बिजनौर में गुलदार का खौफ, सदरूदीन गांव में पिंजरे में कैद हुआ तेंदुआ, ग्रामीणों में दहशत बरकरार
रिपोर्ट-ताविश मिर्जा
बिजनौर: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में गुलदार की मौजूदगी ने ग्रामीण इलाकों में चिंता बढ़ा दी है। जंगल से निकलकर रिहायशी क्षेत्रों के आसपास गुलदार की आहट लगातार सामने आने के कारण कई गांवों के लोग सतर्क नजर आ रहे हैं। इसी बीच थाना नहटौर क्षेत्र के सदरूदीन गांव में लगाए गए पिंजरे में एक गुलदार के फंसने की जानकारी सामने आई है। गुलदार के पिंजरे में कैद होने के बाद भी ग्रामीणों की चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, क्योंकि आसपास के इलाकों में अभी भी इसकी मौजूदगी को लेकर आशंका बनी हुई है।
ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कुछ समय से जंगल से सटे गांवों में गुलदार की गतिविधियां बढ़ी हैं। शाम ढलने के बाद लोग खेतों की ओर जाने से बच रहे हैं। वहीं, ग्रामीण अपने बच्चों और मवेशियों की सुरक्षा को लेकर भी विशेष सावधानी बरत रहे हैं। गुलदार के लगातार दिखाई देने की खबरों ने गांवों में सतर्कता बढ़ा दी है।
सदरूदीन गांव में पिंजरे में फंसा गुलदार
थाना नहटौर क्षेत्र के सदरूदीन गांव में वन विभाग की ओर से लगाए गए पिंजरे में गुलदार के फंसने की सूचना सामने आई है। गुलदार के पिंजरे में कैद होने के बाद मौके पर ग्रामीणों की भीड़ जुट गई। इसके बाद वन विभाग की टीम ने स्थिति पर नजर रखी और गुलदार को सुरक्षित तरीके से कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू की।
हालांकि, एक गुलदार के पकड़े जाने से ग्रामीणों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन इलाके में मौजूद दूसरे गुलदारों को लेकर चिंता बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल और खेतों के बीच स्थित गांवों में अक्सर गुलदार की गतिविधियां देखने को मिलती हैं। ऐसे में केवल एक गुलदार के पकड़े जाने से समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं माना जा सकता।
कई गांवों में गुलदार की मौजूदगी का खतरा
बिजनौर का बड़ा हिस्सा जंगल और कृषि क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। ऐसे में वन्यजीवों का रिहायशी इलाकों के करीब पहुंचना ग्रामीणों के लिए चिंता का विषय बन जाता है। गुलदार की आहट जंगल से निकलकर खेतों और गांवों तक पहुंचने की वजह से ग्रामीणों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ रही है।
ग्रामीणों के मुताबिक, खेतों में काम करने वाले लोगों को कई बार गुलदार की मौजूदगी का एहसास हुआ है। खासकर सुबह और शाम के समय खेतों तथा जंगल के आसपास गतिविधियां बढ़ने की बात कही जा रही है। इसके चलते लोग अकेले खेतों में जाने से बच रहे हैं।
इसके अलावा, पशुपालकों के लिए भी स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। मवेशियों को खुले में छोड़ने के बजाय लोग उन्हें सुरक्षित स्थानों पर रखने को प्राथमिकता दे रहे हैं। ग्रामीणों की मांग है कि वन विभाग संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ाए और गुलदारों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखे।
ग्रामीणों में दहशत का माहौल
गुलदार के लगातार दिखाई देने की खबरों के कारण गांवों में दहशत का माहौल बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें हर समय अपने परिवार और पशुओं की सुरक्षा की चिंता रहती है। रात के समय गांवों में लोग अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से बच रहे हैं।
वहीं, खेतों में जाने वाले किसानों को भी समूह में जाने की सलाह दी जा रही है। ग्रामीणों का मानना है कि वन विभाग को गांवों के आसपास नियमित गश्त करनी चाहिए, ताकि गुलदार की गतिविधियों का समय रहते पता लगाया जा सके।
