मथुरा में जन्मे श्रीकृष्ण: आधी रात कारागार से गोकुल पहुंचे कान्हा, कंस के अंत की शुरू हुई कहानी
रिपोर्ट- मुकेश वर्मा
मथुरा: द्वापर युग में जब मथुरा नगरी अत्याचार और अधर्म के दौर से गुजर रही थी, तब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म धर्म और सत्य की स्थापना के लिए हुआ। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण के रूप में आठवां अवतार लिया। उनका जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधी रात के समय मथुरा की कारागार में हुआ था। यही वह क्षण माना जाता है, जिसने आगे चलकर अत्याचारी राजा कंस के अंत की नींव रखी।
श्रीकृष्ण जन्म की कथा भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में विशेष स्थान रखती है। जन्माष्टमी के अवसर पर देशभर में श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं। वहीं, मथुरा और वृंदावन में इस पर्व का विशेष महत्व है। यहां मंदिरों में भगवान के जन्म की झांकी सजाई जाती है और आधी रात को विशेष पूजा-अर्चना के साथ जन्मोत्सव मनाया जाता है।
आकाशवाणी ने कंस को दिया था भविष्यवाणी का संदेश
पौराणिक कथा के अनुसार, मथुरा के राजा कंस की बहन देवकी का विवाह वसुदेव के साथ हुआ था। विवाह के बाद जब कंस अपनी बहन और बहनोई को उनके घर पहुंचाने जा रहा था, तभी आकाशवाणी हुई। इसमें कहा गया कि देवकी की आठवीं संतान कंस के अंत का कारण बनेगी।
इस भविष्यवाणी ने कंस के मन में भय पैदा कर दिया। इसके बाद उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कंस ने देवकी की संतानों को जन्म के बाद अपने भय के कारण उनसे दूर कर दिया। हालांकि, आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म होते ही घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया।
आधी रात कारागार में हुआ श्रीकृष्ण का जन्म
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी की आधी रात को देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। उस समय मथुरा की कारागार में विशेष परिस्थितियां बनीं।
मान्यता है कि श्रीकृष्ण के जन्म के समय भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव को अपने दिव्य स्वरूप में दर्शन दिए। इसके बाद उन्होंने वसुदेव को निर्देश दिया कि वे नवजात बालक को गोकुल ले जाएं और वहां नंद बाबा तथा माता यशोदा के घर सुरक्षित पहुंचा दें।
इस घटना को भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की महत्वपूर्ण शुरुआत माना जाता है। एक ओर जहां मथुरा की कारागार में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, वहीं दूसरी ओर गोकुल में उनके पालन-पोषण की भूमिका तैयार हो रही थी।
पहरेदारों की नींद और खुल गए कारागार के द्वार
पौराणिक मान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण के जन्म के बाद कारागार में तैनात पहरेदार गहरी नींद में सो गए। इसके बाद कारागार के द्वार स्वतः खुल गए। वसुदेव ने नवजात श्रीकृष्ण को एक टोकरी में रखा और उन्हें लेकर गोकुल की ओर प्रस्थान किया।
यह यात्रा आसान नहीं थी। कथा के अनुसार, उस समय यमुना नदी का जल प्रवाह तेज था। इसके बावजूद वसुदेव बालक श्रीकृष्ण को लेकर यमुना पार करने लगे। धार्मिक परंपरा में इस प्रसंग को भगवान की दिव्य लीला के रूप में देखा जाता है।
कहा जाता है कि वसुदेव सुरक्षित रूप से गोकुल पहुंचे और वहां नंद बाबा के घर नवजात श्रीकृष्ण को माता यशोदा के पास छोड़ दिया। इसके बाद वे वहां मौजूद नवजात कन्या को लेकर मथुरा की कारागार में लौट आए।
योगमाया ने कंस को दी चेतावनी
जब कंस को देवकी की संतान के जन्म की जानकारी मिली, तो वह कारागार पहुंचा। पौराणिक कथा के अनुसार, उसने नवजात कन्या को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया। लेकिन तभी वह कन्या उसके हाथों से छूटकर आकाश में प्रकट हुई।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह कन्या योगमाया का स्वरूप थीं। उन्होंने कंस को चेतावनी दी कि जिस बालक से उसे भय है, वह गोकुल में सुरक्षित पहुंच चुका है।
