जाने पर भी सवाल

इस मामले में कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन का नाम भी चर्चा में रहा। रिपोर्ट के अनुसार, वह सहारनपुर पहुंचकर स्थानीय अधिकारियों से मुलाकात करना चाहती थीं। हालांकि, पुलिस ने उन्हें देर रात से ही हाउस अरेस्ट कर लिया।

इकरा हसन ने इस पर नाराजगी जताते हुए सवाल उठाया कि क्या जनता से जुड़े मुद्दे पर अधिकारियों से मिलना अब अपराध हो गया है। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधि को रोकने से जनता की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।

सपा सांसद की ओर से इस कार्रवाई का विरोध किए जाने के बाद समाजवादी पार्टी की तरफ से भी मामले को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ा है। इसके साथ ही कांग्रेस और बसपा की प्रतिक्रियाओं ने इस घटनाक्रम को प्रदेश की राजनीति में प्रमुख मुद्दा बना दिया है।

धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता पर जोर

सहारनपुर की घटना के बाद एक बार फिर धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर बहस तेज हो गई है। ऐसे मामलों में जहां एक तरफ सरकारी जमीन, निर्माण की वैधता और न्यायालय के आदेश जैसे कानूनी पहलू महत्वपूर्ण होते हैं, वहीं दूसरी तरफ धार्मिक भावनाओं और सामाजिक सौहार्द का विषय भी जुड़ा होता है।

इसी वजह से राजनीतिक दलों की ओर से सरकार से संयम बरतने की अपील की जा रही है। मायावती ने भी अपने बयान में इसी पहलू को प्रमुखता दी। उन्होंने सरकार के साथ-साथ न्यायपालिका से भी ऐसे मामलों पर उचित ध्यान देने की अपील की।

बसपा प्रमुख ने लोगों से भी सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाए रखने का आग्रह किया। उनका कहना है कि किसी भी विवाद का समाधान कानून और संवैधानिक व्यवस्था के दायरे में होना चाहिए।

कानून और सामाजिक सौहार्द के बीच संतुलन की चुनौती

धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद अक्सर संवेदनशील होते हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने कानून का पालन कराने के साथ-साथ सामाजिक शांति बनाए रखने की भी जिम्मेदारी होती है। वहीं, राजनीतिक दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उनके बयानों का व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

सहारनपुर मामले में भी यही स्थिति दिखाई दे रही है। अदालत के आदेश के बाद प्रशासन ने कार्रवाई की, जबकि विपक्षी दलों ने कार्रवाई के तरीके और समय को लेकर सवाल उठाए हैं। इसलिए आने वाले समय में इस मामले में कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं।

फिलहाल, मायावती की प्रतिक्रिया ने इस पूरे विवाद को एक नया राजनीतिक आयाम दिया है। बसपा सुप्रीमो ने जहां सरकार से ऐसे मामलों में वैकल्पिक समाधान तलाशने की अपील की, वहीं जनता से शांति और सौहार्द बनाए रखने का आग्रह भी किया।

आगे क्या होगा?

सहारनपुर मस्जिद मामले में अब सबकी नजर आगे होने वाली कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक कदमों पर है। कांग्रेस की ओर से न्यायालय जाने की बात कही गई है, जबकि समाजवादी पार्टी भी मामले को लेकर सवाल उठा रही है। दूसरी तरफ, बसपा ने सरकार से इस तरह की कार्रवाई के संबंध में व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की मांग की है।

ऐसे में आने वाले दिनों में यह मामला उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय बना रह सकता है। हालांकि, अंतिम स्थिति न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक रुख से ही स्पष्ट होगी।

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