हालांकि, वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, गुलदार सामान्य तौर पर इंसानों से दूरी बनाए रखने की कोशिश करता है। लेकिन जब उसका प्राकृतिक आवास, भोजन या आवागमन का क्षेत्र प्रभावित होता है तो वह रिहायशी इलाकों के करीब दिखाई दे सकता है। इसलिए ग्रामीणों के लिए जरूरी है कि वे वन विभाग की सलाह का पालन करें और वन्यजीव को उकसाने या उसके करीब जाने की कोशिश न करें।
वन विभाग की भूमिका पर उठ रहे सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके में गुलदार की गतिविधियों की जानकारी सामने आने के बावजूद समय रहते पर्याप्त निगरानी नहीं की गई। उनका कहना है कि यदि संवेदनशील इलाकों में नियमित निगरानी और प्रभावी गश्त की व्यवस्था हो तो गुलदार के गांवों के आसपास आने की घटनाओं पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
एक साल में दो दर्जन से अधिक लोगों के गुलदार के हमले का शिकार होने का दावा भी ग्रामीणों की ओर से किया जा रहा है। हालांकि, ऐसे आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग के रिकॉर्ड के आधार पर ही की जानी चाहिए। यही वजह है कि वन विभाग से इलाके में गुलदारों की संख्या, उनकी गतिविधियों और पिछले मामलों को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराने की मांग उठ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि केवल घटना होने के बाद पिंजरा लगाने के बजाय संभावित संवेदनशील क्षेत्रों की पहले से पहचान की जानी चाहिए। इसके साथ ही कैमरा ट्रैप, गश्ती दल और स्थानीय स्तर पर सूचना तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।
जंगल से रिहायशी इलाकों तक पहुंच रही आहट
बिजनौर के ग्रामीण इलाकों में जंगल और आबादी के बीच दूरी कम होने के कारण वन्यजीवों की आवाजाही की संभावना बनी रहती है। खेतों में फसल खड़ी होने के दौरान भी गुलदार को छिपने के लिए पर्याप्त स्थान मिल जाता है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों के आसपास उसकी मौजूदगी का पता लगाना आसान नहीं होता।
सदरूदीन में गुलदार के पिंजरे में फंसने की घटना ने एक बार फिर वन्यजीवों और इंसानी आबादी के बीच बढ़ते संपर्क को लेकर सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीण चाहते हैं कि वन विभाग केवल एक घटना के बाद कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे क्षेत्र का सर्वे कर संभावित खतरे वाले गांवों की पहचान करे।
सुरक्षा के लिए ग्रामीणों को सतर्क रहने की जरूरत
गुलदार की मौजूदगी की आशंका वाले क्षेत्रों में ग्रामीणों को अकेले खेतों या जंगल की ओर जाने से बचना चाहिए। बच्चों को भी शाम के समय घर से बाहर अकेले नहीं भेजना चाहिए। इसके अलावा, किसी वन्यजीव के दिखाई देने पर भीड़ जुटाने, उसका पीछा करने या उसके करीब जाकर तस्वीर लेने से बचना जरूरी है।
यदि किसी गांव में गुलदार दिखाई देता है तो इसकी सूचना तुरंत वन विभाग या स्थानीय प्रशासन को दी जानी चाहिए। ग्रामीणों को स्वयं पिंजरा लगाने या वन्यजीव को पकड़ने का प्रयास नहीं करना चाहिए। इससे स्थिति और जटिल हो सकती है।
एक गुलदार पकड़ा, लेकिन चिंता अभी कायम
सदरूदीन गांव में पिंजरे में गुलदार के फंसने से ग्रामीणों को निश्चित रूप से कुछ राहत मिली है। इसके बावजूद आसपास के गांवों में चिंता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में गुलदार की गतिविधियों की लगातार निगरानी जरूरी है।
फिलहाल सबसे बड़ी जरूरत यही है कि वन विभाग संवेदनशील गांवों में निगरानी व्यवस्था मजबूत करे और ग्रामीणों को समय-समय पर सुरक्षा संबंधी जानकारी देता रहे। साथ ही, गुलदारों की वास्तविक संख्या और उनकी गतिविधियों से जुड़े आधिकारिक आंकड़े सामने आने से भी लोगों की चिंताओं को दूर करने में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर, बिजनौर के नहटौर क्षेत्र में गुलदार की मौजूदगी ने मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती को एक बार फिर सामने ला दिया है। सदरूदीन गांव में एक गुलदार का पिंजरे में कैद होना राहत की खबर है, लेकिन ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए आगे भी सतर्कता और प्रभावी निगरानी जरूरी बनी हुई है।