इस घटना के बाद कंस को यह विश्वास हो गया कि भविष्यवाणी पूरी होने की दिशा में आगे बढ़ चुकी है। इसके साथ ही गोकुल में रहने वाले बालक श्रीकृष्ण और कंस के बीच संघर्ष की पौराणिक कथा का अगला अध्याय शुरू होता है।
गोकुल में नंदलाल के रूप में पले श्रीकृष्ण
गोकुल पहुंचने के बाद श्रीकृष्ण का पालन-पोषण नंद बाबा और माता यशोदा के स्नेह में हुआ। इसी कारण उन्हें नंदलाल, यशोदानंदन और कान्हा जैसे नामों से भी जाना जाता है।
श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़ी अनेक कथाएं भारतीय लोक परंपरा का हिस्सा हैं। माखन चोरी, गोप-गोपियों के साथ उनकी बाल लीलाएं और बांसुरी वादन जैसे प्रसंग आज भी भक्तों के बीच लोकप्रिय हैं।
वहीं, दूसरी ओर मथुरा में कंस को लगातार यह भय सताता रहा कि जिस बालक को वह अपना काल मानता है, वह एक दिन उसके सामने आएगा। इसी पौराणिक घटनाक्रम को आगे चलकर धर्म और अधर्म के संघर्ष के रूप में देखा गया।
श्रीकृष्ण अवतार का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का अवतार केवल कंस के अंत तक सीमित नहीं था। उनके जीवन का उद्देश्य धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश से जुड़ा माना जाता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण द्वारा धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश से संबंधित संदेश दिया गया है। इसलिए श्रीकृष्ण का जीवन भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है।
श्रीकृष्ण ने अपने जीवन के विभिन्न चरणों में कर्म, धर्म, भक्ति और कर्तव्य का संदेश दिया। यही कारण है कि उनका जन्मोत्सव केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक चिंतन से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर भी माना जाता है।
मथुरा-वृंदावन में जन्माष्टमी का विशेष उत्साह
श्रीकृष्ण जन्म की स्मृति में जन्माष्टमी का पर्व देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। हालांकि, मथुरा, वृंदावन और गोकुल में इस पर्व की विशेष छटा देखने को मिलती है।
मंदिरों को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। श्रद्धालु व्रत रखते हैं और भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं। इसके अलावा भजन-कीर्तन, धार्मिक आयोजन और श्रीकृष्ण की लीलाओं पर आधारित झांकियां भी सजाई जाती हैं।
आधी रात के समय भगवान के जन्म की प्रतीकात्मक पूजा होती है। मंदिरों में घंटियों और जयकारों के बीच भक्त भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करते हैं। इसके बाद प्रसाद वितरण और धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला चलता है।
प्रेम, भक्ति और धर्म का संदेश देते हैं श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण जन्म की कथा का सबसे बड़ा संदेश यही माना जाता है कि विपरीत परिस्थितियों के बीच भी सत्य और धर्म का मार्ग समाप्त नहीं होता। श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम, करुणा, भक्ति, नीति और कर्म का संदेश देता है।
मथुरा की कारागार से गोकुल तक का उनका प्रारंभिक जीवन भारतीय धार्मिक परंपरा में एक ऐसी कथा के रूप में देखा जाता है, जिसमें आशा और धर्म की विजय का संदेश निहित है।
इसीलिए जन्माष्टमी पर देशभर के श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का स्मरण करते हैं और उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं। मथुरा की धरती पर जन्मे श्रीकृष्ण की यह कथा आज भी करोड़ों लोगों के लिए आस्था, भक्ति और आध्यात्मिक प्रेरणा का केंद्र बनी हुई है।

